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छत्तीसगढ़ी में पढ़िए: ‘तोर दोहरा हँउला के पानी , अमराऊ परवा छानी’

छत्सीगढ़ के आदिवासियों और आम लोगों की जिंदगी बहुत अलग होती है. इन्हें कई बार छोटी-छोटी बातों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है.

छत्सीगढ़ के आदिवासियों और आम लोगों की जिंदगी बहुत अलग होती है. इन्हें कई बार छोटी-छोटी बातों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है.

बिजली के चमत्कार ला आज कतको गांव वाला मन नइ जानत हें. बिजली हे सब हे अइसे आजकल लागथे. जिहां हावय त बने बात ए फेर जिहां नइये तिहां बर आजो चिंतन होवत रइथे. सबो जगा के अपन अपन दिनचर्या हाबे. होत बिहिनिया सबो अपन डहर ला नापे बर चल देंथें.

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बिजली के चमत्कार ला आज कतको गांव वाला मन नइ जानत हें. बिजली हे सब हे अइसे आजकल लागथे. जिहां हावय त बने बात ए फेर जिहां नइये तिहां बर आजो चिंतन होवत रइथे. सबो जगा के अपन अपन दिनचर्या हाबे. होत बिहिनिया सबो अपन डहर ला नापे बर चल देंथें. आनंद अउ उत्साह मा कोनो कमी नइ राहय. बने लीपे बाहरे चिक्कन चाकन गांव कोती के सुरता ला राखे रइहव अइसन संदेसा हमनला मिलत रइथे.

कतकोन जगा मा आजो सुघराई देखत बनथे

जीवन यापन ए शब्द हा सबो जीव परानी ला अपन पेज पसिया बर कुछु न कुछु करे के उपाय बताथे. जीव जगत मा जतका नवा नवा उदिम होवत हे तेमा जुन्ना सियान के अनुभो घलाव काम आथे. जंगल , झाड़ी, पहाड़ नंदिया नरवा , खेती खार सबो बर सियान अपन दिमाग ला लगाके राखें राहंय तभे आज अतका अकन तरक्की दिखत हावय. हाट बाजार मा जाबे त सबो किसम के सौदा अउ मेल मिलाप के जरिया दिखथे. काम बुता के सेती स्वाद ला घलो जानत गिन अउ अपन धन सम्पत्ति ला सकेलत गिन. प्राणी जगत अपन सुरक्षा मांगथे तभे तो पहली जमाना ले लेके आजतक सबो जतन होवत जावत हे. सुघ्घर जिनगी मा सुवारथ के मांग करइया तिरियाए असन लागथें. जीवन जतन मा अपन स्वभाव ला बनाए रखना जरूरी हे.

माई लोगन के घर जिनगी

सबो जानडारिन अपन जिनगी मा हमर का जिम्मेदारी हावय. तभो ले जतका जिम्मेदारी माई लोगन के होथे ओतका मावा लोगन के नइ होवय अइसे अजमाए गेहे. सुते दसना मा घलो ओखर चिंता घर परिवार बर लागे रइथे. आंखी के मुंदई तक अपन परिवार ला संवारना ओकर कर्तव्य होथे .

होस हवास के राहत ले अपन सबो जा बिरादरी ला मान गऊन करना से लेके अपन सबो जात बिरादरी मा घलो आना जाना बनाए रखे बर समय निकालना ओला आथे. गांव बसेरा सबो जात धरम के मनइया ला ओखर बड़ा खियाल रइथे. हांसी खुशी के दिन मा सबो जगा नेवता दिकारी देवाय बर नइ भुलावय. ओकर कमिया अपन बाहिर भीतर के हिसाब लातको संघार के चलथे. सबो जनम मा नारी जनम के अपन महत्तम हावय. जतका नता हावय सबो मा नारी जाति के अपन अलग पहिचान हावय. नारी के बिना कोनो धार्मिक काम नइ होवय. सबले पहिली ओखर पुछारी होथे तभे बुता बने सकलाथे.

देर सबेर सबो सुख ला पाहीं हमर आने वाला समाज

जतका बड़ संसार ला कल्पना मा सोंचन ओतका बड़ अब नइ लागय. सबो जगा ला अपन घरे मा रहिके देखे अउ जाने जा सकत हे. पीढ़ी दर पीढ़ी सुधार होवत आवत हे अउ आगू घलो होही. आज नहीं काली सबो मानव जगत अपन सुख सुविधा ला बाढ़त देखही. समय के बचत के साथ मिहनत के कमाई घलो जादा दिखही अउ सबो सुखियार मनखे कस अपन घर परिवार मा आनंद पाही. (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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