कपड़ों की रंगाई की दुनिया में मान बढ़ा रही है बस्तर की ये अनूठी कला, स्टडी के लिए आई न्यूयॉर्क की टीम

प्राकृतिक रंगाई के बाद तैयार धागे.

प्राकृतिक रंगाई के अनूठे तरीके और संसाधनों के बारे में स्टडी के लिए न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ़ आर्ट, (द मेट) की टीम छत्तीसगढ़-ओडिशा की सीमा पर स्थित कोटपाड आई थी.

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कपड़ों की नेचुरल डाइयिंग (प्राकृतिक रंगाई) की दुनिया में बस्तर की एक अनूठी और दुर्लभ कला मान बढ़ा रही है. प्राकृतिक रंगाई के इस अनूठे तरीके और संसाधनों के बारे में स्टडी करने के लिए न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ़ आर्ट, (द मेट) की टीम छत्तीसगढ़-ओडिशा की सीमा पर स्थित कोटपाड आई थी. टीम ने स्थानीय जनजाति पनकी द्वारा धागों पर की जाने वाली प्राकृतिक रंगाई और उससे तैयार किए जाने वाले कपड़ों के बारे में जाना और राज्य सरकार से इसे बढ़ावा देने की अनुसंशा भी की.

न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ़ आर्ट, (द मेट) से दो सदस्यीय टीम दिसंबर 2018 में कोटपाड आई थी, जिसमें द मेट की सहायक संरक्षक येल रोसेनफील्ड, बुनाई विशेषज्ञ एलिस शामिल थीं. द मेट की इस टीम का नेतृत्व नेचुरल डाइयिंग की जानकार और कपड़ा विशेषज्ञ नीलकर संस्था की संचालक कमलदीप कौर ने किया.

कोटपाड गांव में द मेट की सहायक संरक्षक येल रोसेनफील्ड, बुनाई विशेषज्ञ एलिस.


कमलदीप कौर ने न्यूज 18 को बताया कि पनकी आदिवासी समुदाय द्वारा कोटपाड में नेचुरल डाइयिंग का काम किया जाता है. ये समुदाय इस क्षेत्र का बुनकर है. छत्तीसगढ़ के बस्तर और ओडिशा की सीमा पर बसे इस समुदाय द्वारा कपड़ों की प्राकृतिक रंगाई का ये काम 500 साल से भी अधिक समय से किया जा रहा है. कमलदीप बताती हैं कि बस्तर के जगदलपुर के जंगलों में पाए जाने वाले आल के पेड़ की जड़ से नेचुरल कलर तैयार किया जाता है. आल का पेड़ दुनिया में कुछ चुनिंदा स्थानों पर ही मिलता है. देश में संभवत: बस्तर में ही इसे अब तक पाया गया है. इंडोनेशिया और थाईलैंड में कुछ स्थानों पर नेचुरल डायिंग की यही पद्धति अपनाई जाती है, जो भारत में पनकी समुदाया द्वारा अपनाई जा रही है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ रही है मांग
कमलदीप कौर ने बताया कि कैमिकल द्वारा की जाने वाली रंगाई वाले कपड़ों की मांग कम हो रही है और प्राकृतिक रंगाई कर तैयार किए जाने वाले टेक्सटाइल मटेरियल की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ रही है. इसके तहत ही द मेट की टीम भारत आई थी और वो उन जगहों पर अध्ययन के लिए गई, जहां आज भी नेचुरल डाइयिंग की जाती है. इसमें कोटपाड में की जाने वाली नेचुरल डाइयिंग को उस टीम ने काफी सराहा और इसे बढ़ावा देने के लिए मदद करने की बात भी कही. इसके लिए म्यूजियम बनाने में मदद करने का प्रस्ताव भी स्थानीय प्रशासन को दिया गया.


