छत्तीसगढ़ के इन आदिवासियों से 'न्याय' करना भूल गई सरकार?

बस्तर में साल 2009 से 2014 तक आदिवासियों पर जितने भी आपराधिक मामले दर्ज किए गए, उनमें से 95.51 फीसदी मामलों में न्यायालय ने उनको बाइज्जत बरी कर दिया.

निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: May 19, 2019, 12:40 PM IST
छत्तीसगढ़ के इन आदिवासियों से 'न्याय' करना भूल गई सरकार?
Photo by Neelesh Tripathi.
निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: May 19, 2019, 12:40 PM IST
छत्तीसगढ़ सरकार बस्तर के लोहांडीगुड़ा में टाटा इस्पात संयंत्र के लिए आदिवासी किसानों की अधिग्रहित जमीन वापस करने के बाद एक और ऐतिहासिक फैसले की ओर कदम बढ़ा रही है. प्रदेश के घोर नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के सभी सात जिलों के साथ राजनांदगांव जिले में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के खिलाफ दर्ज प्रकरणों की समीक्षा शुरू कर दी गई है. इस मामले के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति एके पटनायक की अध्यक्षता में बनी विशेष समिति की पहली बैठक 13 मई को हो चुकी है. इस बैठक में प्रकरणों के आधार पर अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंप दी गई है.

विशेष समिति ने पहली बैठक में 1 हजार 141 प्रकरणों पर चर्चा की. उम्मीद जताई जा रही है कि इन प्रकरणों में जेलों में बंद 4 हजार से अधिक आदिवासी जल्द ही रिहा होंगे. समिति की अगली बैठक 22 जून को होगी. समिति द्वारा प्रत्येक प्रकरणों की उसके गुण-दोष के आधार पर समीक्षा कर संबंधित अनुसूचित जनजाति वर्ग के हित में न्यायोचित तरीके से समयबद्ध कार्रवाई करने का निर्णय लिया गया.  समिति नक्सल घटना से संबंधित प्रकरण, भारतीय दंड विधान की विभिन्न धाराओं एवं स्थानीय विशेष अधिनियम के तहत दर्ज प्रकरण, आबकारी अधिनियम से संबंधित प्रकरणों की समीक्षा कर रही है.



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आदिवासियों के लिए ऐतिहासिक फैसला

राज्य की कांग्रेस सरकार ने दिसंबर 2018 में एक ऐतिहासिक फैसला किया था. बस्तर में टाटा कंपनी के मेगा स्टील प्लांट लगाने के नाम पर 13 साल पहले आदिवासी किसानों से ली गई जमीन वापस कर दी है. देश में यह पहला मामला है, जब किसी उद्योग के लिए अधिग्रहित जमीन किसानों को वापस की गई है. बस्तर के चित्रकोट विधानसभा के लोहांडीगुड़ा इलाके में साल 2005 में आदिवासी किसानों की 1764.64 हेक्टेयर जमीन टाटा इस्पात संयंत्र को दी गई थी. छत्तीसगढ़ प्रदेश उद्योग विकास निगम ने जमीन का अधिग्रहण किया था.

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फिर क्यों उठ रहे सवाल?
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अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के खिलाफ दर्ज प्रकरणों की समीक्षा के लिए बनी विशेष समिति फिलहाल 8 जिलों में दर्ज मामलों की समीक्षा कर रही है. यही कारण है कि एक तबका इससे असंतुष्ट है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में 27 में 21 जिले आदिवासी बहुल हैं. इनमें से सरगुजा, कोरिया, जशपुर, सूरजपुर और बलरामपुर तो एक समय में घोर नक्सल प्रभावित जिले रहे हैं. इन जिलों के साथ ही कोरबा और रायगढ़ में भी आदिवासियों पर वन पट्टा अधिनियम और आबकारी अधिनियम के तहत मामले दर्ज होते रहे हैं. फिर भी यहां दर्ज प्रकरणों पर फिलहाल समीक्षा नहीं की जा रही है.

