छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल मा होथे आँगा पाटदेव पूजा अउ मड़ई जात्रा

छत्तीसगढ़ के दक्षिण अंचल बस्तर मा आदिवासी अउ गैर आदिवासी मन के मुड़का चलायमान देव बिराजे के ठउर "आँगा" हरय.जइसे सबो देवी देवता के अलग अलग सवारी शेर, बइला, मंजूर, गड़ूर, मुसवा, हंस हाथी, घोड़ा होथय वइसने आँगा हा पाटदेव के सवारी आय. पाटदेव हा इही मा बिराजथे.

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  • Last Updated: September 24, 2020, 12:08 AM IST
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त्तीसगढ़ हा नानम किसम के तीज तिहार, परंपरा अउ संस्कृति वाला प्रांत आवय. गणेश, दुर्गा, नवरात्रि, दशहरा, देवारी, फागुन के संगेसंग,अक्ती, हरेली, कमरछठ, तीजा पोरा, नवाखाई, मड़ई, जात्रा, पहुँचानी, जइसन कतको किसम के तिहार मनाय जाथे. ए तिहार मन खेती किसानी अउ देवी देवता के दर्शन अउ धन्यवाद देय के रीति रिवाज अउ परंपरा ले घलो जुड़े हे.

छत्तीसगढ़िया मनखे जब देव धामी के दर्शन बर बच्छर भर मा कइ पइत ले मंदिर देवाला, खार, बाट मा जाथे, ता भगवान घलो अपन भगतमन ला दर्शन देय बर अउ सुख दुख ला पूछे बर एक दू बेर अपन ठउर ले निकलथे. देवी देवता के अपन भगतमन ला दर्शन देय के परंपरा आदि जमाना ले चलत हे.अइसने एकठन परंपरा छत्तीसगढ़ के बूड़ती कति बस्तर अंचल मा हावे जौन ला "जात्रा" कहिथे. एमा तीर तखार के देवी देवता मन दुखिया सुखिया मन के हियाव करे,उँखर दुख हरेबर अउ दर्शन देयबर कोनों रुप मा आथे.कभू मूर्ति के रूप धरथे नइते मूर्ति के जगा मा दूसर रुप ला अपन साधन बना लेथे. देवी देवता मनके बिराजे के बस्तर डाहर के परंपरा मा एक साधन आँगा, डोली, विमन, गुटाल, कोल्हा, डाँग, अउ छत्र होथे.

छत्तीसगढ़ के दक्षिण अंचल बस्तर मा आदिवासी अउ गैर आदिवासी मन के मुड़का चलायमान देव बिराजे के ठउर "आँगा" हरय.जइसे सबो देवी देवता के अलग अलग सवारी शेर, बइला, मंजूर, गड़ूर, मुसवा, हंस हाथी, घोड़ा होथय वइसने आँगा हा पाटदेव के सवारी आय. पाटदेव हा इही मा बिराजथे.पाटदेव हा पुरुष देव आय.आँगा मा सिरिफ पुरुष देव बिराजथे.आँगा के रुप काय हरय एला कोनों नइ बता सकय. सबो इही जानथे अउ मानथे कि पाटदेव हा आँगा मा आथे.पाटदेव देवता अउ भूत परेत के बीच के योनी आय.



आँगा ला बनाय बर कटहर, तेंदू  सागोन, सिरसा जइसन ठोस लकड़ी जौन अड़बड़ दिन तक खटाय, सरे घुनाय नइ तइसन के बनाय जाथे. एमा आठ हाथ के दू ठन लम्बा पाटी रहिथे.ओला दू ठन चार चार हाथ के लकड़ी मा आड़ा जोड़े जाथे. इही आड़ा मा बीच मा एक ठन मा साँप जाइसन मुड़ी बनाय  जाथे,एला कोका कहे जाथय एमा चांदी के नाँगफेन लगाय जाथे.आँगा ला उही मनखे बनना सकथे जौन ला उँखर पाटदेव हा सपना देखाथे अउ आँगा बनाय बर कहिथे.
गाँव के देव हा पुजारी नइते गाँव के सियान ला घलो सपना देके कहिथे तब गाँव भर बरार करके आँगा बनाथे. आँगा के सिंगार बर चाँदी ला बउरे जाथे. मुड़ी अउ सबो अंग मा घलाव चांदी लगाय जाथे.दूनो पाटी के चारो छोर जेला जेला काक कहिथेओमा मंजूरपाख बाँधे जाथे. सिंगारे के बूता ला पावे अउ पुजारी करथे.एमन ला गाँव के सियान के सलाहा से नियुक्त करे जाथे. जौन अपन घर मा आँगा बनाथे ओहा पूजा पस्ट खुद करथे अउ ओखर मरे पाछू अवइया पीड़ी के पारी रहिथे.आँगा के स्थापना इतवार के करे जाथे.सोमवार के एखर अक्तिहा पूजा होथय.लिमाऊ, फूल, नरियर अगरबत्ती चढ़ाके एखर पूजा करे जाथे.

छत्तीसगढ़ मा बस्तर अंचल के गाँव मा हजारों आँगा हावय.आँगा ला गुड़ी मा नइते चारठन खूँटा गाड़के सुताय जाथे.जब एखर पूजा करेबर होथे तब एला चार ठन संकरी मा बाँध के झुलाय जाथे.एला भुँइया मा नइ मढ़ाय जावय. आँगा अइसे तो नइ निकलय फेर जब कोनों गाँव के मनखे घर बिपत पर जाथे तब वोहा आँगा, देव ला अपन घर आय बर नेवता देथे अउ ओखर आय जाय खाय पीये के बेवस्था करथे. काबर कि आँगा हा दल बल के संग आथे.अइसने गाँव मा बिपत आथे तब गाँव भर के मन गोहार करके बलाथें.

आँगा मा जब देव आथे तब चार झन पुरुष मनखे मंजूर पाँख बँधाय जगा ला बोह के देव खेलाथे.अपन दुख पीरा ला भगाय बर दुखिया मनखे मन ओखर बीच ले बुलकथे.  जब उँखर दुख पीरा ला देव हा हर लेथे तब चाँदी के भेंट देके बिदा करथें.

अइसे आँगा मन के अगुवा सियान घलो होथे. सियान आँगा, के ठउर मा बच्छर भर मा एक बेरा सबो आँगा सकलाथें इही ला जात्रा कहे जाथे.इहाँ तीर तखार के आँगा मन सकलाथे.ओहा असली नकली आँगा के फरियाव करथे. नकली आँगा ला उही मेर टोर देय जाथे.

आँगा हा जब जुन्ना हो के सरे घुनाय बर लगथे तब ओला नदिया तरिया मा बोहा देय जथे अउ नवा आँगा बनाय जाथे.एखर बर बढ़ई अउ पुजारी जंगल ले लकड़ी लाथे अउ अपने मन बनाथे. बढ़ई एखर पइसा नइ लेवय. दार, चाँउर, कपड़ा लत्ता देके बढ़ई के बिदाई करे जाथे.नवा बने आँगा के फिर से स्थापना बर बड़का कार्यक्रम करे जाथे.नवा आँगा स्थापना के दिन गाँव मा तिहार मनाय जाथे. जेमा सगा सोदर, भगत मन ला नेवता नेवते जाथे. आँगा देव हमर दुख पीरा के हरइया अउ सुख देवइया आवय.
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