छत्तीसगढ़ी में पढ़ें -सम्माननीय कवि भटकती-आत्मा से भेंट-वार्ता

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आजकल नेता मन के पाचन शक्ति बाढ़गे हे अइसे जनता समझथे. आप का सोचथव? ‘पाचन शक्ति या हाजमा बाढ़े ले सब पच जथे? ये बात सही हे. नेताजी मन के हाजमा बाढ़े ले उन छप्पन-भोग के अधिकारी हो जथें. एमा कोनो ल आपत्ति हे का?’

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 10, 2021, 3:01 PM IST
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कवि फ़ोकटजी के उपर कोरोना के मार अइसे परिस के वेक्सीन लगाय के बाद घलो ओखर सिहरन ले मुक्ति नइ मिल पाय हे. फेर ओखर भीतरी के महान विचार उछाल मारत हे. कविता के भरोसा जीना हमर देश म 95 फीसदी असंभव हे. कवि फोकट के अपन कविता संसार हे, अपन सपना हे. कवि लटकचंद के संगति म धीरे-धीरे कविता के मार्केट बनत रिहिस. कभू मगनचंद के साल गिरह म ओखर घरू कवि-सम्मेलन हो जाय. त कभू कोनो नेताजी के जनम दिन या तिहार म कवि-सम्मेलन जम जाय. अच्छा पारिश्रमिक मिले. एक बखत मरघट (श्मशान) म कवि सम्मेलन आयोजित करे बर कवि फोकट के महान योगदान रिहिस. सहर के एक झन रइस दिवंगत होगे त ओखर आत्मा के शान्ति बर ‘पूर्ण-शान्ति’ कवि-सम्मेलन के आयोजन होइस.

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दुर्लभ कविता-पाठ

मरघट म कवि सम्मेलन महाकवि ‘चिर-शांति जी’ के अध्यक्षता म सम्पन्न होइस. आजकल मार्केट आधारित कविता के मांग ल देख समझ के कवि फोकट अउ कवि लटकचंद अपन पहिचान बना चुके हें. श्मशान म जब कवि फोकट अपन ‘शान्ति-भंग’ कविता के पाठ करिस तब आयोजक अउ उपस्थित चिरायु कविगण गदगद होगें. कवि लटकचंद के ‘श्मशान-छंद’ जिंदाबाद रिहिस. महाकवि ‘चिर-शान्ति जी’ शान्ति-यात्रा के अपन दुर्लभ कविता के पाठ कर श्मशान म हलचल मचा दिस.
कविता के बजार

कवि फोकट जी अब ‘भटकती आत्मा’ के उपनाम धारण कर लिस. कवि लटकचंद के उपनाम होगे ‘लटकती आत्मा’. कविता-जगत म बिना उपनाम के कोनो कतको सुंदर कविता लिखे ओखर पहिचान गुम होय के खतरा बाढ़ जथे. एखर सेती कवि फोकट जी अब ‘भटकती आत्मा’ के रूप म अउ कवि लटकचंद‘ ‘लटकती आत्मा’ के रूप म अपन कविता के बजार ल गरम करना शुरू करिन. अइसन चमकत सितारा के साक्षात्कार जरूरी होगे. लालबुझक्कड़ जी जिज्ञासु परानी आय. झट तियार हो के ओखर साक्षात्कार बर निकल परिस. बातचीत शुरू होइस. लालबुझक्कड़ जी के प्रश्न अउ कवि फोकट जी उर्फ़ ‘लटकती आत्मा’ के उत्तर शुरू होइस-

फोकट जी, अतके केहे म ओहा तुरत मोर भूल सुधार करवइस. किहिस-‘ कवि फोकट जी नहीं मोला ‘‘भटकती आत्मा जी’ कहो.



भटकती आत्मा: जी ‘हाँ, ‘एक भटकती आत्मा जी’

लालबुझक्कड़: आजकल आप नेता पच्चीसी लिखत हव, अइसे जनता सुने हे, का ये सच हे?

भटकती आत्मा: हाँ, मोला आज गियान होइस के जनता सुनथे घलो.

लालबुझक्कड़: आप ल लोगन आधुनिक चारण-काल के उत्पत्ति कहिथे आप के का कहना हे?

भटकती आत्मा: देखव भइ, हम त जेखर खाथन ओखर भजन गाथन. एला आप मन वर्तमान काल म देखो चाहे भूतकाल म. कवि हो के जीना आज के परिस्थिति म कोनो सरल काम नइ हे? दुनिया बदलगे. हमू बदलगेंन.

लालबुझक्कड़: आप ‘नेता पच्चीसी’ म काखर बंदना करे हँव?

भटकती आत्मा: जाहिर हे जिहां पावर होथे वुहें ले करेंट पास होथे. पावर खतम, खेल खतम. इही म आज के सत्ता-सूत्र हे.

लालबुझक्कड़: आजकल नेता मन के पाचन शक्ति बाढ़गे हे अइसे जनता समझथे. आप का सोचथव?’

भटकती आत्मा: ‘पाचन शक्ति या हाजमा बाढ़े ले सब पच जथे? ये बात सही हे. नेताजी मन के हाजमा बाढ़े ले उन छप्पन-भोग के अधिकारी हो जथें. एमा कोनो ल आपत्ति हे का?’ भोग के आनंद बीमार मन का जाने? ’अउ खुदे खलखला के हंस डारिस.

