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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- मोर बखरी के फूल

छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- मोर बखरी के फूल

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'मैं तोला दस घौं केहेंव ददा, ओमन मरखंडा हे गाली गुफ्तार करथे, मारपीट करत रहिथें, बात अइसे करथें जइसे करेजा मं छुरी चलावत हैं. अब अइसन घर जाके का मैं परान ल दे दौं?'

‘मैं तोला दस घौं केहेंव ददा, ओमन मरखंडा हे गाली गुफ्तार करथे, मारपीट करत रहिथें, बात अइसे करथें जइसे करेजा मं छुरी चलावत हैं. अब अइसन घर जाके का मैं परान ल दे दौं?’

‘नहीं बेटी, अइसे असगुन बात नइ करैं. भगवान जनम देहे, जिनगी देहे ओला सुग्घर जीना चाही. बात-बनत बिगड़त रहिथे. कभू-कभू तो न अइसे पहाड़ टूटथे जिनगी ऊपर तब का परान ल होम देना चाही. जल के, कट के मर जाना चाही? नहीं ये सब मन के कमजोरी हे बेटी. मन ल अतेक सबल बनाव, पथरा बनाव के कतको छाती ऊपर पहाड़ टूटै के कोनो मोर दरार झन बनै.’
‘तैं मोर बात ल समझत काबर नइ हस ददा के में कहना का चाहत हौं?’

‘सब समझत हौं बेटी, तैं मोला अतेक भोकवा अउ अंगूठा छाप काबर समझत हस? आखिर कतको हस ते मोर बेटी हस अउ एक बेटी के मन के भाव ल बाप नइ समझ सकही तब कोन जानही.’
‘ओ तो सब ठीक हे ददा, फेर…..’

‘ इहां फेर तफेर के बात नइहे बेटी, मैं जानत हौं मोर बेटी के मन बेचैन हे. गोसइयां से ससुराल वाले मन से तोर मन उचट गेहे. ओकर मन के मारपीट उठेंवा सुन-सुन के तैं कउआगे हस. का करौं, का नइ करौं अइसे मन होगे हे. ये सब रस्ता हे ठीक होय के फेर…’

‘रस्ता-वस्ता कुछ नइहे ददा, ओमन राक्षस हें, राक्षस जिंदा मनखे के खून पी जथे. जीन हे येमन, परेशान कर डरे हे मोला. मोर तो खाना, पीना, सोना, उठना बइठना सब हराम होगे हे. न कहूं आ सकत, न कहूं जा सकत हौं. का जिनगी हे. पिंजरा मं बंद पंछी मन असन फड़-फड़ावत रहिथौं. का तैं कहिथस, मैं अइसे घूट-घूट के एकर मन के उठेवा सुन-सुन के जीयत राहौं, मरत राहौं?’

‘तैं अइसे काबर समझथस के मैं तोला घूट-घूट के जिए बर मजबूर कर देहौं. कोनो ककरो सुख-दुख के निर्माता नइ होय बेटी ये बात ल पक्का गांठ बांध के सुरता कर ले. मनखे जतका इहां सुख-दुख पाथे, भोगथे ओ सब ओकर मन के करम के ऊपर होथे, प्रालब्ध होथे. तोर किस्मत गरीब घर लिखाय रहिसे, तब तैं गरीब घर ससुराल गेस. अइसे नहीं के तोला जानसुन के ढकेले हन. अउ बने-बने घर मं गे रहेन फेर रिश्ता तय नइ हो सकिस. लिखाये नइ रहिसे तोर किमसत मं तौंन ल कोन काय करहीं’ ‘ये किस्मत, दुख-सुख, प्रालब्ध काये एकर से मोला कांही वास्ता नइहे. ये सब तोर रामायन, गीता, वेद पुरान के बात है. ये सब ल तैं तोरे मेर रख. हम तो निरबंधन पंछी असन खुले आसमान घूमना-फिरना चाहत हन.’
‘ अइसन कभू नइ हो सकय? ‘
‘ हो सकत हे अउ अब अइसने होही?’
-तैं मोला ललकारत हस बेटी, बाप ल धमकावत हस? तोर अतेक हिम्मत…. जब बाप ल तैं अतेक बोल डरत हस, तब तोर गोसइयां ल तैं का नइ काह डरत होबे, सास-ससुर, जेठ-जेठानी ल का नइ सुनावत होबे?
‘नहीं मोर बाप, तोला मैं अइसे कइसे कही सकत हौं. तैं मोर बात के उल्टा अरथ ले लेस. मैं काहत कुछु रेहेंव अउ तैं समझ गेस कुछ दूसर.’