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सर्व आदिवासी समाज के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष बीपीएस नेताम ने न्यूज 18 से बातचीत में कहते हैं कि प्रदेश में बस्तर संभाग और राजनांदगांव जिले के अलावा और जिले भी नक्सल प्रभावित हैं. नक्सल प्रभावित जिलों के अलावा दूसरे जिलों में भी आदिवासियों पर गैरजरूरी कार्रवाई के मामले दर्ज हैं. विशेष समिति को अपनी समीक्षा में उन जिलों के प्रकरणों को भी शामिल कर निर्दोष आदिवासियों को रिहा करना चाहिए. तभी आदिवासियों के साथ सही मायने में न्याय होगा.

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जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के प्रवक्ता इकबाल रिजवी कहते हैं- सिर्फ आदिवासी ही क्यों? पूरे प्रदेश में ऐसे हजारों मामले दर्ज हैं, जिनमें निर्दोष जेल में हैं. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग हैं. यदि सिर्फ आदिवासी वर्ग की बात है तो सिर्फ 8 जिले ही क्यों पूरा प्रदेश क्यों नहीं? ऐसे सभी प्रकरणों की समीक्षा करनी चाहिए, जिनमें निर्दोष जेलों में बंद हैं, चाहे वो किसी भी वर्ग के हों. तभी सही मामले में न्याय होगा. बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास कहते हैं कि ऐसे प्रकरणों में सीधा फायदा नक्सलियों को मिल सकता हैं. इसलिए इसकी समीक्षा गहनता से करने की आवश्यकता है.

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क्योंकि आंकड़े हैरान करते हैं..
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल बताते हैं कि आदिवासियों पर दर्ज प्रकरणों जुड़े आंकड़ों पर गौर करें तो बस्तर संभाग में साल 2009 से 2014 तक आदिवासियों पर जितने भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए, उनमें से 95.51 फीसदी मामलों में न्यायालय ने आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया. यानी साफ है कि यहां जितने भी मामले दर्ज हुए, उनमें से ज्यादातर मामलों में जांच एजेंसी पुख्ता सबूत पेश ही नहीं कर पाई. बस्तर के अलावा दूसरे संभाग में इस तरह के एकतरफा आंकड़े नहीं हैं.

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आदिवासी मामलों में अच्छी समझ रखने वाले आलोक प्रकाश पुतुल कहते हैं कि प्रदेश के दूसरे आदिवासियों की तुलना यदि बस्तर के आदिवासियों से करें तो हम पायेंगे कि दूसरे जिलों में आदिवासी अपेक्षाकृत प्रगतिशील हैं. साथ ही उनमें कानून की समझ भी बस्तर के दूरस्थ इलाकों में रहने वाले आदिवासियों की अपेक्षा ज्यादा है. इसलिए ज्यादती का विरोध भी वो खुलकर कर लेते हैं.

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इनका क्या होगा?
वरिष्ठ पत्रकार पुतुल कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ नक्सल मामलों में आदिवासियों पर गैरजरूरी प्रकरण दर्ज किए गए हों. वन अधिकार पट्टा, पत्थलगड़ी, माइनिंग का विरोध करते कई मामले आदिवासियों पर दर्ज हैं. ये मामले सरगुजा और बिलासपुर संभाग के जिलों में काफी संख्या में हैं. इससे अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद लंबे समय तक सरगुजा में नक्सल समस्या चरम पर रही है. स्वभाविक है कि उस दौरान वहां के निर्दोष आदिवासी भी इसकी जद में आए होंगे. उन प्रकरणों को लेकर भी सरकार को उचित निर्णय लेने की जरूरत है.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल. फाइल फोटो.


अब अन्याय नहीं होगा
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मामले में चर्चा करते हुए कहते हैं कि पूर्व की बीजेपी सरकार ने आदिवासियों को परेशान करने के लिए उनपर झूठे प्रकरण दर्ज करवाये. इसलिए ही इन प्रकरणों की समीक्षा जरूरी है. बस्तर और राजनांदगांव में ऐसे कई प्रकरण हैं, जिनमें नक्सल हिंसा के मामलों में किसी एक का नाम दर्ज कर बाकी आरोपियों के लिए अन्य लिख दिया जाता था. बाद में निर्दोष लोगों को उन्हीं मामलों में जेलों में ठूंस दिया गया. हमारी सरकार इसके लिए वैधानिक व्यवस्था कर रही है. विशेष समिति द्वारा रिपोर्ट मिलने के बाद आगे निर्णय होगा. प्रदेश में किसी के साथ भी अन्याय नहीं होने दिया जाएगा.

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