पानी की कहानी: जीवनदायिनी नहीं, यहां के लिए धीमा जहर है पानी

न्यूज18 हिंदी की खास मुहिम 'पानी की कहानी' सीरिज में हम एक ऐसी ही कहानी बता रहे हैं, जहां पानी स्लो प्वाइजन यानी धीमा जहर का काम कर रहा है.

निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 7:22 AM IST
निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 7:22 AM IST
जल ही जीवन है, जल है तो कल है...जैसे स्लोगन देश में कहीं भी आसानी से देखने और पढ़ने मिल जाएंगे, लेकिन छत्तीसगढ़ में कुछ ऐसे इलाके हैं, जहां जल जीवन नहीं देता और न ही पानी पीने से कल सुरक्षित होता है. बल्की इन इलाकों का पानी पीने से जीवन पर ही संकट मंडराने लगा है. मौत तक हो जाती है. यानी इन इलाकों का पानी जीवनदायिनी तो नहीं है. बल्कि इन इलाकों का पानी जहर का काम जरूर कर रहा है. न्यूज18 हिंदी की खास मुहिम 'पानी की कहानी' सीरिज के इस अंक में हम एक ऐसी ही कहानी बता रहे हैं, जहां पानी स्लो प्वाइजन यानी धीमे जहर का काम कर रहा है.

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के भोपालपटनम तहसील के कई गांवों के जल स्रोत में तय मानक से काफी अधिक मात्रा में फ्लोराइड पाया गया है. यहां तय अधिकतम मानक 1.5 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) प्रति लीटर से काफी अधिक फ्लोराइड जल स्रोतों में पाया गया है. फ्लोराइडयुक्त पानी पीने से भोपालपटनम के सात से अधिक गांवों के करीब 9 हजार लोग फ्लोरोसिस चपेट में हैं. ये आंकड़े सरकारी सर्वे में सामने आए हैं. जबकि ग्रामीणों की मानें तो यदि हर गांव में सर्वे किया जाए तो संख्या काफी बढ़ेगी.

छत्तीसगढ़ और तेलंगाना बॉर्डर पर बसे भोपालपटनम तहसील के रालापल्ली, गुलपेंटा का गेरलागुड़ा पारा के लोग फ्लोरेसिस बीमारी की चपेट में अधिक हैं.
इन गांवों का दौरा करने पर हमें पता चला कि यहां के गांव के युवा व अधेड़ लोगों की हड्डियां कमजोर हो गई हैं. या यूं कहें कि ये समय से पहले ही बुजुर्ग हो रहे हैं. इनके साथ ही गांव के बच्चे और महिलाओं के दांत काले व पीले पड़ गए हैं.

तेलंगाना बॉर्डर पर बसे होने के कारण इस गांव के लोगों को हिंदी बोलने में परेशानी हो रही थी. फिर भी टूटी-फूटी हिंदी में उन्होंने हमें बताया कि यहां का पानी पीने के कारण उनका जीना दूभर हो गया है. उनके दांत खराब व गंदे दिखने के कारण वे किसी के सामने बात करने में भी शर्माते हैं. इसके अलावा मामूली काम करने पर उन्हें कमजोरी महसूस होने लगती है. महिलाओं ने बताया कि गांव के नलों के पानी से भोजन पकाने में भी परेशानी हो रही है.

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वैक​ल्पिक व्यवस्था का दावा
भोपालपटनम पीएचई विभाग के सब इंजीनियर दौलत राम बंजारे ने बताया कि फ्लोराइड चिह्नांकित जल स्रोतों को बंद करने की कवायद की जा रही है. इसके अलावा ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में दूसरे गांवों से पाइपलाइन के माध्यम से पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है, लेकिन ग्रामीणों ने हमसे बातचीत में बताया कि नियमित पानी की सप्लाई नहीं हो रही है, जितना पानी भेजा जाता है वो पर्याप्त नहीं होता है.
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प्रशासन की लेटलतीफी ने बढ़ाई परेशानी
पीएचई विभाग के अधिकारियों ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया कि साल 2010 में सीएम डॉ. रमन सिंह ने भोपालपटनम में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की घोषणा की थी. समय रहते सरकार की ओर से स्वीकृति भी मिल गई, लेकिन प्रशासनिक स्वीकृति व प्लांट के लिए जगह चिह्नित करने में स्थानीय प्रशासन को करीब 8 साल लग गए. इसके बाद अब बीते 25 मई को ट्रीटमेंट प्लांट के लिए भूमिपूजन किया गया. यदि समय रहते प्लांट बन जाता तो लोग इतने गंभीर रूप से फ्लोरेसिस की चपेट में आने से बच जाते.

छत्तीसगढ़ के 22 जिले प्रभावित
वॉटर एड इंडिया के छत्तीसगढ़ एरिया मैनेजर अनुराग गुप्ता ने बताया कि छत्तीसगढ़ के 27 में से 22 जिलों के अलग-अलग जल स्रोतों में तय मानक से अधिक मात्रा में फ्लोराइड पाया गया है. पानी में .5 फीसदी फ्लोराइड मिलना सामान्य है. जबकि 1.5 फीसदी अधिकतम मानक है. कांकेर जिले में भी 20 से अधिक गांवों के जलस्रोतों में फ्लोराइड की अधिकतम मात्रा पाई गई है. अनुराग ने बताया कि उनकी संस्था द्वारा वहां आम लोगों को फ्लोराइड जांच व उपाय के तरीके बताए गए हैं. जांच किट उपलब्ध कराई गई है.

यहां स्थिति और भी भयावह
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में पीने के पानी को लेकर स्थिति ज्यादा भयावह है. यहां के जलस्रोत में फ्लोराइड व अन्य दूसरे हानिकारक रसायनिक पदार्थ मिले हैं. इसके चलते वहां के लोगों​ किडनी की बीमारी से पीड़ित हैं. गरियाबंद के सुपेबेड़ा गांव में 60 से अधिक लोगों की मौत हो गई है. जबकि डेढ़ सौ से अधिक लोग किडनी की बीमारी से प्रभावित हैं. इसके पीछे ग्रामीण पानी को ​ही जिम्मेदार मानते हैं. इसके अलावा राजधानी रायपुर के मोवा बस्ती में गंदे पानी के कारण पीलिया फैल गया. इस साल मार्च से मई के बीच छह लोगों की मौत पीलिया से हो गई. दर्जनों लोग पीलिया की चपेट में थे.

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