‘मैं पहिली केहेंव न बेटी, तोर बाप पढ़े लिखे नइहे, अंगूठा छाप हे फेर अतेक भोकवा अउ शंखधपोर घला नइहे के कोनो बात ल ओ समझ नइ सकही, जान नइ सकही. अच्छा करे बेटी जौंन ते मोर आज आंखी खोल देस के तोर नजर मं में का हौं उहू जाने के मौका मिलगे. देख तो भला कइसे जमाना हे, कइसे मनखे. अपने बखरी के फूल विकरे माली ल काहत हे, समझत हे ते ओकर ले गे गुजरे हस.’

दूनों बाप बेटी में अपन खुद के जिंदगी ऊपर गोठियावत रहिन हें. आखिर बेटी बाप के आगू मं टूट गे. फूट-फूट के रोय ले धर लिस. बाप के गला घला रूंधगे. आखिर अपन बेटी के सिर में हाथ फेरत कहिथे- ‘बेटी तोला मैं कुछु नइ दे सकेंव, सुख के एक ठन कण घला नइ दे सकेंव. तैं जतका दुख पावत हस मोर सेती दुख पावत हस. बाप-भाई के राहत ले बेटी, बहिनी मन दुख पाय, ये भला कोनो जुग मं होहे. आज ओ तोर दुख मोला देखे ल पड़थे. फेर का करौं, कइसे तोला समझावौं, कइसे तोर गोसइयां अउ सास-ससुर मन ल समझावौं. इहां तो सब खेल अपन-अपन समझ के ऊपर हे. जब कोनो बात ल समझे बर तइयार होय तब न कोनो मुंह खोलैं. जब बेटी होके तहीं मोर बात ल समझे बर तइयार नइ हस तब तो फेर ओमन परे, दूसर हें.’ नहीं ददा, तैं अपन बेटी ल अतेक गलत झन समझ के मैं इही गम मं मर जावौं. तोला मैं गलत समझ के पाप के, नरक के भागी नइ बनव ददा. मोर मुंह ले कहूं ताता-रोसी मं उल्टा-सुल्टा बात निकल गिस होही तब मांफी दे दे ददा.’

मांफी मांगथस, तैं गला कहिबे ते ये गला तोला काट के दे सकत हौं बेटी. दुख हे के मोर बेटी होके मोला तहीं नइ समझ सके. तोर बाप के हिरदय अतेक सागर हे बेटी के ओकर तल मं जाके देख ले कहां-कहां के गोटी-माटी, पथरा, हीरा-मोती का-का नइ पटाय हे. चारों ओर के नदिया सब दुनिया भर के कूड़ा करकट ल लाके मोर छाती मं पटक देथे. अउ मैं सब ल भोकवा, जोजवा मन असन सहेज के अइसे धर लेथौं जना मना मोर ओहर कोनो पूंजी है. सोच बेटी, नदिया-नरवा मन के ओ कूड़ा करकट ल सागर अपन मं नइ समातिस तब ओ कहां जातिस. या तो बाढ़ मं तबाही मचातिस, जन-धन के हानि होतिस, फसल बरबाद हो जातिस. समझथस न मोर बात ल?

‘हां ददा, समझगेंव. अउ कुछु समझाय के जरूरत नइ हे. तोर एक इशारा, तोर एक संकेत से मैं सब कुछ समझगेंव. आज तैं मोर आंखी खोल देस ददा, सचमुच मोर आंखी खुलगे.’ .

‘मैं बहुत खुश होगेंव, आखिर बेटी काकर हे. समझदार बाप के बेटी समझदार होबे करही. गरहन तो लगबे करथे, बादर हर सुरूज ल तो ढकबे करथे फेर एकर अर्थ कोनो ल ये नइ लगा लेना चाही के अतेक तेज सूर्य ल घला गरहन कइसे लग जथे. आज तक कोनो अइसे बड़े से बड़े मनखे नइ होय हे, राजा नइ होय हे जेला दुख, संकट, मुसीबत के गरहन नइ लगे होय होही. ओ तो आथे, आते रहना घला चाही ओकर से घर जीवन मजबूत होथे. जीवन ल जिए के संदेश मिल जथे, समय जीवन जिए के कला सिखा देथे.’

राधा अपन बेटी ल अतके बेर नहलावत रहिसे. उचक-उचक के ओकर बेटी नाहवत हे. महतारी बेटी दूनों खुश रहिन हैं. हर महतारी बेटी बाप बेटी अइसने खुश रहिथे. खुश रहना घला चाही हर समय खुशी ल कोनो भी हालत मं गंवाना नही चाही. कहिथें घला न खुशी जइसे खुराक नहीं खजाना नहीं. तब कोन दुख अइस, परिस्थिति अइस तब काबर खुशी ल छोड़िन. कुछ भी हो जाए दुख मं घला खुश रहे के कला सीख लेना चाही. इही तो जिनगी हे.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Chhattisgarhi Articles, Chhattisgarhi News

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