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ये इंसान समझे जाने की 'जंग' है, पढ़ें- आम नजरिये को चुनौती देकर समाज में कैसे मिसाल बने ट्रांस जेंडर?

समाज में थर्ड जेंडर को आज भी वह सम्मान नहीं मिलता, जिसके वह हकदार हैं.

समाज में थर्ड जेंडर को आज भी वह सम्मान नहीं मिलता, जिसके वह हकदार हैं.

News18 Hindi Original: छक्का, किन्नर, हिजड़ा, बलिया, मामू और ऐसे ही न जाने कितने शब्द एक लिंग की पहचान के रूप में समाज ...अधिक पढ़ें

रायपुर. ”एक शब्द पक्षी बोला जाए और पूछा जाए कि आपके जेहन में किसका खयाल आया तो आप कबूतर, तोता या किसी भी पक्षी, जिसके बारे में आपकी समझ ज्यादा होगी, उसका नाम ले लेंगे. जानवर के बारे में पूछने पर कुत्ता, बिल्ली, गाय, शेर, बंदर किसी भी चार पैर वाले के बारे में आप बता देंगे. इसी तरह यदि इंसान शब्द कहा जाए और जेहन में बनी इमेज के बारे में पूछा जाए तो दावा है कि 99 प्रतिशत से भी ज्यादा लोग किसी लड़का-लड़की, महिला-पुरुष का जिक्र करेंगे. ट्रांस जेंडर के बारे में उन्हें खयाल तक नहीं आएगा. सम्मान तो बहुत दूर की बात है, हमारी जंग फिलहाल आम लोगों की नजर में इंसान बनने की ही है.” समाज में ट्रांस जेंडर के हालात के बारे में भावुक होते हुए भारत की चर्चित ट्रांस वुमेन विद्या राजपूत यही कहती हैं.

छत्तीसगढ़ पुलिस में आरक्षक के पद पर चयनित शिवान्या कहती हैं- “हर एक विभाग में ट्रांस जेंडर को जॉब मिलनी चाहिए. हर वो जगह जहां लड़के-लड़की रहते हैं वहां कम से कम एक ट्रांस जेंडर तो दिखना ही चाहिए.” संघर्ष के अपने दिनों की चर्चा करते हुए शिवान्या कहती हैं- “पहले मैं अपनी पहचान छिपाकर कपड़ा मार्केट की एक दुकान में जॉब करती थी. वहां कस्टमर मेरे शारीरिक एक्शन को देखकर बगैर सामान लिए ही वापस चले जाते थे. तब दुकान मालिक ने कहा कि क्या बात है, तुम कुछ छिपा रही हो. तुमसे ग्राहक क्यों नहीं सामान लेते. फिर मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. कई जगह नौकरी की कोशिश की, लेकिन ऐसा ही हुआ.”

ग्राउंड में मुंह फेर लेते थे

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की रहने वाली शिवान्या कहतीं हैं- “मेरी हकीकत घर में पता चलने के बाद मुझे निकाल दिया गया. पेट भरने के लिए पैसों की जरूरत है. जॉब नहीं मिलने के कारण ट्रांस जेंडर को भिक्षावृत्ति और दूसरे कामों में जाना पड़ता, काबिल हैं, लेकिन काबिलियत दिखाने का मंच भी तो मिलना चाहिए. जब कहीं जॉब नहीं मिला तो मैं भी समूह के अन्य लोगों की तरह भिक्षावृत्ति और नाच-गाने में जाने लगी. फिर पुलिस भर्ती के बारे में पता चला. हमने आवेदन किया और सिविल लाइंस मैदान में प्रैक्टिस के लिए जाने लगे. ग्राउंड में हमें देखकर लड़की-लड़का दोनों मुंह फेर लेते थे. वे कहते थे कि यह जगह आप लोगों के दौड़ने के लिए नहीं है. कुछ कहते थे, अरे आप लोग भी दौड़ने आए हैं.”

