नक्सल विरोधी मुहिम में क्यों सफल होंगी बस्तर की आदिवासी महिला लड़ाकू?
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नक्सल विरोधी मुहिम में क्यों सफल होंगी बस्तर की आदिवासी महिला लड़ाकू?
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छत्तीसगढ़ पुलिस ने पहली बार नक्सल विरोधी मुहिम के लिए महिला डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) यूनिट का गठन किया है.

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12 जुलाई 2009..छत्तीसगढ़ के मदनवाड़ा में पुलिस पार्टी पर हमला. एसपी विनोद चौबे सहित 29 जवान शहीद. अलग अलग घटनाओं में यहां एक ही दिन में जिला पुलिस बल के 30 समेत 36 जवानों की हत्या. 6 अप्रैल 2010 दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में सीआरपीएफ पर अब तक का सबसे बड़ा हमला. 76 जवान शहीद. 25 मई 2013 कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर बस्तर के दरभा के जीरमघाटी में नक्सली हमला. प्रदेश कांग्रेस के आला नेता नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा समेत 29 लोगों की हत्या. 24 अप्रैल 2017 सुकमा के बुरकापाल में सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगे जवानों पर नक्सली हमला. 25 जवान शहीद.

छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा की ये वे बड़ी घटनाएं हैं, जिनमें काफी तादात में महिला नक्सली शामिल रहीं. मदनवाड़ा और ताड़मेटला की घटनाओं का कथित वीडियो भी बाद में वायरल हुआ. इसमें महिला नक्सली लीड करती नजर आईं. हालांकि इन वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई. छोटी-बड़ी कई अन्य नक्सल हिंसाओं में महिला नक्सलियों की बड़ी तादात में शामिल होने का इनपुट पुलिस को मिलता रहा है. सूत्रों के मुताबिक बस्तर में सक्रिय नक्सलियों के संगठन में बड़ी संख्या में महिला कैडर हैं. सवाल ये है कि इनका जिक्र यहां क्यों किया जा रहा है?

ट्रेनिंग लेती दंतेश्वरी बटालियन की सदस्य. फाइल फोटो.




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दरअसल छत्तीसगढ़ पुलिस ने पहली बार नक्सल विरोधी मुहिम के लिए महिला डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) यूनिट का गठन किया है. बस्तर के घोर नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा में जिले से इनकी शुरुआत की है. 30 सदस्यीय इस यूनिट में बस्तर की स्थानीय महिला लड़ाकू हैं, जिन्हें दंतेश्वरी बटालियन नाम दिया गया है. इनमें से नक्सल संगठन छोड़ मुख्यधारा में जुड़ने वाली 10 महिला कैडर हैं. इसके आलावा बाकी में ज्यादातर वे महिलाएं हैं, जो सलावा जुडूम के दौरान नक्सल हिंसा से पीड़ित होने के बाद पुलिस की पहले एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) और जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद गोपनीय सैनिक बना दी गईं.

File Photo.


क्यों सफल होंगी महिला लड़ाकू?
सीआरपीएफ की बस्तरिया बटालियन बस्तर के लाल कॉरिडोर कहे जाने वाले इलाकों में पहले से तैनात हैं. इस बटालियन में 33 फिसदी युवतियां हैं. इससे पहले अलग अलग जिलों में महिला कमांडो की नियुक्ति भी पहले की जा चुकी है. ऐसे में ​डीआरजी में महिलाओं को शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी का जवाब जानें. इससे पहले जानते हैं कि नक्सल विरोधी मुहिम में बस्तर की आदिवासी महिला लड़ाकू क्यों सफल हो सकती हैं?

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बस्तर के संदर्भ में आदिवासी स्त्रियों का उल्लेख करते हुए डॉ. केएल कामत और ज्योत्सना कामत ने आदिवासी समाज में स्त्री शीर्षक के अपने शोध पत्र में लिखा है- अपनी गति और लंबी दूरी के पदचालन के लिए उनका कोई सानी नहीं है. एक दिन में 40 से 50 किलोमीटर तक सर पर भारी बोझ ढोये वे कठिन पर्वतीय रास्तों पर चल लेती हैं. कई दिन तक भूख सहना भी उनकी स्वभाविक जीवन शैली है. इस शोध पत्र का जिक्र बस्तर की परिस्थितियों पर आधारित किताब बस्तरनामा में है.

Photo by Neelesh Tripathi.


