OPINION: नक्सल शीर्ष कमांडर सुधाकरण के आत्मसमर्पण की वजह और अहमियत 

सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों के लिए सुधाकरन इतना महत्वपूर्ण है कि अब तक आधिकारिक रूप से न तो राज्य सरकार की पुलिस और ना ही केंद्रीय एजेंसियों ने इसके आत्मसमर्पण का अधिकारिक बयान जारी किया है.

अमित पांडेय | News18 Chhattisgarh
Updated: February 13, 2019, 9:50 PM IST
OPINION: नक्सल शीर्ष कमांडर सुधाकरण के आत्मसमर्पण की वजह और अहमियत 
पूर्व नक्सली कमांडर सुधाकरण (फाइल फोटो)
अमित पांडेय
अमित पांडेय | News18 Chhattisgarh
Updated: February 13, 2019, 9:50 PM IST
सुधाकरण या फिर सुधाकरन्ना. यह शख्स सीपीआई माओवादी संगठन का अहम सदस्य था. सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों के लिए यह शख्स इतना महत्वपूर्ण है कि अब तक आधिकारिक रूप से न तो राज्य सरकार की पुलिस और ना ही केंद्रीय एजेंसियों ने इसके आत्मसमर्पण का अधिकारिक बयान जारी किया है. इस शख्स पर एक करोड़ 35 लाख रुपए का अधिकारिक सरकारी इनाम था. इसके अलावा उसकी पत्नी नीलिमा पर करीब 25 लाख रुपए का इनाम था. सुधाकरण की पत्नी स्टेट कमेटी की सदस्य थी, जिसके जिम्मे झारखंड और बस्तर के कोर इलाके आते हैं उसी की वह सदस्य थी. ऐसे में सबके मन में सवाल यह आना लाजमी है कि आखिरकार सुधाकरण क्यों इतना महत्वपूर्ण था और उसने आत्मसमर्पण क्यों किया.

सन् 1984 में यह शख्स नक्सल विचारधारा से प्रभावित होकर नक्सल आंदोलन में शामिल हो गया और अपनी गतिविधियां चलाने लगा. अपनी कार्यकुशलता और तेजी से हमले को अंजाम देकर फरार हो जाने की वजह से वह धीरे-धीरे नक्सलियों के शीर्ष नेतृत्व के नजर में आ गया. वर्ष 2000 के आसपास सुधाकरण को स्टेट कमेटी में जगह मिली जो छत्तीसगढ़ और बस्तर के इलाके की थी. यह वही वक्त था जब नक्सलियों की गतिविधियां अपने चरम पर थी. नक्सलियों के अलग-अलग गुट एक हुए और एक साथ अपनी गतिविधियां छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, झारखंड और बिहार में चलाने लगे.

इन सारे इलाकों में अलग-अलग वक्त पर बड़े बड़े नक्सली हमले हुए, लेकिन छत्तीसगढ़ में लगातार नक्सलियों का प्रभाव और गतिविधियां अन्य इलाकों के मुकाबले सबसे ज्यादा और मजबूत थी. नक्सलियों की सबसे प्रभावशाली यूनिट दंडकारण्य जोनल कमेटी जो कि दक्षिणी छत्तीसगढ़ में है. वहां पर सुधाकरण करीब 15 साल तक रहा. इस दौरान नक्सलियों ने एक के बाद एक ताबड़तोड़ हमले किए, जिसमें 73 सीआरपीएफ जवानों की हत्या 2010 में, उसके कुछ सालों बाद कांग्रेसी नेताओं पर कातिलाना हमला जैसी वारदातें प्रमुख हैं. इन सारी घटनाओं की प्लानिंग सुधाकरण की ही देखरेख में बनी थी और उसी के इशारे पर इसे अंजाम दिया गया.



फिर आया 2014 का साल, नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाबलों का ऑपरेशन लगातार बढ़ता चला आ रहा था और सबसे ज्यादा इसमें प्रभावित था झारखंड जहां कभी नक्सलियों की तूती बोलती थी. झारखंड में नक्सल संगठन खत्म हो रहा था. सीपीआईएम सर्वोच्च नेतृत्व को यह चिंता सताने लगी कि आखिरकार वहां वह अपने संगठन को कैसे जिंदा रखें. इधर, छत्तीसगढ़ दंडकारण्य जोनल कमेटी में सुधाकरण की कार्यकुशलता को उन्होंने देख लिया था. सुधाकरण का संगठन के प्रति समर्पित था, अनुशासनप्रिय था और युवाओं में जोश भरने का माद्दा रखता था.