शिवन्या बताती हैं- “जब हमें दौड़ने व प्रैक्टिस करने से रोका जाने लगा तब हम आरआई सर के पास गए, उन्होंने मदद की, वो हमारे साथ ग्राउंड में गए और लड़के-लड़कियों से बात की. तब उन्होंने कहा कि हम लोग इनके साथ दौड़ेंगे क्या. हमने कहा कि ठीक है हम लोग अलग समय कर लेते हैं. तब आरआई सर ने उन्हें समझाया कि सभी को एक साथ रहना है, एक साथ प्रैक्टिस करो. काफी समझाने के बाद माने. हालांकि बाद में हम अच्छे दोस्त हो गए.”

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बड़े संघर्षों के बाद मिली सफलता.

हर साल स्कूल बदलना पड़ा

छत्तीसगढ़ पुलिस में चयनित 13 ट्रांस जेंडर में से एक नैना उर्फ राकेश सोरी के संघर्ष की अपनी अलग ही कहानी है. नैना बताती हैं- “मैं मूलत: कांकेर की रहने वाली थी. होश संभालने के बाद से ही घर वाले समझाते थे कि लड़का हूं, लड़के की तरह रहूं. लेकिन मैं आत्मा से लड़की ही थी और वैसे ही रहती थी. लेकिन रोज के ताने और मारपीट से तंग आकर मैंने 12-13 साल की उम्र में ही घर छोड़ दिया. रायपुर आ गई. यहां गुरु-चेला परंपरा का हिस्सा बनी, लेकिन पढ़ने की ललक थी. इसलिए कक्षा 9वीं में पंडरी के एक शासकीय स्कूल में दाखिला लिया. क्लास में मेरी चाल-ढाल पर कमेंट होने लगे. अगले साल यहां से नाम कटवा कर मोवा के एक स्कूल में दाखिला लिया. यही सिलसिला 12वीं तक चला. मैंने चार साल में चार स्कूल बदले.”

भीख मांगते मिली उम्मीद

नैना बताती हैं- “जब कहीं काम नहीं मिला तो ट्रैफिक पर भीख मांगने लगी. तीन साल पहले की ही बात है. रायपुर के एक ट्रैफिक सिग्नल पर मेरी मुलाकात विद्या दीदी से हुई. उन्होंने कहा कि पुलिस में नौकरी करोगी. थोड़ी देर चर्चा के बाद मैं उनके साथ चली आई. ग्राउंड पर फिजिकल टेस्ट उसके बाद घर में लिखित परीक्षा की तैयारी की. आज पुलिसकर्मी बन गई हूं. पहले लोग हमसे बात करने से भी हिचकिचाते थे. ऐसा लगता था, जैसे हम इंसान नहीं कोई अलग प्राणी हैं. अब जब वर्दी पहन ली है तो लोगों को अपनी बात और हालात आसानी से बता पाती हूं और लोग सुनते भी हैं.”

बहुत बाद में समझ आए शब्दों के मायने

समाज के वंचित वर्ग के लोगों को रोजगार देने वाले रेस्टोरेंट रायपुर के नुक्कड़ में जॉब कर रही अस्मिता गोस्वामी बताती हैं- “मेरा जन्म महाराष्ट्र के भंडारा जिले के बेला गांव में हुआ. 12 साल की उम्र में मैं छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के चरामा आई. पिता जी की नौकरी यहीं थी. यहां कक्षा छठी में मेरा दाखिला लड़कों के स्कूल में करा दिया गया. मेरी चाल, बात करने का तरीका देख अभद्र कमेंट किए जाने लगे. कोई छक्का तो कोई बायली कहकर पुकारता था. मेरे साथ अश्लील हरकतें की जाती थीं. कोई कपड़ों पर पानी डाल देता था. मेरे लिए ये रोज की बात हो गई थी. लेकिन मुझे समझ नहीं आता था कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है. बारहवीं तक मैंने यहीं पढ़ाई की. स्कूल के अंतिम दिनों में मुझे पता चला कि मैं न तो पूर्ण रूप से पुरुष हूं और न ही महिला.”

