लाइव टीवी

'इस समाज में क्या इंसान सिर्फ बच्चा पैदा करने की फैक्ट्री हैं?'

निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: December 4, 2019, 5:55 PM IST
'इस समाज में क्या इंसान सिर्फ बच्चा पैदा करने की फैक्ट्री हैं?'
राज्यसभा में 26 नवंबर 2019 को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल- 2019 पास हो गया है. न्यूज 18 क्रिएटिव.

'हमारी सोसायटी के ज्यादातर लोग एक निश्चित सोच ले कर चलते हैं कि लड़का पैदा हुआ तो वो लड़की से शादी करेगा और बच्चा पैदा करेगा, जिससे वंश आगे बढ़ेगा.'

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 4, 2019, 5:55 PM IST
  • Share this:
रायपुर. राज्यसभा (Rajya Sabha) में 26 नवंबर 2019 को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल- 2019 पास हो गया है. थर्ड जेंडर (Third gender) अधिकारों का संरक्षण करने वाले इस बिल (विधेयक) को लोकसभा (Lok Sabha) में पहले ही मंजूरी दे दी गई है. इस विधेयक के दायरे में एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) ग्रुप को शामिल किया गया है. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें इस विधेयक का सीधा लाभ मिलेगा. ऐसे में हमने जानने की कोशिश की कि उनके प्रति समाज का क्या रवैय्या है, उनके क्या हालात हैं और विधेयक से लाभ की क्या उम्मीद है?

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में गे वर्ग के अधिकार के लिए काम कर रहे दुर्ग (Durg) के पंकज बजारी (बदला नाम) कहते हैं- 'मैं खुद गे हूं. मैंने निडर होकर सबके सामने ये बात रखी. मेरे मां-पिता और परिवार वाले मेरी बात को समझे, मुझे स्वीकार भी किया, लेकिन सोसायटी के ज्यादातर लोग एक निश्चित सोच ले कर चलते हैं कि लड़का पैदा हुआ तो वो लड़की से शादी करेगा और बच्चा पैदा करेगा, जिससे वंश आगे बढ़ेगा. अब यदि लड़का ऐसा नहीं कर रहा है तो विरोध होगा, जिल्लत होगी. मेरी लेसबियन फ्रेंड्स भी हैं, उन्हें भी यही सब झेलना पड़ता है. उनकी तो बात सुनने तक की कोशिश नहीं की जाती. इस समाज में इंसान क्या सिर्फ बच्चा पैदा करने की फैक्ट्री है?.''

Chhattisgarh News, LGBTQ
रायपुर में एलजीबीटीक्यू के सपोर्ट में निकाली गई रैली में शामिल युवा. फाइल फोटो.


प्रकृ​ति ने हमें ऐसा ही बनाया है

पंकज के साथ ही बैठे उनके दूसरे गे दोस्त रायपुर के सलीम (बदला नाम) कहते हैं- 'जब भी हम किसी से इस संबंध में बात करने की कोशिश करते हैं तो लोग हमें मनोरोगी समझते हैं. समझाने की पूरी कोशिश करते हैं, इलाज की सलाह भी देते हैं. कहते हैं कि प्रकृति या उपरवाले की बनाई व्यवस्था से छेड़छाड़ मत करो, लेकिन उन्हें कौन समझाए कि प्रकृति ने ही हमें ऐसा बनाया है. चाहकर भी हम वो नहीं कर सकते, जिसकी सब उम्मीद पाल रखे हैं. कानून से इतना फर्क तो जरूर पड़ेगा कि हम अपनी बात खुलकर रख सकते हैं.'

Chhattisgarh, Raipur
29 सितंबर 2019 को रायपुर के तेलीबांधा में एलजीबीटी समूह के अधिकार के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया गया. फाइल फोटो.


..तो भाई बहनों की शादी नहीं होगी
Loading...

एलजीबीटीक्यू ग्रुप से जुड़े भिलाई के संतोष (बदला नाम) का कहना है- 'वे दो भाई व एक बहन में से सबसे बड़े हैं. एक साल पहले परिवार वालों ने मेरी शादी के लिए लड़की पसंद की. मेरी राय मांगी गई तो मैंने घर वालों को सबकुछ सच बता दिया. परिवार वालों ने गुस्से और प्यार दोनों तरीकों से समझाने की कोशिश की. मैं नहीं माना. घर में मातम सा छा गया. मैंने कहा कि मैं घर छोड़ देता हूं तो परिवार वालों ने कहा यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम्हारे भाई और बहन से कौन शादी करेगा. मैंने कहा कि मैं अपने आप को नहीं बदल सकता तो घरवालों ने कहा कि भाई-बहन की शादी हो जाने दो फिर अपनी मर्जी का कर लेना.'

