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    छत्तीसगढ़िया व्यंग्य : उल्टा-पुल्टा होय संसार, नाउ के मुड़ ल मुड़े लोहार

    उल्टा-पुल्टा होय संसार...
    उल्टा-पुल्टा होय संसार...

    व्यवस्था अतेक बीमार हे के गदहा (मूर्ख) के मुडी म सिंग जगोय बर पूरा खोपड़ी राख होवत हे. अउ बुद्धिमान मन देश के राजनीतिक तमाशा देखत-देखत बुढा जात हें. उन ल कमजोर करे बर लोगन एड़ी म चुटइया लाय बर भिड़े हें.इही ल कथें –‘उलटा-पुल्टा होय संसार,नाउ के मुड़ ल मुड़े लोहार. आम-आदमी के कंधा चढ़ के राजनीति के अस्त्र-शस्त्र चलइया मन के निशाना अब चूकना शुरू हो गे हे.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 19, 2020, 10:55 PM IST
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    खबरीलाल जानथे अपन संगी जव्हरिया संग बतियावत-बतियावत अपन अवकात म आगे. ओहा अपन खोजी नजर म देखत-तउलत जोरदरहा किहिस-‘आम-आदमी के मन म लड्डू फुटथे. ख़ास- आदमी लड्डू खाथे.लड्डू के सपना बांटथे. अउ वुही आम-आदमी दुरिहा ले लड्डू देखथे. मुख्य वस्तु लड्डू हे, आम-आदमी नहीं. लड्डू के पूरा गणित, राजनीति अउ समाजशास्त्र अलग हे. मानवता के चांदी रूपी परत वुही लड्डू उपर चमकत हे. चकाचक चांदी कस. चकाचक सोना के पन्नी कस. इही चमक म राजनीति के सुंदर बजार हे.’

    भीड़ म गंवइस आम-आदमी

    गोबरदास दुखी मन ले किहिस-‘आम-आदमी ल राजनेता अउ किसम-किसम के भला-बुरा मनखे मन अपन-अपन जेब म धरें रहिथें. ऊनकर मन बहलावत रहिथें. आम-आदमी सबले जादा कीमती होथे. आम-आदमी मउका-बेमउका भीड़ म गवां जथे. कीरा-मकोरा कस होथे. जे जगा पाबे ते जगा रमजावत रहिथें.



    एक धान के दू भूंसा
    लालबुझक्कड़ किहिस-‘ख़ास-आदमी एक धान के दू भूसा करे बर जानथे.आम-आदमी के मास, न हाड़ा, करम ठठाय कस हाल हे. हर गोड़(पैर) बर पायदान हे. आम-आदमी के छाती म हर जुद्ध लड़े जथे. आम-आदमी गरीबी के आख़िरी छोर म खड़े मिलथे. ओला अपन गोड़ म खड़े होय के दूसर ले बड़े होय के मउका कहाँ मिलथे. सब मीठ-मीठ बोल-बोल के उन नीचो डरथे. आम-आदमी के बूता हे हाथ उठाना, जय बोलना. सच पूछे जाय त ओखर जनम होतेच जय-जय बोले अउ हाथ उठाय बर.’

    दूसर के गोड़ म खड़े मनखे

    खबरीलाल किहिस-‘आम-आदमी दूसर के मुंह ले बोलथे. दूसर के कान ले सुनथे अउ दूसर के आंखी ले देखथे. बुध(बुद्धि) उधार के होथे. कभू–कभू किराया के मनखे लगथे. आम-आदमी दूसर के गोड़ म खड़े होथे. दूसर के गोड़ म बइठथे. जइसे कलेवा म लाडू अउ रिश्ता म साढू होथे वइसने चुनाव बखत ये नेता अउ आम-आदमी नता-गोता होथे. आम-आदमी के हालत लमसेना (घर-जमाई) बरोबर हो जथे. कहे गे हे ‘मंगनी के बइला,अउ लमसेना/मरे चाहे बांचे,जोते के काम.’

    कुरसी के मया अउ माया म

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