अस्मिता कहती हैं- “पिता जी के गुजर जाने के बाद आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. मैंने छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, लेकिन मोहल्ले लोगों के व्यवहार के कारण मुझे वो काम भी छोड़ना पड़ा. कांकेर छोड़ रायपुर आ गई. स्कूल में सभी बोर्ड परीक्षाएं मैंने प्रथम श्रेणी में पास की. हर विषय पर अच्छी पकड़ थी, लेकिन समाज के लोगों को इससे मतलब नहीं था. उनके लिए मेरा चलना, बोलना, कपड़े पहनना ही ज्यादा महत्वपूर्ण था. एक तरह से उनके लिए मेरा थर्ड जेंडर होना ही गलत था. हालांकि अब नुक्कड़ में बेहतर तरीके से काम हो रहा है.” नुक्कड़ में ही नौकरी कर रही चिकी हिमाचल प्रदेश से आई हैं. वे ट्रांस होने के साथ ही मूक-बधिर भी हैं. चिकी की मित्र याना बताती हैं कि इसे काफी प्रताड़ित किया गया. घर से निकाल दिया गया. किसी तरह हमारे संपर्क में आई.

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2009 से एक सामुदायिक आधारित संगठन “मितवा समिति” चला रही विद्या राजपूत कहती हैं- “शिवन्या, नैना, अस्मिता चिकी की तरह ही लगभग हर ट्रांस जेंडर की कहानी एक जैसी ही है. हो सकता है उनके साथ घटनाएं अलग-अलग तरीके से हुई हों, लेकिन मुख्य मुद्दा यही है कि घर-परिवार और समाज सभी ने उन्हें, उन्हीं की स्थिति में अपनाने से इनकार कर दिया. ट्रांस जेंडर को लेकर स्वत: ही मान लिया गया कि वे किसी पुरुष या महिला के बराबर तो दूर इंसान की पंक्ति में भी अंतिम छोर पर भी खड़े होने लायक नहीं हैं.”

छत्तीसगढ़ पुलिस में थर्ड जेंडर 13 थर्ड जेंडर के चयनित होने का उदाहरण देते हुए विद्या कहती हैं- “पुलिस में चयनित होना गर्व है, लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ पुलिस, बाल्को में 11, टाटा की अलग-अलग कंपनी में 7 थर्ड जेंडर सिक्योरिटी गार्ड, फ्लॉक लिफ्ट, फ्रंट ऑफिस, एचआर समेत अन्य पदों पर नौकरी कर रहे हैं.” छत्तीसगढ़ सरकार के समाज कल्याण विभाग की एक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए विद्या बताती हैं कि विभाग के सर्वे के मुताबिक पुलिस विभाग में 13 के अलावा लोक निर्माण विभाग, समाज कल्याण विभाग, नगर पालिक निगम समेत छत्तीसगढ़ की अन्य शासकीय व निजी संस्थाओं में 67 ट्रांस जेंडर अलग-अलग पदों पर नौकरी कर रहे हैं. पुलिस को छोड़ अन्य शासकीय विभागों में संविदा पर नियुक्ति हुई हैं.

छत्तीसगढ़ तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड की सदस्य विद्या बताती हैं कि “समाज कल्याण विभाग का ये सर्वे उन ट्रांस जेंडर पर है, जो खुलकर समाज में काम कर रहे हैं. इनके अलावा कई ऐसे भी हैं, जो मुख्यधारा में जुड़ना चाहते हैं, लेकिन स्वीकार्यता नहीं होने के कारण अपनी पहचान छिपाकर अलग-अलग संस्थानों में नौकरी कर रहे हैं. हमारे समुदाय की मधु किन्नर रायगढ़ नगर निगम में चुनाव जीतकर महापौर बनी थीं. रायपुर की ही रहने वाली निक्की बजाज माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप तक पहुंच चुकी हैं. हमारे समुदाय के लोग मल्टीनेशनल कंपनियों में जॉब कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में ही वकालत और पत्रकारिता के पेशे में भी खुद को साबित कर चुके हैं. भिलाई में ट्रांस जेंडर के लोग खुद का चाय-नाश्ता सेंटर चलाते हैं.”

