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छत्तीसगढ़: भूपेश बघेल सरकार ने महाधिवक्ता को क्‍यों बदला? पढ़ें इनसाइड स्‍टोरी

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल. फाइल फोटो.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल. फाइल फोटो.

कनक तिवारी को हटाकर सतीश चन्द्र वर्मा को महाधिवक्ता बनाए जाने के बाद छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार पर नियुक्तियों के मामले में मनमानी करने के आरोप लग रहे हैं.

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छत्तीसगढ़ में 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस पार्टी की भूपेश बघेल सरकार पर नियुक्तियों में मनमानी के आरोप लग रहे हैं. ताजा मामला महाधिवक्ता पद से कनक तिवारी को हटाकर सतीश चन्द्र वर्मा को नियुक्त करने का है. पांच महीने पहले ही भूपेश सरकार ने कनक तिवारी को महाधिवक्ता बनाया था. अब इसी पद पर नई नियुक्ति ने नये विवाद को भी जन्म दे दिया है. जानकार इसे सरकार का जल्दबाजी में लिया गया फैसला बता रहे हैं तो राजनीतिक विरोधी सरकार पर निशाना साध रहे हैं. राजनीतिक बयानबाजी कर हंगामा मचाया जा रहा है.

दरअसल, सरकार और कनक तिवारी में पद से इस्तीफे को लेकर बड़ा विरोधाभास है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल खुद कह चुके हैं कि कनक​ तिवारी ने इस्तीफा दिया, जिसे मंजूर कर लिया गया. मुख्यमंत्री ने ये बयान 31 मई की शाम को दिया और इसके कुछ देर बाद ही कनक तिवारी ने इस्तीफे का खंडन कर दिया. कनक तिवारी सार्वजनिक तौर पर कह रहे हैं कि जब मैंने इस्तीफा दिया ही नहीं तो मंजूर कहां से हो गया. अपने फेसबुक अकाउंट पर कनक तिवारी लगातार पोस्ट कर रहे हैं. इस मामले में मीडिया से भी वे खुलकर बात कर रहे हैं.

एक जून को सरकार की ओर से नए महाधिवक्ता के रूप में सतीश चन्द्र वर्मा के नाम का ऐलान कर दिया गया. अब इस मामले को लेकर बीजेपी, छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जे) सहित हर वर्ग से सरकार पर निशाना साधा जा रहा है. नियुक्तियों में मनमानी के आरोप लग रहे हैं.

फेसबुक पर कनक तिवारी और उनकी पत्नी की पोस्ट की गई फोटो.


करीबी से दूरी क्यों?
79 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री, छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यकारी अध्यक्ष, मध्य प्रदेश लघु उद्योग निगम तथा मध्य प्रदेश गृह निर्माण मंडल के अध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके हैं. उन्‍‍‍‍‍हें मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ सहित कांग्रेस के आलाकमान का भी करीबी माना जाता है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर 5 महीने में ऐसा क्या हुआ जो उन्हें महाधिवक्ता के पद से सरकार को हटाना पड़ा? 27 दिसंबर 2018 को कनक तिवारी को छत्तीसगढ़ का महाधिवक्ता नियु​क्त करने का ऐलान खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किया था.

पत्र से बवाल
सूत्रों के मुताबिक महाधिवक्ता बनाए जाने के बाद कनक तिवारी ने व्यवस्था में अनियमिता को लेकर सरकार को कई पत्र लिखे थे. इसके अलावा कुछ नियुक्तियों पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए थे. इसके बाद से ही सरकार और महाधिवक्ता कनक तिवारी के बीच मनमुटाव की स्थिति बनी. कनक तिवारी ने न्यूज 18 को बताया कि उन्होंने सरकार को कई पत्र अलग-अलग मामलों में लिखे, लेकिन इस्तीफा कभी नहीं दिया न अपने पद से हटने की इच्छा जताई. हालांकि, पत्र किस संबंध में लिखे गए, इसको लेकर उन्होंने नहीं बताया. सूत्रों के मुताबिक नियुक्ति के बाद जनवरी में लिखे एक पत्र को इस्तीफे का आधार पर बनाकर कनक तिवारी को पद से हटाया गया.