कविता के भीतरी के अर्थव्यवस्था

लालबुझक्कड़:श्रेष्ठ कविता कते ल केहे जथे?’-

भटकती आत्मा: ‘जेन कविता ल पढ़े ले जादा पइसा मिलथे’. आप कविता के भीतरी के अर्थव्यवस्था ल समझो.

लालबुझक्कड़:के ठन कविता ल लेके कोनो कवि अखिल भारतीय कवि हो सकत हे?

भटकती आत्मा: केवल चार-पांच कविता कभू-कभू तीन कविता ले काम चल जथे.

लालबुझक्कड़: अभी आप कविता के अर्थशास्त्र के बात करे हो वोला समझाव’

भटकती आत्मा: ‘कविता के लाईन म घलो ठेकेदारी प्रथा होथे. जेन कविता के बड़े ठेकादार होथें उनकर तिरे-तीर गजब अकन कवि चांटी बरोबर झूमे रहिथें. दुनिया हर क्षेत्र म बजार होगे हे. एमा अच्छा व्यवसाय के संभावना हे. लोकल वोकल वाले सूत्र करे के पूरा गुंजाइश हे देखव महाशय, इंटरनेटी जुग म अखिल भारतीय होय बर कइ ठन कूट चाल चलना जरूरी होथे..

लालबुझक्कड़:कूट चाल?

भटकती आत्मा: ‘सरकार ल खुश रखव. ओखर प्रशंसा म कविता के तार-तार बजा देव. तुरत-फुरत फायदा होथे. नेता-भक्ति गायन करो. संस्कृति विभाग के हर आयोजन म कोनो न कोनो बहाना आर्थिक लाभ होना हे. ये भक्ति म शक्ति बाढ़थे. कद बाढ़थे.

लालबुझक्कड़: राजतंत्र के चिमटा बाजे ले का होथे ?

भटकती आत्मा: आप कतको महान कविता या अन्य साहित्य लिख लेव, राजतंत्र के चिमटा बजाय बिना अपने सहर/गाँव के गली मोहल्ला म गुनगुनावत रही जहू. कोनों चिन्हारी नइ होना हे. राजतंत्र के चिमटा बाजे ले चिन्हारी होथे. छोटे–बड़े सब मान–सम्मान पाय के योग्यता सरकार के आँखी म दिखना शुरू हो जथे. छोटे–बड़े सब संस्था आंखी मूंद के गुनगान करथे. अउ अपने अपन परचार हो जथे. आजकल राजतंत्र के चिमटा म बड़ दम हे. तइहा के दिन ल बइहा लेगे. फेर ये ह सबके बस के बात नइ हे.

लालबुझक्कड किहिस- हम अचंभित होएन! अतेक महान विचार के अधिकारी सब झन नइ हो सकें.

तेंहा मोला बला ,मेंहा तोला बलाहूं

लालबुझक्कड़:कवि सम्मेलन मंच के अर्थशास्त्र का हे?

भटकती आत्मा: (दांत निपोरत) आजकल इंटरनेट के कमाल पूरा दुनिया म छाय हे. कविता म छींको-खांसो वीडियो बनाओ. फेस-बुक, वाट्स-एप, ट्वीटर, आदि म लिख मारो. आजकल फुरसत कोन ल हे? कवि सम्मेलन करवाय बर जुगत भिडाय बर लागथे. जेन कवि ह मंच म चल सकतें ओकर संग तीन चार अति मजबूरी के बतौर दिगर कवि मन ल जनता झेल लेथे. संचालक पटे हे त अति कचरा घलो चल जथे. आयोजक के अतेक बड़ई करो के वोहा फूल जाय. अइसन आयोजन करे बरघेरी-बेरी पुचपुचान लगे.

लालबुझक्कड़: कवि-सम्मेलन के भीतरी सूत्र का हे?

भटकती आत्मा: कवि मन के बीच तेंहा मोला बला, मेंहा तोला बलाहूं. ये ह मूलभूत सूत्र लागू होथे.’ आजकल नारी शक्ति के बिना कोनो मंच के शोभा नइ बाढ़े. एखर सेती कवयित्री के हर कवि सम्मेलन होना जरूरी हे.

लालबुझक्कड़: ‘अब तक आप कहाँ-कहाँ छपे हो?

भटकती आत्मा: ‘कहाँ, कहाँ नइ छपे हन जी? आप नइ पढ़ पाएव ए हमर गलतीआय का? हम कतेक ल सुरता करबो?’

लालबुझक्कड़: आप कोन-कोन रस के कविता लिखथो?

भटकती आत्मा: सबरस के कविता लिख मारथन.

लालबुझक्कड़:आप ल कोन-कोन पुरस्कार मिले हे?

भटकती आत्मा: अरे भई! एक दु ठन मिले होय त बतांव! कतको मिल चुके हे ,कतको मिलना निश्चित हे, हमर पूरा सेटिंग हे.

लालबुझक्कड़:आपके के ठन किताब छपे हे? के ठन छपने वाला हे ?

भटकती आत्मा: कतको छ्पगे, कतको पांडुलिपि बोरा म भराय हे. सबे किसम के साहित्य हे? कइ ठन किताब उपर लोगन पी.एच.डी.करना चाहत हे. अब त कोविड-19 के वेक्सीन आगे हे. बोरा-बोरा लुकाय साहित्य बाहिर आही.

लालबुझक्कड: आप सचमुच महान कवि, लेखक हो. आज के साहित्य संत हो.धन्यवाद.

( डिसक्लेमर- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं.)
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