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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- समे ल ठेंगा दिखाय के मतलब..!

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ये गीत के अरथ, भाव ल तो सबे जानत हौ, बताय के कोनो ला कांही जरूरत नइहे. फेर इही गीत के भाव के चलते एक ठन समाचार मोर आंखी ...अधिक पढ़ें

ये दे जिनगी के नइहे ठिकाना
लहर गंगा ले लेतेन संगी
लहर गंगा ले लेतेन ना.
काया-माया के नइहे ठिकाना
लहर गंगा ले लेतेन संगी….

ये गीत के अरथ, भाव ल तो सबे जानत हौ, बताय के कोनो ला कांही जरूरत नइहे. फेर इही गीत के भाव के चलते एक ठन समाचार मोर आंखी ले गुजरत रिहिसे. बांबी मछरी असन सलगत रिहिसे. फेर आंखी के महूं तेज हौं, अगास मं कोन चिरई उड़त हे तेकरो पंख के चिनहारी करके बता सकत हौं, ओ कोन चिरई हे. दुगोडिय़ा अउ बिना पंख के चिरई मन के बात नइ करत हौं. बहुत अकन बुलबुल, मैना, सुआ, टेहरी, कोयली असन चिरई मोर आगू-पीछू ले फर्राटा मारत उड़ा जथे, उड़ावत अउ फडफ़ड़ावत रहिथे फेर अइसन कोनो कोती हीरक के नइ निहारौ, सुधौं नहीं. भाव नइ मिलत हे, नइ देवत हे, कइके समझथे तहां ले मुंह अइठत चलते बनथे. थोरको बात ल ओरियाय, मुसकाय ले धरे, आंखी ल एती-ओती करे तहां ले गरी (मछली मारने का कांटायुक्त औजार) मं फंसे मछरी असन तोर उपर झपाय परथे. एकरे ले परे ले टरे बने.

हां तब ओ समाचार अइसन हे जउन मोर आंखी मं कांटा असन अरझगे. बहुत उदीम करेव ओ कांटा निकल जाय फेर निकलबे नइ करिस. अस्पताल जातेंव तब डॉक्टर जरूर ओ कांटा ल निकाल देतिस, काबर के एक घौं अइसने मोर बहिनी के आंखी मं परे कचरा ल निकलावय बर अस्पताल मं भरती करे ले परे रिहिसे. फेर अभी जउन कांटा मोर आंखी मं अरहजगे हे, ओ तो निकलबे नइ करत हे. कसकत हे बहुत अउ दरद घला देवत हे. आंखी ल रमंज-रमंज के परेशान हौं. आंसू घला निकलत हे.
समझ नइ परत हे, का करौं, कइसे करौं, कहां जांव. ये वो कांटा हे जेला कोनो अस्पताल के डॉक्टर अउ सरजन मन घला नइ निकाल सकयं. हलाकान होगे हौं, मोर करलई ल देखके घर के लइका-सियान घला परेशान हे. गोसइन हा अलग ताना मारत हे, देखके रेंगस नहीं धुर्रा-माटी, आंधी-तूफान, बड़ोरा के कुछु जिनिस झपागे होही?.

गोसइन ल कहिथौं- थोकन मोर तीर मं देख तो का परे हे आंख मं तउन ला फूंक तो दे थोकन. ओहर ताना मारत कहिथे- गजब अंखियावत रेंगत रहिथस ना, अब भुगत, अइसन तो नहीं ते कोनो रोगही मन तोला नजर लगा दे होही? ओला फटकारत कहिथौं, जादा टिमाली झन मार, कोन मरत हे का के मारे अउ तोला हरियर सुझे हे. ओ नइ अइस, जान डरिस, ये बहुत चलता-पुरजा हे, उतिअइल हे. ठट्ठा मढ़ावत हे.

