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जेल में बंद आदिवासियों की रिहाई को लेकर छत्तीसगढ़ में राजनीति शुरू

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छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से नक्सल मामलों में जेल में बंद आदिवासियों की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एके पटनायक की अध्यक्षता में गठित समिति की पहली बैठक सोमवार को हुई.

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देश की जेलों में 4007 आदिवासियों में से कुछ ऐसे हैं जो जंगल से जलाऊ लकड़ी बीनने, मात्रा से अधिक शराब बनाने, कोई जमानतदार न होने या माओवादी होने के आरोप में 17-18 साल से लंबे समय से बंद हैं. इनकी रिहाई के लिए पटनायक कमेटी ने 3 बिंदु तय किए है. इसके तहत 1141 मामलों की समीक्षा होगी. ये फैसला सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस आनंद कुमार पटनायक की अध्यक्षता में बनाई गई कमेटी ने किया.वहीं इस पहली बैठक के साथ हीं राज्य में सियासत गरमा गई है. दरअसल, बस्तर की जेलों में कई ऐसे आदिवासी 17-18 साल से बंद है जिन पर नक्सलियों की मदद या स्लीपर सेल के रूप में काम करने के आरोप है. कमेटी ने संबंधित अधिकारियों से 3 बिंदुओं के आधार पर 15 जून तक रिपोर्ट तैयार करने को कहा है. इस रिपोर्ट के आधार पर मामलों की समीक्षा होगी.

बैठक में जस्टिस पटनायक के अलावा राज्य के महाधिवक्ता कनक तिवारी, डीजीपी डीएम अवस्थी, गृह विभाग के प्रमुख सचिव एडी गौतम, बस्तर आईजी समेत अन्य अफसर मौजूद थे. 2015 में सुकमा के तत्कालीन कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के बाद तत्कालीन रमन सरकार ने आदिवासियों के खिलाफ चल रहे मामलों को निपटाने के लिए 3 सदस्यीय कमेटी बनाई थी. मध्यप्रदेश की पूर्व चीफ सेक्रेटरी निर्मला बुच इसकी अध्यक्ष थीं. स्थायी समिति ने 7 बैठकों में 189 मामलों में जमानत पर रिहाई की अनुशंसा की थी. इनमें से 66 मामलों में आदिवासी जमानत पर रिहा हुए, 48 में दोष मुक्त हुए और 13 मामलों में कोर्ट से सजा हुई थी. बाकि के मामले ठंडे बस्ते में चले गए.

कमेटी ने पहली बैठक में आदिवासियों पर लगे मामलों की जांच के लिए 3 वर्ग तय किए है. अगली बैठक 22 जून को होगी, इसमें रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी.

इन 3 बिंदुओं के आधार पर होगी समीक्षा

छोटे अपराध- इनमें चोरी, लिमिट से ज्यादा शराब रखने जैसे केस.
बड़े अपराध- हत्या, दुष्कर्म और मारपीट जैसे केस.
नक्सल से जुड़े- इसे भी 2 वर्ग में बांटा गया है. पहला- खुद हथियार उठाए.
दूसरा- जो भीड़ में शामिल रहे हो.
वहीं बीजेपी ने जहां कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि इसी बहाने कांग्रेस नक्सलियों को भी जेल से बाहर लाना चाहती है. तो वहीं कांग्रेस ने भी पलटवार करते हुए बेकसूर आदिवासियों को जबरन जेल में बंद करने का आरोप लगाया है. इस पूरे मामले में बीजेपी प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी का कहना है कि इस मामले में सावधानी बरतने की जरूरत है. कांग्रेस का हमेशा से नक्सलियों पर नर्म रुख रहा है, ऐसा न हो इसकी आड़ में कोई नक्सली छूट जाए. वहीं कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि भाजपा ने अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने की हमेशा कोशिश की है. एक दशक से आदिवासी जेल में बंद है. ये न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है.

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