मूलभूत सुविधाओं के आभाव से जूझ रहा सलवा जुडूम के दौरान तबाह हुआ ये गांव
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सलवा जुडूम 2006 के दौरान कई आदिवासी परिवारों के घरों में आग लगा दी गई थी. डर के मारे इन ग्रामीणों आन्ध्र प्रदेश के कुनापुरम गांव में पनाह ली थी.

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छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के मरईगुड़ा गांव जहां 13 साल बाद 25 परिवार वापस अपने गांव लौटे हैं. उस गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. ना तो बिजली है और ना ही सड़क, शिक्षा व स्वास्थ्य है. सभी लौटे ग्रामीण वापस अपने नया घर बनाने की तैयारी में जुट गए हैं. इसको लेकर शासन-प्रशासन की भी मदद मांगी जा रही है. ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन से उन्हें मदद जरूर मिलेगी.

बता दें कि सलवा जुडूम 2006 के दौरान इन आदिवासी परिवारों के घरों में आग लगा दी गई थी. डर के मारे इन ग्रामीणों आन्ध्र प्रदेश के कुनापुरम गांव में पनाह ली थी. 13 साल बाद वापस अपने गांव लौटे हैं. लेकिन हालात में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है. अब भी गांव में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. बीते शनिवार को दोपहर करीब 12 बजे मरईगुड़ा गांव के बीच में स्थित इमली पेड़ के नीचे चैपाल लगाई हुई थी. सरपंच सोयम बंजारी व सचिव समेत गांव में रह रहे ग्रामीण और जो परिवार वापस लौटे सभी एक जगह एकत्रित थे.

सभी से आवेदन लिया जा रहा था, जिसमें से जिनके पट्टे हैं उनको जमीने बताई जा रही थी. उसके अलावा प्रधानमंत्री आवास व पट्टा के लिए आवेदन लिया जा रहा था. कुछ महिलाएं पास के ही घर में सामूहिक भोज बना रही थी. चैपाल में सामूहिक चर्चा भी हो रही थी कि गांव में सुविधाओं का अभाव है. अब धीरे-धीरे गांव का विस्तार हो रहा है. पहले 61 घर थे लेकिन अब बढ़ जाएंगे.



मरईगुड़ा गांव में कुल सात पारा है. पंचायत का कामकाज बिरला से संचालित होता है. इसके अलावा पटेलपारा, डागुंडा मुख्य पारा है जहां पर अच्छी संख्या में परिवार निवास करते हैं. चैपाल में ग्रामीणों के साथ तीन दिन से यहां पर रह रही भान साहू बालौद निवासी जो सीजी नेट से 2010 से जुड़ी है मौजूद थी.
गांव में किसी के घर में भी एक शौचालय का निर्माण नहीं हुआ है. यहां पर कुल 70 घरों की बस्ती है और आसपास के गांवों में मिलाकर 200 घरों की बस्ती है, लेकिन यहां पर ना तो शौचालय का निर्माण हुआ है और ना ही अन्य योजना का क्रियान्यवयन. शौचालय निर्माण नहीं होने पर महिलाए लकड़ी की बाड़ी का उपयोग करती हैं. इसके अलावा गांव में पहुंचने के लिए सड़क नहीं है, पथरीले और जंगल के रास्ते गांव में पहुंचा जा सकता है. ग्रामीणों के लिए वनोपज ही एकमात्र रोजगार है. यहां पर ना तो सरकारी कामकाज है और ना ही कोई योजना का संचालन.
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