समाज कब पूरी तरह स्वीकार करेगा?

छत्तीसगढ़ की मशहूर मनोचिकित्सक डॉ. अंबा सेठी कहती हैं- “समाज में जागरुकता की कमी है. जागरुकता के लिए हर स्तर पर काम करना होगा. टीवी सीरियल, विज्ञापन फिल्म, वेब सीरीज, सोशल मीडिया से लेकर नुक्कड़ नाटक तक में ट्रांस जेंडर से जुड़े सकारात्मक किरदारों को प्रदर्शित करना चाहिए. पुरुष-महिला की तरह ही उन्हें आम किरदार बताना चाहिए. इससे लोगों के मन में स्वीकारता बढ़ेगी. आम तौर पर समाज में थर्ड जेंडर को या तो नाकारात्मक नहीं तो मजाकिया किरदार के रूप में ही पेश किया जाता रहा है. इसलिए भी समाज में इनकी स्वीकार्यता को लेकर कमी है.”

जानी-मानी काउंसलर डॉ. अंबा कहती हैं- “समाज में स्वीकार्यता से पहले ट्रांस जेंडर को खुद को स्वीकार करना होगा. उन्हें खुद को बताना होगा कि वे जैसी हैं, सबसे बेहतर हैं. इसके बाद परिवार के लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि वे ट्रांस जेंडर बच्चों को उतना ही प्यार दें, जितना की घर के दूसरे सदस्यों को देते हैं. क्योंकि ट्रांस जेंडर भी हामरी ही तरह भगवान की ही देन हैं. इसमें उनकी अपनी कोई गलती नहीं है. इसके बाद बारी समाज की आती है.”

जेंडर इक्वेलिटी पर गहरी समझ रखने वाले छत्तीसगढ़ के युवा विनयशील कहते हैं- “समाज के तौर पर ट्रांस जेंडर को सबसे पहले सामान्य मनुष्य के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है. स्वीकार करना अर्थात किसी विशेष उपलक्ष्य, रश्म अदायगी की बजाय रोजमर्रा के जीवन में उनके साथ सहज होना. तब समाज में ट्रांस जेंडर के लिए अवसर उपलब्ध होने शुरू हो जाएंगे. समाजिक बदलाव के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में उनकी भूमिका बढ़ाने से भी बदलाव की दिशा तेज होगी. इसके लिए परिवार, समाज और सरकार हर स्तर पर काम करने की जरूरत है.”

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समाज की संवेदनशीलता से थर्ड जेंडर को मिलेगा बराबरी का दर्जा.

सरकार क्या कर रही है?

सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री ए नारायण स्वामी द्वारा 5 अप्रैल 2022 को लोकसभा में ट्रांस जेंडर से जुड़े सवालों के दिए गए एक जवाब के मुताबिक- केंद्र सरकार द्वारा देश में ट्रांस जेंडर के आश्रय के लिए ‘गरिमा गृह’ नाम से शेल्टर चलाए जा रहे हैं. पायलट प्रोजेक्ट के तहत छत्तीसगढ़ उन राज्यों में शामिल है, जहां गरिमा गृह संचालित हो रहा है. केंद्र सरकार की 12 फरवरी 2022 से शुरू की गई स्माइल योजना के तहत ट्रांस जेंडर वर्ग के बच्चों को कक्षा 9वीं से स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई में आर्थिक सहायता के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने का प्रावधान है. इसके अलावा रोजगार उन्मुख प्रशिक्षण, चिकित्सकीय सहायता व अन्य जरूरी सुविधाओं में सहायता का भी प्रावधान है. इस वर्ग काे समाज में समानता के लिए उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 भी लागू कर दिया गया है.