Chhattisgarh News
विद्या राजपूत.


परिवार बसता नहीं बर्बाद होता है
देशभर में एलजीबीटीक्यू ग्रुप के लिए काम करने वाली संस्था मितवा समिति की अध्यक्ष विद्या राजपूत कहती हैं- 'ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल सोसायटी के लिए नई व्यवस्था है. इसे अपनाने में समय लगेगा, लेकिन इस बिल के अमल में आने के बाद एलजीबीटीक्यू ग्रुप का आत्मबल जरूर मजबूत होगा. उन्हें खुलकर अपनी बात रखने का अधिकार होगा. उम्मीद है कि समाज में भी काफी बदलाव आएगा. गे, लेशबियन हों या ट्रांसजेंडर सभी को परिवार व समाज के लोग समझाने की कोशिश करते हैं कि लड़का हो तो लड़की और लड़की हो तो लड़के से प्यार करो और परिवार बसाओ, लेकिन वो नहीं समझते कि एलजीबीटीक्यू ऐसा करेगा तो परिवार बसेगा नहीं बर्बाद होगा.'

Chhattisgarh
रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में ढोल नगाड़े बजाए गए. फाइल फोटो.


विश्व एड्स दिवस पर नेशनल लीडरशिप अवार्ड 2020 से सम्मानित विद्या राजपूत कहती हैं- 'गे की लड़की या लेशबियन की शादी लड़के से करा दी जाए तो उनके सेक्सुअल पावर में कमी नहीं आती. दोनों के संबंधों से समान्य जोड़ों की तरह बच्चा भी पैदा होगा. मैं ऐसे कई लोगों को जानती हूं, जिन्होंने परिवार व समाज के दबाव में ऐसा किया है, लेकिन एक बच्चा पैदा होने के बाद वे अपने पार्टनर से दूर हो जाते हैं. एक दूसरे के प्रति प्यार नहीं रहता. ऐसे में शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अवैध संबंध बनते हैं, कलह होती है. इससे परिवार बसने की बजाय बर्बाद हो जता है. ऐसा करने से बेहतर है कि शुरू में ही उनकी बात मान ली जाए और खुशी से जीने का अधिकार दे दिया जाए.'

Chhattisgarh
राजधानी रायपुर में निकाली गई रैली. फाइल फोटो.


छत्तीसगढ़ में 25 हजार से ज्यादा एलजीबीटीक्यू
मितवा समिति की उपाध्यक्ष रवीना बारिया दावा करती हैं कि उनकी समिति की पहल पर देश में पहली बार किन्नर विवाह का आयोजन 30 मार्च 2019 को किया गया. रवीना बताती हैं कि छत्तीसगढ़ में ही एलजीबीटीक्यू समूह के करीब 25 हजार लोग है. 3 हजार लोग तो उनकी ही समिति के संपर्क में हैं. परिवार व समाज के दबाव में लोग खुलकर सामने नहीं आते. हालांकि समिति की पहल पर प्रदेश में तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड का गठन किया गया है. समाज के ज्यादातर लोग एलजीबीटीक्यू समूह के सभी लोगों को हिजड़ा समझते हैं. लोगों को बड़े पैमाने पर जागरूक करने की जरूरत है. कानून बनने के बाद शायद ये काम आसान हो.

Chhattisgarh, Dr Devendra Ratnani
भिलाई में अपनी क्लीनिक में काउंसलिंग करते डॉ. देवेन्द्र रत्नानी.


परिवार वालों की काउंसलिंग जरूरी
छत्तीसगढ़ के नामी मनोरोग विशेषज्ञ, काउंसलर डॉ. देवेन्द्र रत्नानी कहते हैं- 'देश में होमो सेक्सुअलिटी कोई अपराध नहीं रहा. मेडिकल साइंस ने भी इसे बीमारी के दायरे से बाहर कर दिया है. मेरे पास ऐसे कई केस आते हैं. मैं बच्चों से पहले उनके परिवार वालों की काउंसलिंग करता हूं. क्योंकि ऐसे बच्चे पारिवारिक व सामाजिक डर के कारण काफी डिप्रेशन में रहते हैं. प्राइमरी सपोर्ट सिस्टम घर से ही बनता है. इसलिए परिवार वालों की काउंसलिंग ज्यादा जरूरी होती है. हालांकि कई केस में परिवार वाले हमसे नाराज हो जाते हैं. कहते हैं मेरा बच्चा तो पहले से पागल है, आप उसका सपोर्ट कर और पागल बना देंगे.'

