'CRPF के 76 जवानों की लाशें देख हाथ-पैर कांपने लगे थे, कैमरा निकालने की हिम्मत तक नहीं थी'
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'CRPF के 76 जवानों की लाशें देख हाथ-पैर कांपने लगे थे, कैमरा निकालने की हिम्मत तक नहीं थी'
सुकमा में बीते 21 मार्च को हुए नक्सली हमले में शहीदों को पुलिस लाइन में श्रद्धांजलि दी गई.

सीआरपीएफ पर देश में अब तक के सबसे बड़े हमले को आज 10 साल पूरे हो गए. न्यूज 18 छत्तीसगढ़ के सहयोगी और उस घटना को कवर करने वाले पत्रकार ने ताड़मेटला के उस मंजर को इस तरह याद किया.

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सुकमा. 6 अप्रैल 2010 मंगलवार सुबह करीब 6.30 बजे चिंतलनार इलाके से फोन आया कि सुबह से ही फायरिंग और गोलीबारी की आवाज आ रही है. उस समय वाट्सएप नहीं था और जिले के कुछ ही इलाकों में मोबाइल फोन का नेटर्वक था. कुछ ही मिनट के बाद सूत्रों के हवाले से हमने 5 जवान घायल होने की खबर चला दी, लेकिन जैसे ही 8 बजे एक फोन आया कि उसमें से करीब एक दर्जन जवान शहीद हो गए हैं. इतनी बड़ी खबर पर यकीन करना मुश्किल था, लेकिन सूत्र की खबर भी पक्की थी. उस समय पुलिस के आला अधिकारी कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थे. कुछ देर बाद खबर मिली कि 50 से ज्यादा जवान शहीद हो गए हैं.

हमें लगा कि कुछ तो बड़ा हुआ है, लेकिन इतनी संख्या में जवान शहीद होने की बात पर भी यकीन नहीं हो रहा था. फिर करीब 9 बजे के बाद पुष्टि हुई कि नक्सलियों का बड़ा हमला था और 76 जवान शहीद हो गए हैं. खबर के साथ-साथ देश के बड़े मीडिया हाउस से भी फोन आने शुरू हो गए, लेकिन उस समय न तो वाट्सएप था और ना ही कुछ और. हां इंटरनेट के नाम पर घर पर एक ब्रॉडबैंड लगा हुआ था. खबर के बाद हमने मौके पर जाने की तैयारी की और करीब 10 बजे स्थानीय पत्रकारों के साथ ताड़मेटला के लिए रवाना हो गए.

मंजर खौफनाक था
मुझे भी कुछ ही दिन हुए थे रायपुर से प्रकाशित एक अखबार में काम करते हुए. यानि कि पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी और पहला नक्सली हमला कवरेज किया था. दोरनापाल के बाद मोटरसाइकिल से ताड़मेटला की ओर रवाना हो गए. उस समय सड़क नहीं थी बल्कि पगडंडी के रूप में टूटी-फूटी सड़क थी. मोटरसाइकिल पर हम निकल पड़े थे और रास्ते सूनसान थे. रास्ते में कुछ कैम्प थे अभी वर्तमान में काफी कैम्प खुल गए हैं. सबसे पहले चिंतलनार से ठीक पहले ताड़मेटला चेक पर एक एंटी लैड माइंस व्हीकल जिसे नक्सलियों ने बारूद से उड़ा दिया था. वहां कुछ देर रूके फोटो लेने के बाद आगे बड़े. जैसे ही चिंतलनार पहुंचे वहां का मंजर खौफनाक था.



एक साथ रखे थे 76 जवानों के शव


थाने के भीतर जवानों के शव रखे हुए थे. एक साथ 76 जवानों के पार्थिव शव को देख आंखों में आंसू आ गए. हाथ-पैर कांपने लग गए थे. यहां तक कि कैमरा निकालने की हिम्मत तक नहीं थी. काफी देर तक एक कोने में खड़े होकर इस मंजर को देख रहे थे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. जवानों के भीतर आक्रोश था. जैसे-तैसे हिम्मत जुटाकर एक-दो फोटो लेकर वापस सुकमा रवाना हुए.

सर्चिंग कर वापस लौट रहे जवानों पर किया था हमला
जांच में पता चला कि नक्सलियों की तलाश में सीआरपीएफ के जवान सर्चिग पर निकले थे. सर्चिग करने के बाद जवान वापस चिंतलनार लौट रहे थे. सुबह-सुबह का वक्त था और जवान ताड़मेटला गांव के पास आराम कर रहे थे. जवान थके हुए थे, जिसका फायदा उठाते हुए करीब 500 से ज्यादा नक्सलियों ने हमला बोल दिया. दोनो ओर से कई घंटो तक फायरिंग चली और इस हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे और नक्सली हथियार व मिलट्री शूज लूट कर ले गए थे. छत्तीसगढ़ में यह अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला था.

इन वजहों से भी सुर्खियों में रहा ताड़मेटला
नक्सली हमले के बाद भी छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का ताड़मेटला इलाका सुर्खियों में रहा है. साल 2012 सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था. उन्हें भी ताड़मेटला इलाके में रखा गया था. नक्सलियों और सरकार के बीच बातचीत करने आऐं हरगोपाल व बीडी शर्मा को नक्सलियों ने ताड़मेटलला में ही बुलाया था. इसके अलावा आगजनी की घटना जिसमें ताड़मेटला के ग्रामीणों के घर जलाने का मामला भी सामने आया था.

दस साल बाद भी नहीं सुधरे हालात
ताड़मेटला उस वक्त सुर्खियों में आया था जब यहां पर 76 जवान शहीद हुए थे. उस हमले को आज 10 साल पुरे हुए हैं, लेकिन आज भी वहां के हालात बहुत ज्यादा नहीं बदले है. हाल ही में 21 मार्च को इसी इलाके मे 17 जवान शहीद हो गए थे. ताड़मेटला इलाका आज भी प्रशासन की पकड़ से दूर है. वहां पर नक्सलियों की मौजूदगी रहती है. हालांकि प्रशासन काफी कोशिश कर रहा है हालात सुधारने की. उस इलाके में दोरनापाल से चिंतागुफा तक सड़क का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है. इस वर्ष चिंतलनार तक सड़क निर्माण की संभावना है.

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