छत्तीसगढ़ में वोटर्स पर कितना असर डालेगा बीजेपी-कांग्रेस का नये चेहरों पर दांव?

Demo Pic.
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लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी से कहीं ज्यादा केन्द्रीय नेतृत्व के चेहरे और उनके एजेंडे पर चुनाव लड़ा जाता है और मतदाता भी उन्हीं से प्रभावित होकर वो​ट करते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 13, 2019, 9:43 AM IST
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लोकसभा चुनाव 2019 में छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने एक नया प्रयोग किया है. बीजेपी ने जहां सभी सांसदों की टिकट काट दी. वहीं कांग्रेस ने भी ऐसे किसी नेता को टिकट नहीं दिया, जिन्हें साल 2014 के आम चुनावों में हार मिली थी. साल 2014 में सूबे से कांग्रेस की टिकट पर एक मात्र सांसद ताम्रध्वज साहू चुने गए थे, जो इस समय राज्य सरकार में मंत्री हैं. इसलिए उनकी ​जगह भी दूसरे को मौका दिया गया है. यानी कि दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने इस बार सूबे की सभी 11 सीटों पर नये चेहरों को मैदान में उतारा है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि नए चेहरों पर दोनों ही दलों का दांव वोटर्स पर कितना असर डालेगा.

छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव में नए चेहरों पर दांव का असर जानने से पहले जान लेते हैं कि पूर्व प्रत्याशियों की टिकट काटने के बाद किस समीकरण से नए चेहरों पर दांव लगाया गया. बात अगर बीजेपी की करें तो उनमें 11 में से तीन सीटें दुर्ग, महासमुंद, सरगुजा सीट पर उन्हें प्रत्याशी बनाया है, जिन्होंने 2013 के विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दी गई. दुर्ग से प्रत्याशी विजय बघेल ने 2013 में पाटन और सरगुजा प्रत्याशी रेणुका सिंह सरगुजा जिले की प्रेमनगर विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी थीं, महासमुंद प्रत्याशी चुन्नीलाल साहू खल्लारी विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे.

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, पीएम नरेन्द्र मोदी व अन्य. फाइल फोटो.




बची आठ सीटों में से जांजगीर सीट से प्रत्याशी गुहाराम अजगले पूर्व में सांसद, बस्तर से प्रत्याशी बैदूराम कश्यम ​पूर्व विधायक, रायपुर प्रत्याशी सुनील सोनी पूर्व महापौर, कांकेर प्रत्याशी मोहन मंडावी पूर्व विधायक, राजनांदगांव प्रत्याशी संतोष पांडेय और कोरबा प्रत्याशी ज्योतिनंद दुबे पूर्व विधायक प्रत्याशी और रायगढ़ प्रत्याशी गोमती साय जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं.
बिलासपुर प्रत्याशी अरुण साव पहली बार चुनावी मैदान में हैं. बीजेपी के सभी प्रत्याशियों की संगठन में पकड़ मजबूत मानी जा रही है. विधानसभा चुनाव 2018 में बीजेपी की करारी हार के लिए प्रत्याशियों से कार्यकर्ताओं की नाराजगी को भी प्रमुख वजह माना जा रहा है. यही कारण है कि संगठन और जातिगत समीकरण को फार्मूला बनाकर नये चेहरों पर दांव खेला गया है.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी व अन्य. फाइल फोटो.


अब यदि बात कांग्रेस की करें तो कांग्रेस ने सूबे की 11 लोकसभा सीटों में से चार सीट सरगुजा सीट से खेलसाय सिंह, बस्तर से दीपक बैज, महासमुंद सीट से धनेन्द्र साहू और रायगढ़ से लालजीत सिंह राठिया वर्तमान में विधायक हैं. दुर्ग से प्रतिमा चन्द्राकर और राजनांदगांव से प्रत्याशी भोलाराम साहू 2013 विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी थे, लेकिन 2018 के चुनाव में उन्हें पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका नहीं दिया. रायपुर प्रत्याशी प्रमोद दुबे वर्तमान में महापौर, जांजगीर सीट से प्रत्याशी रवि भारद्वाज, कांकेर ​सीट से प्रत्याशी बृजेश ठाकुर और बिलासपुर सीट से प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव संगठन में मजबूत माने जाते हैं. कोरबा प्रत्याशी ज्योत्सना मंहत वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत की पत्नी हैं.

साफ है कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में 90 में से 68 सीटों पर मिली बंपर जीत का लाभ लोकसभा चुनाव में लेने की कोशिश की है. यही कारण है कि चार विधायक, एक महापौर और तीन पूर्व विधायकों को पार्टी ने लोकसभा चुनाव के मैदान में उतारा है. अब सवाल उठता है कि छत्तीसगढ़ में क्या बीजेपी और कांग्रेस का ये नया प्रयोग वोटर्स पर कितना असर डालेगा?