बात अइसन नोहय, जइसन सब सोचत होहू, अउ गोसइन घलां सोचत हे. जेकर आंखी मं फांस कभू परे होही, कांटा के सोटा परगे होही ओकर दरद, कसकत हे तेला तो उही जान सकत हे. ओ फांस अउ कांटा ल जानिहौ तब सब माथा घर के बइठ जाहूं, के ये आज का होवत हे. ये जबर कांटा के पढ़ई. आज बेटी-बेटा मन पढ़-लिख के कहां लेकहां नइ पहुंचगे हे. बड़े-बड़े डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, कलेक्टर, कमिश्नर, सीईओ, चार्टर एकाउन्टेंट, पायलट, उद्योगपति अउ बिजनेसमेन होगे हे. देश-विदेश मं बगरगे हे. दाई-ददा मन घला ओमन ला बढ़ावा दिन. सब बेटी-बेटी लाखों-करोड़ों अउ कोनो-कोनो तो अरबपति के घुड़दउड़ में शामिल होगे हे.

फेर सबसे मुसीबत के बात ल सुनिहौ, जानिहौ, तब माथा धर के बइठ जाहौं. ओ बेटी-बेटा मन के उमर तीस-पैंतीस ल कोन काहय चालीस ले ऊपर रेंगे ले धर ले हे घड़ी के कांटा बरोबर. फेर कोनो बिहाव करे ले नई धरत हे . ओमन ल जोयाबे तब कहिथे- ”कैरियर फस्र्ट पापा, शादी बाद में अइसन हिन्दी-अंग्रेजी मं जवाब दे ले धर लेथे. अब मुसीबत ये आगे हे के बेटी मन के उमर जहां अधियाय ले धरथे तहां कोनो ओमन ल लड़का नइ मिले ले धरय. लड़का वाले मन के दाई-ददा कहिथे- का डोकरी ल बहू बनाके लानबो, हमर बेटा तो जिनगी के सुखे नइ भोग पाही.

उमर जहां अधिया जथे तहां जिनगी के ओ सुख जेकर बर आदम तरसथे, नइ मिल पाय. कैरियर अउ धन कमाय के चक्कर में सरी जीवन ला मटियामेट करत हे. दुबारा ओ उमर, ओ जवानी, ओ सुख पाय के अवसर कहां मिल पाही. असाढ़ के चुके किसान अउ डार के चुके बेंदरा के जउन गति होथे तइसने ये बेटी-बंटा मन तलवार के धार मं चलत हे. विदेश मं तो कइसनो करके अपन जीवन साथी के जुगाड़ कर लेथे फेर भारतीय संस्कृति जइसन ओमन करथे इहां के बेटी-बंटा मन ला ओकर समाज, दाई-ददा मन अनुमति नइ देवय. इहां संस्कृति, सभ्यता, परम्परा रीति-रिवाज, कुल, गोत्र मं अइसे जकड़े हे, जेमा ले ऊबर पाना कठिन होथे.

इही हे जबर कांटा जउन गड़े हे मोर आंखी मं, कसकत हे बहुत फेर का करबे जइसे मकड़ी जाला बुनत-बुनत खुदे अपने बनाय जाला मं फंस जथे, मर जथे, तइसे भारतीय बेटी-बेटा मन के होवत हे. सबके शादी मं जइसे ‘ब्रेक लगे ले धरले हे. कैरियर अउ धन कमाय के लालच ओकर मन के जिनगी ल अजगर सही निगलत जात हे. बेटी-बंटा मन संग ओकर दाई-ददा मन घला छटपटावत हे फेर कर कुछ नइ सकय अब, काबर के बेरा खसलत जात हे. जादा चतुराई घला कोनो काम के नइ होवय, जउन समाचार पढ़ेंव तेमा देश-विदेश मं काम करत बेटी-बेटा मन के इंटरव्यू घला छपे हे. सब धपोर दे हे, बइला धूरा ल पटक दे हे. अब न कुछु करत बनत हे न जोखा बनावत. ‘होइहैं सोई जो राम रचि राखा इही एक ठो रस्दा रहिगे हे.

अब ऊपर के गीत के भाव समझाय के कोनो जरूरत नइ हे. जउन जिनगी संग खेलही जिनगी ओला खेला दिही, मजा चखा दिही.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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