लिहाजा, सुधाकरण का कद बड़ा कर उसे सीपीआईएम की बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी का सर्वे सर्वा बना दिया गया. इधर, उसकी पत्नी नीलिमा छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों जगह जरूरत के मुताबिक समय-समय पर अपनी गतिविधियां चला रही थी.

झारखंड के लातेहार, सिमडेगा, गढ़वा, गुमला आदि जैसे जिले सुधाकरण के निशाने पर थे. जहां उसने स्थानीय युवकों को नक्सल विचारधारा से प्रभावित करने की कोशिश की और नक्सल संगठन को एक बार फिर संगठित कर दोबारा जिंदा करने का काम शुरू कर दिया. यह सुधाकरण के ही प्रयास का नतीजा था कि वर्ष 2014 और 2015 में नक्सलियों के हमले झारखंड और बिहार के इलाकों में बहुत ज्यादा बढ़ गए थे. हालांकि यह हमले 2000 दशक की शुरुआत के मुकाबले इतने बड़े नहीं थे लेकिन ऐसे थे कि सुरक्षाबलों के ऑपरेशन को वह प्रभावित कर रहे थे. वहीं फिर सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ के साथ-साथ झारखंड और बिहार में भी नक्सलियों पर जवाबी कार्रवाई की जिस वजह से एक ओर नक्सलियों के काडर मारे जा रहे थे तो दूसरी तरफ शीर्ष कमांडर आत्मसमर्पण करने लगे थे.

सुधाकरण की हिम्मत टूटती जा रही थी. एक तो यह प्रमुख वजह थी और दूसरी अहम वजह यह थी कि सुधाकरण करीब 57 साल का हो चला था उसके पैर में और किडनी में दिक्कत पैदा हो गई थी. उसकी पत्नी नीलिमा को भी बहुत ज्यादा स्वास्थ्य की समस्या हो रही थी. संगठन को खड़ा करने के लिए केंद्रीय शीर्ष नेतृत्व से जितनी मदद मिलनी चाहिए थी, उतनी मदद हाल के दिनों में सुधाकरण को नहीं मिल रही थी. लिहाजा, सुधाकरण और उसकी पत्नी ने यह अहम निर्णय लिया.
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गौरतलब है कि नक्सलियों के संगठन की कमान बसवराज के हाथ में है जिसने महज कुछ ही महीनों पहले नक्सली संगठन की कमान संभाली थी. मिलिट्री वारफेयर में माहिर बसवराज का अपने काडर को स्पष्ट संदेश है कि वह अपने टारगेट को पक्का रखें और हमला बेहद खतरनाक करें. विचारधारा पर अमल करना और नक्सल विचार जागरूकता अभियान चलाना फिलहाल उसकी प्राथमिकता नहीं है जबकि सुधाकरण इन्हीं चीजों को आधार बनाकर झारखंड में अपने संगठन को खड़ा कर रहा था. सुरक्षा एजेंसी और खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक विचारधारा में मेल न खाना भी सुधाकरण के आत्मसमर्पण की प्रमुख वजहों में से एक हो सकती है.

सूत्रों के मुताबिक कोबार्ड गांधी के बाद सुधाकरण ही ऐसा बड़ा नेता है जिसने पिछले कुछ सालों में सुरक्षाबलों के सामने आत्मसमर्पण किया है. एक ओर यह सुरक्षा बलों के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है और नक्सलियों के लिए इस साल का सबसे बड़ा झटका, तो दूसरी और यह इस बात की ओर इशारा करता है कि कैसे नेतृत्व परिवर्तन के बाद नक्सली शीर्ष नेतृत्व के नेताओं में विचारधारा को लेकर बेहद गहरे मतभेद उभर रहे हैं. इस वजह से उनके इतने पुराने और मजबूत नेताओं तक को आत्मसमर्पण करना पड़ रहा है.

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