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OPINION: सरकारों पर पुरुषवादी सोच हावी, बात हमेशा आम आदमी की होती है, औरत की नहीं!

OPINION: सरकारों पर पुरुषवादी सोच हावी, बात हमेशा आम आदमी की होती है, औरत की नहीं!

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, (फाइल फोटो)

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, (फाइल फोटो)

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल महिलाओं को मंत्रिमंडल में बराबरी का मौका देकर ये जता सकते थे कि उनकी पार्टी और वे खुद महिलाओं की नेतृत्व को लेकर कितने संजीदे हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

छत्तीसगढ़ की पांचवीं सरकार के मंत्रिमंडल का गठन हो गया है. रायपुर के पुलिस परेड ग्राउंड में बीते मंगलवार को राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने कांग्रेस की सरकार के 9 मंत्रियों को शपथ दिलाई. इससे पहले दो मंत्रियों को मुख्यमंत्री के साथ ही शपथ दिलाई जा चुकी है. यानी की भूपेश कैबिनेट में मुख्यमंत्री सहित 13 में से 12 मंत्री तय हो गए हैं. इनमें सिर्फ एक महिला विधायक को शामिल किया गया है.

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छत्तीसगढ़ में बात चाहे मौजूदा कांग्रेस सरकार की हो या फिर पिछली बीजेपी सरकार की. दोनों ही सरकारों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी नाममात्र की ही देखने को मिली. भूपेश मंत्रिमंडल में केवल एक ही महिला अनिला भेड़िया की एंट्री हो पायी, जिनको परम्परानुसार महिला एवं बाल विकास विभाग मिलना भी लगभग तय ही माना जाता है. लेकिन इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी जब महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली सरकारों में किसी एक महिला विधायक को मंत्री बनाकर महज़ औपचारिकता भर पूरी की जा रही है. जैसे पिछली सरकार में रमशीला साहू को मंत्री बनाकर पूरी की गयी थी.



छत्तीसगढ़ की कई ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां महिला मतदाताओं का खासा प्रभाव देखने को मिलता है. सूबे की 90 विधानसभा सीटों में से तकरीबन 18 सीटों में प्रत्याशियों की जीत-हार का फैसला महिला मतदाताओं के हाथ ही हाथों होता है. क्योंकि यहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा या फिर लगभग बराबर है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने अभी तक उस संख्या में महिलाओं को प्रत्याशी नहीं बनाया. जैसा कि दावा पार्टियां महिलाओं को समान नेतृत्व देने का किया जाता है.

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राजनीतिक पार्टियां हर चुनाव में महिलाओं के हक में कटौती कर देती हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद चार बार विधानसभा के चुनाव हुए, लेकिन महिलाओं की सहभागिता अब तक उतनी प्रभावी नहीं रही या फिर राजनीतिक पार्टियों ने ही महिलाओं को तरजीह नहीं दी. राजनीति में महिलाओं की सक्रियता भले ही बढ़ी हो, लेकिन विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ पा रहा है.

तीन सीटों पर महिला प्रत्याशियों में आमना सामना
महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की बात नेताओं की जुबान पर हमेशा होती है, लेकिन अपनी ही पार्टी में ये नियम लागू करना शायद पॉलिटिशियन भूल जाते हैं. छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 में बीजेपी ने इस बार 14 महिलाओं को टिकट दी. वहीं कांग्रेस ने 12 महिलाओं को मैदान में उतारा, लेकिन इस बार सिर्फ तीन सीटें तखतपुर, सिहावा और सारंगढ़ में ही महिला प्रत्याशियों का आमना-सामना हुआ. इसी तरह साल 2013 में भरतपुर-सोनहत, सारंगढ़ और दुर्ग ग्रामीण पर ही महिलाओं के बीच मुकाबला देखने को मिला था, लेकिन 2013 में दुर्ग से प्रत्याशी रहीं पूर्व मंत्री रमशीला साहू का टिकट ही इस बार बीजेपी ने काट दिया.

12 महिला प्रत्याशियों को मिली जीत
चलिए बात अगर चुनावी नतीजों की करें तो कुल 12 महिला प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है, जिनमें 9 प्रत्याशी कांग्रेस की, दो जोगी-बसपा गठबंधन से और 1 प्रत्याशी बीजेपी की रहीं हैं. यानि 90 सीटों की विधानसभा में केवल 12 ही महिलाओं का दखल होगा और मंत्रिमंडल में मात्र एक. वैसे कांग्रेस चाहती तो ये संख्या बढ़ा सकती थी, क्योंकि महिला प्रत्याशियों ने अपने क्षेत्र में पुरुष प्रत्याशियों का बराबरी से मुकाबला किया है.

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कसडोल विधानसभा से जीतकर आने वाली शकुंतला साहू ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल को 48418 मतों हराया. दूसरी सीटों पर भी कांग्रेस की महिला प्रत्याशियों को बंपर जीत मिली है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पास पूरा मौका था कि महिलाओं को मंत्रिमंडल में बराबरी का मौका देकर ये जता सकते थे कि उनकी पार्टी और वे खुद महिलाओं की नेतृत्व को लेकर कितने संजीदे हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हांलाकि इसके पीछे का कारण जाति, वर्ग और गुटीय समीकरण बिठाकर लोकसभा में मजबूती से उतरने की तैयारी को बताया जा रहा है.

बहरहाल कारण जो भी हो छत्तीसगढ़ में सरकार रमन या भूपेश या यूं कहें भाजपा या कांग्रेस किसी की भी हो. ये सच्चाई राजनीतिक पार्टियों को भी स्वीकार करनी चाहिए कि अब भी राजनीति में पुरुषवादी सोच हावी है. क्योंकि बात हमेशा आम आदमी की ही होती है, आम औरत की नहीं.

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Tags: Bhupesh Baghel, Chhattisgarh news, Raipur news

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