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विदेशों की शिक्षा व्यवस्था से प्रेरित होकर सूरजपुर के इस शख्स ने तैयार किया बैग लेस स्कूल

विदेशों की शिक्षा व्यवस्था से प्रेरित होकर सूरजपुर के इस शख्स ने तैयार किया बैग लेस स्कूल

स्कूल में पढ़ाई करते बच्चे.

स्कूल में पढ़ाई करते बच्चे.

शिक्षा के स्तर को बेहतर करने की इस शख्स की पहल की हर तरफ अब हो रही है.

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में एक शिक्षक ने विदेशों से प्रेरणा लेकर बच्चों के लिए बैग लेस स्कूल का मॉडल तैयार किया है. इस स्कूल में बच्चे हाथी में सिर्फ एक कॉपी और पेन लेकर आते हैं. स्कूलों में ही बच्चों के किताबें दी जाती है. बच्चों को अनुशासित रखने के लिए स्कूल में बाल सदन भी है जहां हर साल चुनाव भी होता है. जिले के शिक्षा के स्तर को बेहतर करने की इस शख्स की पहल की हर तरफ अब हो रही है.

सिर्फ एक कॉपी लेकर स्कूल आते हैं बच्चे

ये पूरा मामला सूरजपुर जिले के एक छोटे से गांव रूनियांडीह के शासकिय पूर्व माध्यमिक स्कूल का है. इस स्कूल में बच्चे अपने हाथ में सिर्फ एक कॉपी और पेन लेकर आते है. स्कूल में ही सभी बच्चों को पुस्तक उपलब्ध कराया जाता है. बच्चे अपनी अभ्यास पुस्तिका में नोट्स लिखते है. फिर घर जाकर इसे अपने नोट बुक में लिखते है. होमवर्क भी इन्हे इसी तरह मिलता है. सबसे खास बात ये है कि बच्चे इस स्कूल में बिना किसी बैग के आते है. सूरजपुर का ये स्कूल बैग लेस स्कूल के नाम से फेमस भी है.

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स्कूल में बाल सदन का चुनाव भी होता है.


एक प्रधान अध्यापक की पहल

शासकिय पूर्व माध्यमिक स्कूल के प्रधान अध्यापक सीमांचल त्रिपाठी ने पढ़ाई का ये मॉडल तैयार किया है. प्रधान अध्यापक ने विदेश के शिक्षा व्यवस्था से प्रेरित होकर एक नई शुरुआत कर बच्चों के कंधों से पुस्तक और बैग के बोझ को कम कर बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए एक नई पहल का आगाज किया है.

स्कूल में है बाल सदन भी

स्कूल में बच्चों को अनुशासित करने के लिए हर साल इस स्कूल में बाल सदन का चुनाव कराया जाता है. चुनाव के बाद कई विभागों के मंत्री चुने जाते है. फिर इन्हे कई जिम्मेदारी दी जाती है. कैबिनेट मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक का पद दिया जाता है. इतना ही नहीं स्कूल के कैंपस में शिक्षकों के साथ मिलकर बच्चे जैविक खेती कर सब्जियां उगते है जिसका उपयोग मध्यान्ह भोजन में किया जाता है.

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सूरजपुर जिले के रूनियांडीह का शासकिय पूर्व माध्यमिक स्कूल जो है बैग लेस.


प्रधान अध्यापक ने कही ये बात

प्रधान अध्यापक इस पहल को एक एक्सपेरिमेंट के रुप में देखते है. प्रधान अध्यापक सीमांचल त्रिपाठी का कहना है कि विदेश की पढ़ाई और शिक्षा व्यवस्था के बारे में पढ़ा था जो कि काफी प्रेरित करने वाली है. वहां पुस्तक को तीन सालों तक उपयोग किया जाता है. इसलिए यहां भी ऐसी व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए. उन्होने शिक्षा के स्तर में सुधार होने पर दूसरे स्कूलों में भी इस व्यवस्था को अपनाने की सलाह दी. वहीं प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी अजय मिश्रा का कहना है कि प्रधान अध्यापक की ये पहली काफी अच्छी है. उन्हे राज्यपाल से पुरस्तार भी मिल चुका है. बाकि स्कूलों को इस स्कूल में जाकर और खास तौर पर यहां की व्यवस्था देखने को भी कहा है.

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