राजनांदगांव के आदिवासी बहुल क्षेत्र के ग्रामीण झरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर
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राजनांदगांव के आदिवासी बहुल क्षेत्र के ग्रामीण झरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर
झरिया से पानी लेने जाते आदिवासी ग्रामीण

राजनांदगांव जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर बसा एक छोटा सा गांव खुर्सेखुर्द के ग्रामीण नदी का रेत निकाल कर झारिया (नदी में गडढा) का पानी पीने को मजबूर हैं. पीने के पानी के लिए दो किलो मीटर रोज जंगल और पथरीले रास्ते से होकर ग्रामीण नदी के किनारे पहुंचते हैं.

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आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी राजनांदगांव जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र के ग्रामीण आज भी गर्मी के दिनों में झरिया के पानी से अपनी प्यास बुझा रहे हैं. राजनांदगांव जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर बसा एक छोटा सा गांव खुर्सेखुर्द के ग्रामीण नदी का रेत निकाल कर झारिया (नदी में गडढा) का पानी पीने को मजबूर हैं. इतना ही नहीं, पीने के पानी के लिए दो किलो मीटर रोज जंगल और पथरीले रास्ते से होकर ग्रामीण नदी के किनारे पहुंचते हैं. वहां छोटे से बर्तन के सहारे अपने बड़े बर्तनों में पानी भरते हैं.

इस मई की कड़क धूप में वह रोज ऐसे ही पाने लेकर घर आते हैं. पानी लेने बड़े ही नहीं बच्चे, बूढ़े और जवान सभी पैदले जाते हैं. इस मिनरल वाटर के युग में भी खुर्सेखुर्द के ग्रामीण मजबूर हैं.उनका कहना है कि सरकार ने कभी उनकी इस बुनियादी समस्या पर ध्यान नहीं दिया.वहीं इस मामलें में कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष भुपेश बघेल ने रमन सिंह पर निशाना साधते हुए कहा कि जो मुख्यमंत्री अपने विधान सभा क्षेत्र में लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं दे पा रहा है,वह क्या पूरे प्रदेश में विकास की बात करते हैं.

 



 
 
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