बस्तर की परिस्थितियों और नक्सल समस्या को लेकर बस्तरनामा, आमचो बस्तर, लाल अंधेरा, बस्तर के जननायक समेत 14 किताबें लिख चुके राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं- 'बस्तर की आदिवासी महिलाओं की बौद्धिक और शारीरिक क्षमता काफी मजबूत होती है. इस बात को नक्सली पहले से समझ चुके हैं. इसलिए अब तक वे इनका नकारात्मक इस्तेमाल करते रहे हैं. बड़ी बड़ी हिंसात्मक घटनाओं में महिला नक्सलियों को आगे रखकर अंजाम दिया गया है.'

राजीव कहते हैं कि अब यदि इनकी क्षमता का सकारात्मक इस्तेमाल किया जा रहा है तो नक्सल विरोधी मुहिम में सफलता जरूर मिलेगी. क्योंकि ये न सिर्फ जंगलों की भगौलिक स्थिति को जानती हैं. बल्कि वहां के लोगों की मानसिक स्थिति और बोली को भी अच्छी तरह से समझती हैं. इसका लाभ फोर्स को जरूर मिलेगा. इस प्रशासनिक पहल का दूसरा पहलू ये भी है कि आदिवासी महिलाएं मुख्यधारा में जुड़ेंगी और उन्हें रोजगार के अवसर भी मिलेंगे.

आयोग की अनुसंशा
मालूम हो कि बस्तर सहित अन्य आदिवासी इलाकों में नक्सल विरोधी मुहिम में तैनात फोर्स के जवानों पर आदिवासी महिलाओं के साथ दुर्व्यहार, छेड़छाड़ के आरोप लगते रहे हैं. एक मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव की जांच कमेटी ने तत्कालीन सरकार से एक अनुसंशा की थी. इसमें तैनात फोर्स में महिलाओं को शामिल करने की बात कही गई थी. इससे फोर्स पर ग्रामीण और महिलाओं का भरोसा बढ़ने का हवाला दिया गया था.

राजीव रंजन कहते हैं कि नक्सल विरोधी अभियान में आदिवासी महिलाओं के शामिल होने का असर नक्सल मुवमेंट पर पड़ेगा. ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं में भरोसा कायम करने में भी फोर्स कामयाब हो सकती है. क्योंकि स्थानीय लोागें को भरोसे में लिये बगैर नक्सल विरोधी मुहिम में सफल हो पाना फोर्स के लिए मुश्किल है.

File Photo.


डीआरजी में महिलाएं क्यों?
दंतेश्वरी बटालियन को लीड करने वाली दंतेवाड़ा डीएसपी दिनेश्वरी नंद बताती हैं कि डीआरजी की टीम में जिन महिला लड़ाकूओं को शामिल किया गया है, उनमें दस नक्सल कैडर की सरेंडर महिलाएं हैं, जो नक्सलियों की साजिश करने की नीति, काम के तरीके से वाकिफ हैं. साथ ही युद्ध में लड़ाई के लिए वे ट्रेंड भी हैं. बाकि महिलाएं भी नक्सल हिंसा से पीड़ित हैं. इन्हें और बेहतर तरीके से ट्रेंड किया गया है.

आदिवासी महिलाएं. फाइल फोटो.


अब तक नक्सल मोर्चे पर नक्सल कैडर से सरेंडर महिलाओं या गोपनीय सैनिकों को सुरक्षा ड्यूटी, निगरानी रखने या भीड़ भाड़ वाले इलाकों में तैनात किया जाता था. अब इन्हें सर्चिंग पार्टी और मुठभेड़ में बैकअप के लिए भी भेजा गया. हाल ही में सात मई को दंतेवाड़ा में हुई एक मुठभेड़ में पुलिस ने दो नक्सलियों को मार गिराया था. इस मुठभेड़ में मोर्चे पर दंतेश्वरी बटालियन थी. इसके बाद एक इनामी महिला नक्सली को भी इस बटालियन ने गिरफ्तार किया था.

file Photo.


दूसरों से कैसे अलग?
गौरतलब है कि सीआरपीएफ की नक्सल विरोधी मुहिम के तहत तैनात की बस्तरिया बटलालियन में जो युवतियां हैं, वो स्थानीय जरूर हैं, लेकिन डीआरजी की महिला बटालियन उनसे अलग है. इस बटालियन में वे महिलाएं हैं, जो या तो पहले नक्सली रह चुकी हैं. या फिर नक्सल हिंसा के खिलाफ पुलिस की सहयोगी रही हैं. युद्ध के लिए पहले से ट्रेंड इन महिलाओं को और अलग अलग ट्रेनिंग देकर और दक्ष बनाया गया है.
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