समाज कल्याण विभाग, छत्तीसगढ़ शासन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक राज्य में तृतीय लिंग समुदाय के कुल लोगों की संख्या 3058 है. एक विभागीय सर्वे के आधार पर जारी इस आकड़े के मुताबिक कुल संख्या में से 1229 लोागों को पहचान पत्र दिया जा चुका है. छत्तीसगढ़ तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड की सदस्य रवीना बरिहा इन आंकड़ों से इत्तेफाक नहीं रखती. रवीना कहती हैं- “हम लोग लगातार अलग-अलग जिलों में सेमिनार व अन्य कार्यक्रम करते हैं. छत्तीसगढ़ में तृतीय लिंग के लोगों की संख्या 25 से 30 हजार के बीच है. हालांकि आज भी समाज में तृतीय लिंग को सामाजिक बुराई और कलंक के रूप में देखा जाता है, इसलिए सर्वे में लोग सामने नहीं आते. लेकिन जिसको भी मौका मिला, उसने समाज की धारणा को चुनौती देकर खुद को साबित किया है.”

तृतीय लिंग को सामाजिक अधिकार दिलाने के लिए काम कर रही समुदाय की एक सदस्य कहती हैं- “हमारे लिए कागजों में कई योजनाए हैं, लेकिन धरातल पर उसे लाने के लिए काम न के बराबर ही हुआ है.” उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए वे कहती हैं- “वहां तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड की उपाध्यक्ष समुदाय के ही सदस्य हैं, अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री हैं. छत्तीसगढ़ के बाद वहां बोर्ड का गठन हुआ, उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा है, लेकिन हमारे यहां टीए-डीए जैसे जरूरी भत्ता भी नहीं दिया जाता. हालांकि राज्य में नई सरकार के गठन के बाद तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड के लिए बजट बढ़ाया गया है, लेकिन विभाग द्वारा उसका अपेक्षानुसार क्रियान्यवयन नहीं किया जा रहा है.”

सफल होने पर सब पूछते हैं

पुलिस आरक्षक शिवन्या कहती हैं- “हमारे अंदर भी कुछ कर गुजरने का जुनून है, उस जुनून को हम पूरी दुनिया को दिखाना चाहते हैं. लोग कहते थे तुम किन्नर हो कुछ नहीं कर सकती, फिर जॉब से निकाल दिया गया, अलग-अलग स्टेट में नाचने-गाने चली जाती थी, ट्रेनों में भी भिक्षावृत्ति करते थे. घर और समाज में कोई नहीं पूछता था, लेकिन जब पुलिस में भर्ती हुई और पहली सैलरी मिली तो उससे 2 साड़ियां खरीदीं. एक मातारानी को चढ़ाई, दूसरी अपनी मां के लिए ले गई. क्योंकि इस दुनिया में मैं उन्हीं की वजह से हूं. पुलिस में भर्ती की जानकारी पर घर वाले खुश हुए. अब घर आना-जाना भी शुरू हो गया है. एक बार सफल हो जाओ तो सब पूछते हैं, लेकिन सफल होने के लिए मौके की भी जरूरत होती है. हमारा समुदाय समाज से उसी मौके की बस उम्मीद करता है. समाज के लोगों को समझना चाहिए कि हम उनसे अलग नहीं हैं, हमारे रगों में भी वही खून है, जो उनमें है.”

आरक्षण की मांग

रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, बस्तर समेत छत्तीसगढ़ के दर्जनभर से ज्यादा जिलों में ट्रांस जेंडर समुदाय के 100 से अधिक लोगों से बातचीत में एक आम मांग आरक्षण की थी. समुदाय के के लोगों का कहना है सरकारी भर्तियों में मौका मिलना खुशी की बात है, लेकिन कर्नाटक की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी तृतीय लिंग के व्यक्तियों के लिए आरक्षण तय किया जाना चाहिए. इससे समूह के लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने में आसानी होगी.

छत्तीसगढ़ समाज कल्याण मामलों की मंत्री अनिला भेड़िया का कहना है कि “राज्य सरकार तृतीय लिंग समूह के लोगों के लिए बेहतर काम कर रही है. पुलिस विभाग में भर्ती उसका बड़ा उदाहरण है. इसके अलावा अन्य योजनाओं के तहत भी तृतीय लिंग के लिए काम किए जा रहे हैं. सरकार ने इसके लिए अलग से बजट का प्रावधान किया है.”

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