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छेना धरके आगी मांगे के बहाना साग ला तको पूछ डरिस

कॉन्सेप्ट इमेज.

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कम खर्चा अउ सादगी हमर गांव के गहना हरय. दिनभर मिहनत करके संझा ताते तात खाए जाथे अउ आगी मांगे के बहाना सुख दुख के गोठ हाल समाचार तको समझ लेथे.

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कम खर्चा अउ सादगी हमर गांव के गहना हरय. दिनभर मिहनत करके संझा ताते तात खाए जाथे अउ आगी मांगे के बहाना सुख दुख के गोठ हाल समाचार तको समझ लेथे. गोठियाए के अच्छा तरीका हावय का साग रांधबे बस तहां लमा ले दिन भर के पुरती. रंधनही खोली के गुंगवावत आगी मा भितरहिन भुलाए रथे अपन रंधई गढ़ई मा. परोसिन के साग पुछई घलो एक ठन बुता होगे हे. का कहिबे चांउर के अंधना धरके साग पान ला पउले बर धरे रेहेंव ततके मा अंधना परोसिन के आरो पाके खोर डाहर निकले रेहेंव अइसे चिंतन चलत हे. थोकिन बइठले तको काहत नइ बनिस. लोग लइका वाला घर जल्दी रांधना गढ़ना हे. दिन भर बासी पेज अथान चटनी मा निकल जथे. रतिहा थोकिन बने ताते तात खवई पियई बने लागथे.

गोड़ हाथ लमाए सियान सियनहिन
लइकामन ला भुलवारत रइथें अतका सुघ्घर लागथे के थके जांगर घलो नइ जिमानय. बोरे सकेले अउ धोए मांजे तहां अपन थिरावत राह इही जीवन के सार हरय. सबो जगा अइसने होवय भगवान बस एही विनती हावय. काली जुवार फेर देखे जाही.

माटी के बुता हमर जिनगी के आधार
अन्न उपजारे बर माटी हमला धरती मईया देहावय पथरा कचरा ला टार के सीजन मा अन्न उपजाना हे. सबो कोती अपन अपन सीजन पानी के हिसाब मा अन्न फल, फूल कांदा कुसा , साग पान उपजाए जथे. बगरे – बगरे संसार मा का नइ मिलय बस किसनहा जांगर होना चाही. बइठे ठाल्हे कुछु नइ मिलने वाला हे. कइथे नहीं बईठे – बइठे रेहे मातरिया के पानी घलो नइ पूरय. गांव मा शासन कसके रइथे. एक घांव हांका परगे तहां गांव बधागे. आज काल के नवा – नवा नियम ला सबो झन ला जाने सुने रइथें तरिया पइठू , खेती खार सबो जरूरत के जगा मा मेल मुलाकात होतेच रइथे नइ चिन्हंव वाला बाते नइ राहय. काम अइसे बंटे हे के बारों महिना माटी संग मितानी. अपन बर अउ कतको झन बर अन्न उपजाना हे.

जरूरत के सामान मा बलदा घलो होथे
धान पान , ओन्हारी सियारी , जंगली उपज सबो बजार मा सकलाथे अउ अपन कीमत पाथे. कीमत के सौदा अब पक्का होगे हे. ठग फुसारी के जमाना गय. किराना समान मा अनाज हमर सबले मददगार होथे. कतको बेर होवय काठा दू काठा निकाल टुकना मा धर अउ जाके दुकानी कर ले. घर जिनगी के सबो काम तोरेच हाथ बात माहे.

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