कनक तिवारी का सम्मान करते भूपेश बघेल. फाइल फोटो.


पद खाली ही नहीं तो नियुक्ति कैसे?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 165 के अनुसार राज्यपाल द्वारा महाधिवक्ता की नियुक्ति की जाती है. महाधिवक्ता राज्यपाल के प्रसादपर्यंत कार्य करता है. राज्यपाल द्वारा महाधिवक्ता को कभी भी उसके पद से हटाया जा सकता है. कनक तिवारी अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखते हैं, 'संविधान के प्रावधानों के अनुसार महाधिवक्ता का यदि कोई त्यागपत्र होता है तो उसे राज्यपाल द्वारा ही स्वीकार किया जा सकता है, किसी अन्य द्वारा नहीं. इसलिए आज मैंने छत्तीसगढ़ की महामहिम राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मिला और उन्हें ज्ञापन दिया है.'

कनक तिवारी ने आगे लिखा, 'ज्ञापन में संक्षेप में वे सारी बातें बताई हैं कि किस तरह उनका त्यागपत्र हुआ ही नहीं. लिखा ही नहीं गया फिर भी कथित हवाला देकर कि मुझे काम करने की अनिच्छा है. एक आदेश करवा दिया गया जिसमें मुझे महाधिवक्ता न समझते हुए मेरी जगह अन्य महाधिवक्ता की नियुक्ति कर दी गई. दोनों काम एक ही अधिसूचना में कर दिया गया. मुझे उम्मीद है कि इस संबंध में आगे मुनासिब कार्रवाई होगी.'


पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह. फाइल फोटो.


निशाने पर सरकार
कनक तिवारी मामले को लेकर विपक्षी दल बीजेपी ने सरकार पर निशाना साधा है. पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ट्वीट किया 'सीएम भूपेश बघेल जी राजनैतिक पद की समय सीमा होती है परन्तु देश का संविधान सर्वोपरि है. आपके शासनकाल में राज्य के महाधिवक्ता को अपने पद पर कर्तव्य निर्वहन करने के लिए राज्यपाल की शरण लेनी पड़ रही है. आपने जनादेश प्राप्ति के बाद जिस संविधान के अंतर्गत शपथ ली थी उसका पालन करें.'



पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जे के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने भी सरकार पर निशाना साधा है. अमीत जोगी ने मामले को लेकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को पत्र भी लिखा है. इसमें नए महाधिवक्ता सतीश चन्द्र वर्मा की नियुक्ति को लेकर भी सवाल किए गए हैं.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल. फाइल फोटो.


सरकार का पक्ष
राज्य के विधि और विधायी कार्य मामलों के मंत्री मो. अकबर ने महाधिवक्ता मामले को लेकर मीडिया में बयान दिया. मो. अकबर ने कहा कि नए महाधिवक्ता की नियुक्ति नियमानुसार ही की गई है. इस मामले में कोई भी अनियमिता या मनमानी नहीं की गई है. नए महाधिवक्ता की नियुक्ति के बाद बीते 3 जून को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा. 'कनक तिवारी मेरे ससुर के साथ पढ़े हैं. मैं उनके पैर छूता हूं, लेकिन उनकी नियुक्ति को लेकर विधि विभाग ने निर्णय लिया है.'

बैकफुट पर है सरकार
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों में जानकार दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं कि महाधिवक्ता की नियुक्ति भले ही राज्यपाल द्वारा की जाती है, लेकिन इस प्रक्रिया में सरकार की ही भूमिका महत्वपूर्ण होती है. महाधिवक्ता का चयन सरकार द्वारा ही किया जाता है. कनक तिवारी के मामले में मुझे लगता है कि सरकार की ओर से जल्दबाजी की गई है. यदि कनक तिवारी ने इस्तीफा नहीं दिया था तो मुख्यमंत्री को ये कहने की आवश्यकता नहीं थी कि इस्तीफा मंजूर हो गया है. इस बयान के बाद सरकार बैकफुट पर है. क्योंकि कनक तिवारी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने दिया ही नहीं. बगैर इस्तीफा दिए भी महाधिवक्ता को राज्यपाल को विश्वास में लेकर हटाया जा सकता है. सरकार को ऐसा ही करना था.

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