पीएम नरेन्द्र मोदी के साथ विक्रम उसेंडी. फाइल फोटो.


दिल्ली में दिखा था असर
लोकसभा चुनाव में नए प्रयोग पर बीजेपी और कांग्रेस के अपने तर्क हैं. सभी सांसदों की टिकट काटकर नए चेहरों को मौका देने को लेकर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी का कहना है कि सबकी राय पर आलाकमान ने ये निर्णय लिया है. इसी तरह का प्रयोग दिल्ली के निकाय चुनाव में पार्टी ने किया था और सफलता मिली थी. प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता विकास तिवारी का कहना है कि विधानसभा चुनाव के परिणाम को ध्यान में रखकर पार्टी ने अच्छी छवि और काम करने वालों को लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया है.
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केन्द्रीय नेतृत्व का चेहरा असरदार
केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर में राजनीतिक विज्ञान विभाग की अध्यक्ष व राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अनुपमा सक्सेना कहती हैं टिकट बांटना राजनीतिक दलों की रणनीति का हिस्सा होता है. वर्तमान में मतदाता जागरूक और महत्वकांक्षी दोनों है. ऐसे में पार्टियों के सरकार में रहते किए गए कार्यों और वर्तमान में उनके एजेंडे पर ज्यादा फोकस करता है. विधानसभा व उसके नीचे के चुनाव में प्रत्याशियों की छवि व चेहरा महत्वपूर्ण होता है, लेकिन अक्सर देखा गया है कि लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी से कहीं ज्यादा केन्द्रीय नेतृत्व के चेहरे और उनके एजेंडे पर चुनाव लड़ा जाता है और मतदाता भी उन्हीं से प्रभावित होकर वो​ट करते हैं.

डॉ. अनुपमा सक्सेना.


डॉ. सक्सेना कहती हैं लोकसभा चुनाव में एक-एक सीट पर औसतन 10 लाख से अधिक मतदाता होते हैं. ऐसे में जबतक की प्रत्याशी कोई बहुत बड़ा नाम या सेलिब्रिटी न हो मतदाताओं पर सीधा असर नहीं करते. यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में ही फिल्मी कलाकारों या अन्य क्षेत्र के नामी हस्तियों को पार्टियां प्रत्याशी बनाती हैं. ये प्रयोग विधानसभा या उसके नीचे के चुनावों में न के बराबर ही किया जाता है. छत्तीसगढ़ में दोनों ही पार्टियों ने ऐसे किसी को भी लोकसभा प्रत्याशी नहीं बनाया है, जिसकी सकारात्मक या नाकारात्मक दोनों ही तरह की कोई बड़ी छवि जनता के बीच में हो. इसलिए लोकसभा चुनाव में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व, घोषणा पत्र और एजेंडा ही मतदाताओं पर असर डालेगा. नये चेहरों का फर्क ये जरूर होगा कि प्रत्याशियों को लेकर कोई नकारात्मक असर मतदाताओं पर नहीं होगा.

बस्तर संसदीय क्षेत्र में वोट करने पहुंची महिलाएं. फाइल फोटो.


सरकार के काम का असर
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं कि भाजपा ने सभी मौजूदा सांसदों की टिकट काटकर एक तरह से विधानसभा चुनाव 2018 में पार्टी करारी हार की सजा और एंटी इनकंबेंसी के असर को रोकने की कोशिश की है. साथ ही केन्द्रीय नेतृत्व ने स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को ये संदेश दिया है कि उन्हें चुनाव में काम करना होगा. कांग्रेस पिछले तीन चुनावों से प्रदेश की 11 में से 10 सीटें हारती रही है. ऐसे में इस बार नये लोगों को प्रत्याशी बनाना कोई अजूबा नहीं है. वैसे भी लोकसभा चुनाव में पार्टियों के केन्द्रीय नेतृत्व और घोषणा पत्र, केन्द्र और राज्य की वर्तमान सरकार के कामकाज, नीतियों का काफी असर मतदाताओं पर होता है.

बहरहाल लोकसभा चुनाव में वोटिंग का सिलसिला शुरू हो गया है. राजनीतिक दलों ने जोर शोर से प्रचार प्रसार भी शुरू कर दिया है. पहले चरण में छत्तीसगढ़ की बस्तर सीट पर 11 अप्रैल को मतदान हो चुका है. बची 10 में तीन सीटों पर 18 और 7 सीटों पर 23 अप्रैल को वोटिंग होगी. इसी दिन तय हो जाएगा कि प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के नये प्रयोग ने वोटर्स पर कितना असर किया है. इसके बाद 23 मई को वोटर्स पर असर का ऐलान भी चुनाव परिणाम के रूप में हो जाएगा.
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