छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: संघर्ष ले उपजे जनकवि : कोदूराम ‘दलित’

गांधीजी के विचारधारा ले प्रभावित अंग्रेजी हुकूमत  खिलाफ साहित्य ल अपन हथियार बनाईन शिक्षक रहिन तभो ले लइका मनके मन मे स्वतंत्रता के अलख जगाय खातिर राउत दोहा लिख-लिख के प्रेरित करिन.

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  • Last Updated: September 18, 2020, 5:47 PM IST
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लेखक: अजय अमृतांशु

त्तीसगढ़ के गिरधर कविराय के नाम ले मशहूर जनकवि कोदूराम "दलित" जी के जन्म 5 मार्च 1910 के ग्राम-टिकरी (अर्जुन्दा) जिला दुर्ग के  साधारण किसान परिवार म होय रहिस. किसान परिवार म पालन पोषण होय के कारण पूरा बचपन किसान अउ बनिहार के बीच म बीतिस. आजादी के पहिली अउ बाद उन कालजयी सृजन करिन. समतावादी विचार, मानवतावादी दृष्टिकोण अउ यथार्थवादी सोंच के कारण आज पर्यन्त उन प्रासंगिक बने हवय.

दलित जी के कृतित्व मा खेती किसानी के अदभुत चित्रण मिलथे. खेती किसानी ल करीब से देखे अउ जिये हवय येकर सेती उँकर गीत म जीवंत चित्रण मिलथे :-



पाकिस धान-अजान,भेजरी,गुरमटिया,बैकोनी,
कारी-बरई ,बुढ़िया-बांको,लुचाई,श्याम-सलोनी.
धान के डोली पींयर-पींयर,दीखय जइसे सोना,
वो जग-पालनहार बिछाइस,ये सुनहरा बिछौना.
दुलहिन धान लजाय मनेमन, गूनय मुड़ी नवा के,
आही हंसिया-राजा मोला लेगही आज बिहा के.

स्वतंत्रता आंदोलन के बेरा लिखे उँकर प्रेरणादायी छन्द -
अपन देश आजाद करे बर,चलो जेल सँगवारी,
कतको झिन मन चल देइन,आइस अब हमरो बारी.

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गाँधीजी के विचारधारा ले प्रभावित अंग्रेजी हुकूमत  खिलाफ साहित्य ल अपन हथियार बनाईन शिक्षक रहिन तभो ले लइका मनके मन मे स्वतंत्रता के अलख जगाय खातिर राउत दोहा लिख-लिख के प्रेरित करिन.

हमर तिरंगा झंडा भैया, फहरावै असमान.
येकर शान रखे खातिर हम,देबो अपन परान.

अपन मन के उद्गार ल बेबाक लिखइया दलित जी के रचना मन कबीर के काफी नजदीक मिलथे. जइसन फक्कड़ अउ निडर कबीर रहिन वइसने कोदूराम दलित जी. समाज म व्याप्त पाखण्ड के उन जमके विरोध करिन. एक कुण्डलिया देखव :-

ढोंगी मन माला जपैं, लम्हा तिलक लगायँ.
हरिजन ला छीययँ नहीं,चिंगरी मछरी खायँ..
चिंगरी मछरी खायँ, दलित मन ला दुत्कारैं.
कुकुर – बिलाई ला  चूमयँ – चाटयँ पुचकारैं.
छोड़ - छाँड़ के गाँधी के, सुग्घर रसदा ला.
भेद-भाव पनपायँ , जपयँ ढोंगी मन माला.

कोदूराम "दलित" ला जनकवि कहे के पाछू खास वजह ये भी हवय कि उँकर रचना म आम जनता के पीरा हे,आँसू हे,समस्या हे. उँकर कविता सुने के बाद आम अउ खास दूनो मनखे प्रभावित होय बिना नइ रह सकिस. उँकर कविता लोगन मन ला मुँह जुबानी याद रहय . उँकर रचना  समाज म व्याप्त बुराई उपर सीधा चोट करय. जेन भी बात उन लिखिन बिना कोई लाग लपेट के सीधा-सीधा कहिन. छत्तीसगढ़िया के पीरा ल दलित जी अपन जीवनकाल म उकेरिन जेन आज भी प्रासंगिक हवय. उँकर लिखे एक एक शब्द छत्तीसगढ़िया मनखे के हक के बात करथे :-

छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर दार.
हवय लोग मन इहाँ के, सिधवा अउ उदार..
सिधवा अउ उदार, हवयँ दिन रात कमावयँ.
दे दूसर ला भात , अपन मन बासी खावयँ.
ठगथयँ बपुरा मन ला , बंचक मन अड़बड़.
पिछड़े हवय अतेक, इही करन छत्तीसगढ़.

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कवि हृदय मनखे प्रकृति के प्रति उदात्त भाव रखथे काबर कि उँकर मन बहुत कोमल होथे . दलित जी के प्रकृति प्रेम घलो ककरो ले छुपे नइ रहिस. उँकर घनाक्षरी मा प्रकृति के अदभुत चित्रण अउ संदेश मिलथे:-

बन के बिरिच्छ मन, जड़ी-बूटी, कांदा-कुसा
फल-फूल, लकड़ी अउ देयं डारा-पाना जी.
हाड़ा-गोड़ा, माँस-चाम, चरबी, सुरा के बाल
मौहां औ मंजूर पाँखी देय मनमाना जी .
लासा, कोसा, मंदरस, तेल बर बीजा देयं
जभे काम पड़े, तभे जंगल में जाना जी .
बाँस, ठारा, बांख, कोयला, मयाल कांदी औ
खादर, ला-ला के तुम काम निपटाना जी .