डॉ रत्नानी कहते हैं- 'परिवार व समाज के व्यावहार के कारण एलजीबीटीक्यू समूह के लोग डिप्रेशन में रहते हैं. ऐसे लोग बहुत ही संवेदनशील होते हैं. बुरे बर्ताव के कारण वे आत्महत्या तक कर लेते हैं. एलजीबीटीक्यू अपने समूह पर काफी भरोसा करते हैं, लेकिन मेरे पास ऐसे भी कुछ केस आए, जब इन्हें अपने ही समूह के लोगों से धोखा मिला. ऐसी  स्थिति में वे ज्यादा डिप्रेशन में चले जाते हैं. मेरे एक गे पेशेंट ने अपने साथी से धोखा मिलने पर आत्महत्या की कोशिश कर ली. कानून से उम्मीद है कि इनकी लाइफ स्टाइल में सुधार होगा और एक समय के बाद समाज इन्हें स्वीकार करेगा.'

Chhattisgarh
News 18 Creative.


होमो सेक्सुअलिटी, मां-पिता की क्या भूमिका?
इंडियन साइकेट्रिस्ट एसोसिएशन के लाइफ टाइम मेंबर डॉ. रत्नानी ने बताया कि दुर्ग में उनकी रिपोर्ट के आधार पर करीब 30 लोगों का थर्ड जेंडर कार्ड शासन द्वारा बनाया गया है. रत्नानी बताते हैं- 'बच्चों में होमो सेक्सुअलिटी के प्राकृतिक व मेडिकल कारणों के अलावा मां-पिता व परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है. कई बार महिला के प्रेगनेंसी के दौरान परिवार की जो चाहत होती है, उसके विपरित बच्चा पैदा हो जाता है. लड़के की चाहत है और लड़की पैदा हो गई तो उसके साथ लड़कों की तरह व्यावाहर किया जाता है, वैसा ही पहनावा वैसी ही बातचीत. यही स्थिति लड़की की चाहत में लड़का पैदा होने पर भी रहती है. इसका असर बच्चों मानसिक स्थिति पर पड़ता है और बच्चे का दिमाग खुद को वो मानने से इनकार कर देता है, जो वो है. ऐसे में परिवार व मां-पिता को भी शुरू से जागरूक रहने की जरूरत है.'

Chhattisgarh News
रायपुर एलजीबीटीक्यू समूह के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया. फाइल फोटो.


डॉ. रत्नानी बताते हैं- 'करीब दो साल पहले उनके पास ऐसा ही एक केस आया था. अल्पसंख्यक समुदाय की एक लड़की को उसके परिवार वालों ने काउंसलिंग के लिए ​लाया. 32 साल की होने के बाद भी लड़की बार-बार शादी से इनकार कर रही थी. काउसंलिंग के दौरान उसने बताया कि उसका आकर्षण लड़कियों के प्रति रहता है. उनके साथ ही रहने में अच्छा लगता है. घर वालों की काउंसलिंग में पता चला कि अपने मां-पिता की ये तीसरी बेटी थी. दूसरी और तीसरी बार जब उसकी मां प्रेगनेंट हुई तो उन्हें उम्मीद थी कि लड़का पैदा होगा, लेकिन लड़की ही हुई. ऐसे में तीसरी बेटी से उन्होंने लड़के की तरह व्यावहार किया. लड़कों की तरह ही कपड़े पहनाए, बातचीत में वैसा ही व्यावहार किया. इसके चलते लड़की खुद को लड़का मानने लगी.'

Chhattisgarh News, CG, LGBTQ
रायपुर में आयोजित एलजीबीटीक्यू के एक कार्यक्रम में उपस्थित विद्या राजपूत व अन्य. फाइल फोटो.


लाइफ स्टेटस बदलेगा
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल कहते हैं- 'एजजीबीटीक्यू समूह ने अपने हक के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है. कानूनी मान्यता मिलने के बाद सामाजिक मान्यता मिलने में थोड़ी सहुलियत होती है. इसलिए कानून बनने से इनको लाभ जरूर मिलेगा. समाज को इन्हें अपनाने में समय जरूर लगे, लेकिन कानून बन जाने के बाद इनकी लाइफ स्टेटस में काफी बदलाव होने की संभावना है. क्योंकि वर्तमान में ऐसे ज्यादातर लोग समाज से कटे ही रहते हैं. कानूनी मान्यता मिलने से वे समाज में सबके साथ और सबके बीच रह सकते हैं.'

ये भी पढ़ें:
छत्तीसगढ़: बस्तर में अपने ही साथियों को क्यों मार रहे हैं नक्सल मोर्चे पर तैनात सुरक्षा बल के जवान? 

छत्तीसगढ़ की वो मां, जो अपने 'गे' बेटे के लिए दूल्हा लाने तैयार है  

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए रायपुर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: December 4, 2019, 2:37 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...