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छत्तीसगढ़: 21वीं सदी में भी नहीं बदली सोच, इस वजह से झोपड़ी में रहने मजबूर हैं महिलाएं
Rajnandgaon News in Hindi

Rakesh Kumar Yadav | News18 Chhattisgarh
Updated: February 24, 2020, 2:24 PM IST
छत्तीसगढ़: 21वीं सदी में भी नहीं बदली सोच, इस वजह से झोपड़ी में रहने मजबूर हैं महिलाएं
राजनांदगांव के एक आदिवासी गांव में इस परंपरा को माना जाता है.

हालांकि शासन-प्रशासन की टीम ने इस गांव का दौरा कर वहां जरूरी चीजे मुहैया कराई थी, लेकिन कुछ दिन बाद हालत वैसी ही हो गई. ये पूरा मामला जिले के सितागांव का है.

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राजनांदगांव.  छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के राजनांदगांव (Rajnandgaon) जिले के आदिवासी आज भी एक रूढ़िवादी परम्परा को मानते हैं. इस परंपरा को खत्म करने शासन- प्रशासन नकारा साबित हो रही है. यहां आज भी युवतियां और महिलाएं माहवारी (पीरियड) के दौरान गन्दे कुटिया में ही 3 से 5 दिन जीवन बिताने मजबूर है. यहां के ग्रामीण आधुनिक युग में भी इस थोथी परम्परा को ढ़ो रहे है. इस नियम को मानते हुए इस गांव की महिलाएं आज भी झोपड़ी (Hut) में रहने को मजबूर हैं. हालांकि शासन-प्रशासन की टीम ने इस गांव का दौरा कर वहां जरूरी चीजे मुहैया कराई थी, लेकिन कुछ दिन बाद हालत वैसी ही हो गई. ये पूरा मामला जिले के सितागांव का है.



ये है इस गांव की प्रथा



दरअसल, सितागांव के एक टोला (बस्ती) में आदिवासी समूह के लोग निवासरत हैं. यहां की युवतियां और महिलाएं महावारी (पीरियड) के दौरान गांव के कोने में बने गन्दी और बदबूदार झोपड़ी में 3 से 5 दिन रहते हैं. हालत ये है कि इस झोपड़ी के आस-पास मवेशियों के जमावड़ा रहता है. इसके आस-पास कीचड़ और गन्दगी पूरे समय फैली रहती है, जिससे गंदी बदबू आती है. ऐसी जगह में महिलाओं को रखा जाता है. इस दौरान युवती और महिलाओं को उनके घर से कुटिया तक भोजन और जरूरी सामान पहुंचाया जाता है, लेकिन उनका घर के अंदर आना सख्त मना है.



लोगों की मान्यता



गांव के लोगों की मानें तो यह बहुत पुरानी परंपरा है, जो सदियों से चली आ रही है. पीरियड के दौरान महिला और युवतियों को छुआछूत की नजर से देखा जाता है. ऐसे में घरों में स्थापित देवी- देता नाराज हो जाते हैं. गांव के लोगों का कहना है कि इस वजह से ये झोपड़ियां बनाई गई है और महिलाओं को वहां रखा जाता  है. तो वहीं गांव के पटेल दुर्गुराम का कहना है कि यह परम्परा खत्म तो नहीं हो सकती. उनका कहना है कि अब प्रशासन को हमें कुटिया के स्थान पर पक्का एक कमरा बनवा कर दें, जहां पानी और बिजली हो.


विभाग की अनदेखी


राजनांदगांव के पूर्व कलेक्टर भीम सिंह ने पूरे मामले को भांपते हुए गांव से इस रूढ़िवाद परम्परा को खत्म करने के लिए शासन ने महिला बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग को जिम्मेदारी दी थी. इन दोनों विभाग गांव में लगातार जाकर आदिवासियों को समझाइस देने और महिलाओं और युवतियों को सेनेट्री नेपकिन देकर उसका उपयोग बताने की जिम्मेदारी दी गई थी. करीब 1 से 2 महीने तक ही दोनों विभागों ने आदेश पर अमल किया. अब पिछले 2 सालों से इस गांव की तरफ किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने रूख नहीं किया. अब फिर से आदिवासी महिलाएं और युवतियां उसी तरह रह रही है, जैसे पहले रहा करती थी.


क्या कहते है अधिकारी और CMHO


मामले में सीएमएचओ डॉ. मिथलेश चौधरी और महिला बाल विकास विभाग की परियोजना अधिकारी  रेणु प्रकाश ने जरूरी इस बात को स्वीकार किया कि इस गांव की काफी लंबे समय से मॉनिटरिंग नहीं हो रही है. अब मामले को संज्ञान में लाने के बाद गांव के लोगों को लगातार समझाइश देकर मोटिवेट करने की बात जरूर कर रहे हैं,



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First published: February 24, 2020, 2:15 PM IST
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