विद्यालय कइसन होना चाही दलित जी जे सपना रहिस उँकर कविता मा साफ झलकथे-

अपन गाँव मा शाला-भवन, जुरमिल के बनाव
ओकर हाता के भितरी मा, कुँआ घलो खनाव
फुलवारी अउ रुख लगाके, अच्छा बने सजाव
सुन्दर-सुन्दर पोथी-पुस्तक, बाँचे बर मंगवाव .

खादी के कुर्ता, पायजामा,गाँधी टोपी अउ हाथ मा छाता देख के कोनो भी मनखे दुरिहा ले दलित जी ल पहिचान लय. हँसमुख अउ मिलनसार दलित जी के रचना संसार व्यापक रहिस. गांधीवादी विचार ले प्रेरित होय के कारण सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के संदेश अक्सर अपन रचना म दँय. हास्य व्यंग्य के स्थापति कवि होय के कारण समाज के विसंगति ल अपन व्यंग्य के हिस्सा बनावय. राजनीति उपर उँकर धारदार व्यंग्य देखव-

तब के नेता जन हितकारी.
अब के नेता पदवीधारी..
तब के नेता काटे जेल .
अब के नेता चौथी फेल ..
तब के नेता लिये सुराज .
अब के पूरा भोगैं राज ..

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दलित जी अपन काव्य-कौशल ला केवल लिख के हे नहीं वरन् मंच मा प्रस्तुत करके घला खूब नाव बटोरिन. अपन बेरा मा मंच के सरताज कवि रहिन. सटीक शब्द चयन, परिष्कृत भाखा अउ रचना मन व्याकरण सम्मत रहय जेकर कारण उँकर हर प्रस्तुति प्रभावशाली अउ अमिट छाप छोड़य .कविता काला कहिथे येकर सबसे बढ़िया अउ सटीक परिभाषा दलित जी के ये मात्र दू लाइन ल पढ़ के आप समझ सकथव : -

जइसे मुसुवा निकलथे बिल से,
वइसने कविता निकलथे दिल से.

छत्तीसगढ़ी कविता ल मंचीय रूप दे के श्रेय पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी "विप्र" अउ कोदूराम "दलित" ला जाथे. 50 के दशक म दलित जी के छत्तीसगढ़ी कविता के सरलग प्रसारण आकाशवाणी भोपाल, इंदौर,ग्वालियर अउ नागपुर ले होइस जेकर ले छत्तीसगढ़ी कविता ल नवा ऊँचाई मिलिस. समाज सुधारक के रूप में दलित जी के संदेश अतुलनीय /अनुकरणीय हवय-

भाई एक खदान के, सब्बो पथरा आँय.
कोन्हों खूँदे जाँय नित, कोन्हों पूजे जाँय..
कोन्हों पूजे जाँय, देउँता बन मंदर के.
खूँदे जाथें वोमन फरश बनयँ जे घर के.
चुनो ठउर सुग्घर मंदर के पथरा साँही.
तब तुम घलो सबर दिन पूजे जाहू भाई ..

दलित जी के कुल 13 कृति के उल्लेख मिलथे जेमा-

(१) सियानी गोठ
(२) हमर देश
(३) कनवा समधी
(४) दू-मितान
(५) प्रकृति वर्णन
(६)बाल-कविता - ये सभी पद्य में हैं.

गद्य में उन्होंने जो पुस्तकें लिखी हैं वे हैं

(७) अलहन
(८) कथा-कहानी
(९) प्रहसन
(१०) छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ
(११) बाल-निबंध
(१२) छत्तीसगढ़ी शब्द-भंडार
(13) कृष्ण-जन्म (हिंदी पद्य)

फेर दुर्भाग्य से उँकर जीवनकाल में केवल एक कृति- "सियानी-गोठ" ही प्रकाशित हो सकिस जेमा  ७६ हास्य-व्यंग्य के कुण्डलियाँ संकलित हवय. बाद में बहुजन हिताय बहुजन सुखाय‘ अउ ‘छन्नर छन्नर पैरी बाजे‘ के प्रकाशन होइस. विलक्षण प्रतिभा के धनी लगभग 800 ले आगर रचना करे के उपरांत भी दलित जी आज भी उपेक्षित हवय ये छत्तीसगढ़ी साहित्य बर दुर्भाग्य के बात आय.

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प्रचुर मात्रा म साहित्य उपलब्ध होय के उपरांत भी  दलित जी उपर जतका काम होना रहिस वो आज पर्यन्त नइ हो पाय हवय. कभू कभू तो अइसन भी महसूस होथे कि पिछड़ा दलित समुदाय हा सदियों से जेन उपेक्षा के शिकार रहे हे उही उपेक्षा के शिकार दलित जी भी होगे .

दलित जी साहित्यकार के संग एक आदर्श शिक्षक, समाज सुधारक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अउ संस्कृत के विद्वान भी रहिन. उमन छत्तीसगढ़ी के संगे संग हिंदी के घलो शसक्त हस्ताक्षर रहिन दलित जी साक्षरता अउ प्रौढ़ शिक्षा के प्रबल पक्षधर रहिन. दबे कुचले मनखे मन के पीरा  लिखत लिखत दलितजी 28 सितम्बर 1967 के नश्वर देह ल त्याग के परमात्मा म विलीन होगे.

फेर अपन रचना के माध्यम ले आज भी अपन मौजूदगी के अहसास कराथें . दलित जी के जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण अउ अभाव म बीतीस ,शायद येकरे कारण उमन अपन रचना के प्रकाशन नइ करवा पाइन. आज जरूरत ये बात के हवय कि नवा पीढ़ी उँकर साहित्य के प्रकाशन करवा के गहन अध्ययन भी करयँ.
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