अपनाते हैं ये अनूठी प्रक्रिया
कमलदीप कौर बताती हैं कि पनकी समुदाय के लोग आज भी नेचुरल डाइयिंग की सालों पुरानी प्रक्रिया को ही अपनाते हैं. इसके तहत आल की जड़ की छाल को लकार सुखाते हैं. फिर उसकी पिसाई कर पाउडर बना लेते हैं. इसी दौरान सफेद धागे को कम से कम 24 घंटे तक पानी में डूबाए रखते हैं. फिर उसे पानी से निकालकर धागे को जाड़ा तेल में मिलाते हैं. फिर निचोड़कर धागे पर गोबर लगाते हैं. इसके बाद धागे को सुखाते हैं. धागे के सुखते तक एक बर्तन में पानी में राख मिलाकर उबालते हैं. धागे के सूखजाने के बाद उसे इसी राख के पानी से धोते हैं और फिर सुखा देते हैं. फिर एक तय मात्रा में आल पेड़ की छाल से बने पाउडर को पानी घोलते हैं और उसमें सूखे धागे को डूबा देते हैं. इसके बाद फिर धागे को सुखाते हैं. धागा सुखने के बाद दो बार उसे राख पानी में उबालते हैं. उबालने के बाद उसे फिर धोकर सुखा देते हैं. इसके बाद ये धागा कपड़ा बुनने के लिए तैयार हो जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में 15 से 20 दिन का समय लग जाता है.

कलर बदलने के लिए पत्थर का प्रयोग
आल की पेड़ की छाल से सिर्फ लाल रंग ही बनता है. जबकि पनकी समुदाय के लोग लाल के अलावा डार्क ब्राउन कलर से भी नेचुरल डाइयिंग करते हैं. इसके लिए वो जगदलपुर में पाए जाने वाले हीराकशी पत्थर का उपयोग करते हैं. आल की छाल का पाउडर का घोल तैयार करते समय वे उसमें हीराकशी पत्थर के पाउडर भी मिला देते हैं. इससे डार्क ब्राउन कल तैयार हो जाता है. इन दो रंगों का उपयोग ही वे करते हैं.

पौधे को बचाने की पहल
पनकी समुदाय के लोग जंगलों से आल के पेड़ की जड़ (वैज्ञानिक रूप से मोरिंडा सिट्रिफ़ोलिया के रूप में जानी जाती है) को ही ले आते थे और प्रक्रिया कर प्राकृतिक रंग तैयार कर कपड़ों की रंगाई करते थे, लेकिन धीरे धीरे जागरुकता बढ़ी और पता चला कि ये दुर्लभ प्रजाति का पौधा विलुप्त हो रहा है. इसलिए अब जड़ों की छाल निकालते हैं और जड़ को फिर से मिट्टी से भर देते हैं. ताकि पेड़ भी बचा रहे.

रायपुर में ट्रेनिंग देने की तैयारी
कमलदीप कौर ने बताया कि नेचुरल डाइयिंग को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय प्रशासन की मदद से ट्रेनिंग कैंप लगाने की तैयारी चल रही है. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इस ट्रेनिंग कैंप का आयोजन किया जाना प्रस्तावित है. इसकी तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. इसमें वे खुद ट्रेनिंग देने आएंगी. इसके अलावा नेचुरल डाइयिंग के एक्सपर्ट जयपुर के विक्रम जोशी से भी ट्रेनिंग देने के लिए संपर्क किया जा रहा है. इस ट्रेनिंग कैंप में समुदाय के लोगों को आसान प्रक्रिया से नेचुरल डाइयिंग करने के तरीके बताए जाएंगे.


बाजार में इस तरह बढ़ रही पकड़
पनकी समुदाय के लोग पहले स्थानीय लोगों के लिए वहां उपयोग किए जाने वाले कपड़े जैसे लुंगी, गमछा बनाते थे, लेकिन धीरे धीरे जागरुकता बढ़ रही है और वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर बढ़ रहे हैं. इसके तहत लेडिज कुर्ती, साड़ी, स्टॉल सहित अन्य फैंसी कपड़े भी तैयार किए जा रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इनकी मांग बढ़ रही है. पनकी समुदाय की महिलाएं रंगाई का काम करती हैं और पुरुष साड़ी और दुपट्टे सहित सुंदर कपड़े बुनते हैं, इसलिए समुदाय को अपनी तरह का बना लेते हैं, जहां महिलाएं विशेष रूप से रंगाई प्रक्रिया में शामिल होती हैं.

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