आतंकवाद की तुलना में माओवादी हमले में गईं सबसे ज्यादा जान, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

प्रदेश में माओवादियों की गतिविधियां और हमले बढ़े हैं. उससे यही लगता है कि आतंकवाद की तुलना में माओवाद से ज्यादा लोगों की जानें गई हैं.

Surendra Singh | News18 Chhattisgarh
Updated: May 9, 2019, 1:35 PM IST
Surendra Singh | News18 Chhattisgarh
Updated: May 9, 2019, 1:35 PM IST
आतंकवाद और माओवाद दोनों ही देश के लिए खतरनाक हैं. जम्मू-कश्मीर के लोग जहां आतंकवादी हिंसा में मारे जा रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में भी माओवादी हिंसा में खून बहाने का सिलसिला लगातार जारी है. ऐसे में माओवादी आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं.

प्रदेश में माओवादियों की गतिविधियां और हमले बढ़े हैं. उससे यही लगता है कि आतंकवाद की तुलना में माओवाद से ज्यादा लोगों की जानें गई हैं. सरकारी आंकड़े के मुताबिक आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य जम्मू कश्मीर है. यहां पिछले 10 साल में 372 लोगों की मौते हो चुकी है, वहीं बस्तर में चल रहे युद्ध में सबसे ज्यादा स्थानीय लोगों को नुकसान हुआ है. माओवादी हमले में मार्च 2019 तक छत्तीसगढ़ में 469 बेकसूर मारे गए हैं. हालांकि नक्सल इलाकों में छत्तीसगढ़ पुलिस अपनी रणनीति के तहत जल्द ही उन्हें खदेड़ने का दावा कर रही है. ये हैं 10 वर्षों के सरकारी आंकड़े:-








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साल आतंकवाद से जम्मू कश्मीर में मौत             माओवाद से छत्तीसगढ़ में मौत
2009 52 76
2010 34 78
2011 33 37
2012 20 32
2013 19 55
2014 28 25
2015 19  33
2016 14 36
2017 54 32
2018 86 59

मामले की जानकारी नक्सल ऑपरेशन के डीआईजी सुंदरराज. पी ने दी है. वहीं प्रदेश के राजनीतिक दलों की माओवाद को लेकर अपनी अलग-अलग दलीलें हैं, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की माओवाद के खात्मे को लेकर कोई स्पष्ट नीति दिखाई नहीं दे रही हैं. सभी राजनीतिक दल सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में व्यस्त हैं.

माओवाद मामले में जानकार और वरिष्ठ पत्रकार रविकांत कौशिक का मानना है कि सरकार को अब ठोस कदम उठाने चाहिए. क्योंकि माओवादियों ने अब-तक काफी नुकसान पहुंचाया हैं. छत्तीसगढ़ और जम्मू-कश्मीर दोनों ही लंबे समय से आतंक का दंश झेल रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में जहां सरहद पार पाकिस्तान के घुसपैठ कर देशभर में आतंक फैलाने का काम कर रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में माओवाद जंगल के सहारे पुलिस जवानों पर हमले की फिराक में रहते हैं. इसका खामियाजा सीधे तौर पर आम लोगों को उठाना पड़ रहा है.

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