छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें-अनवार देते, केहेंव दिदी, नवा लुगरा बने फबही ओ...

छत्तीसगढ़ी विशेष.
छत्तीसगढ़ी विशेष.

सबो के सेती रंधना - गढ़ना . मन लगा के कहूं लगे रहिबे न त अपन आप ला घलो बने लागथे. घरे भीतरी रेहे रा अपन मा मगन . लम्बा परिवार हे समिलहा सबो झन एके संघरा रइथन. अपन - अपन ले तियारे के सेती पारी बांध के काम बुता ला सकेल लेथन.

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तिहीं अनवारे रेहे नहीं न कहिंतो. आज होगे अन्टेरहा गोठियावत हस.  इही हरय अपन के मया. कोनो कखरो संग मसखरी करे असन गोठिया लेतिस ततके मा आत्मा जुड़ा जावय. लुगरा के काए कोनो पहिरय फबहिच. बने फबाव घलोक ला आत्मा संग जुराव के सेती होथे. आत्मा कहुं बने हे त सबो डहर बनेच बने रइथे. देखही तेनो नइ पतियाही. आजो अपन जौंजर संग ठट्ठा - दिल्लगी कतका मड़ाथन. सोग परे के दिन सोग नइते सोग लागथे कहिके टरकाए असन घलोक कतको झन करथें. टरकाए बर ककरो सेती - मेती नइ लागय अपने अपन परगट होए असन दिख जाथे.

अइसे हे मानुस चोला. गांव - गंवतरि जवई घलोक हा आजकल एक ठन बुता असन लागथे ' ओसरबेच नइ करय. तिहार - बार , मेला मड़ई , रमायन , भागवत पईत घलोक घर हा गमगम करत रइंथे. चिहुर पारत लइका राहय चाहे आडर भारत सियान सबो अपन - अपन रंग घर ला रंगे रइथे. फेर एहा मोरे सेती आवय अइसे झन होवय कहिके ठलहा बुता के आड़ मा अपन बर घलोक समय चाही. गोठ बात करइया सगा सोदर अउ ओखर संउख ला पूरा करे बर हे. को जनी फेर कब आना होही , कब भेंट होही. आज ला खुशियाली के साथ आजे जीना चाही. माने गउने रहिबे तेने हा आगू काम आही.

अब देख के कुकरा बासेच नइये डोकरी के खुटुर - खुटुर सुरु होगे.  हमर घर तो इंकरे सेती चोर - चिहार के भरम घलोक नइ होवय. जान डारही त हुंत करा के सबो झन जगा डारही अइसे हे हमर घर. पहातिच बेरा के बुता के बुता मांजे , धोए के रइथे.  रातेच कुन बोरत सकेलत कतका रात होगे रिहिस अइसे सोंचत - सोंचत बुता कतका बेर सिरा गिस पतत नइ चलिस. सबो के सेती रंधना - गढ़ना . मन लगा के कहूं लगे रहिबे न त अपन आप ला घलो बने लागथे. घरे भीतरी रेहे रा अपन मा मगन . लम्बा परिवार हे समिलहा सबो झन एके संघरा रइथन. अपन - अपन ले तियारे के सेती पारी बांध के काम बुता ला सकेल लेथन. तरिया , नंदिया नइ होतिस ते दुनिया मा का होवत हे पतत नइ चलतिस. कतको नवा नेवरनिन ला एक दिन सबो झेल ला सहत अपन संगी संगवारी , सुख - दुख गोठियइया मिलिच जाथे. खेले कूद के दिन मा खेलई कुदई अउ घर जिनगी के उमर मा घर जिनगी.



नियम धरम , पांव पयलगी , रोटी पीठा दिया चुकलिया ,पुतरी - पुतरा ए सब काए एमा आने वाला समय के सीख हे. धुर्रा ला चुपरगे नानकुन के अपन मजा लेवई.  चिखला पानी के अपन मजा . पेड़, पहाड़ , पान, पतई संग धमा चौकड़ी करत उम्मर लागत ले सबो सीख मीठ लागथे. महीना , बछर ला गनत - गनत चलत राहय जिनगी अउ का चाही. नानपन के सरता मा कतका खजाना भरे हे.  मन मा आथे नान - नान रेहेन त दइसे करन वइसे करन. आजो संगी - संगवारी मिलिन तहां ओही गोठ बात. अपन - अपन जगा मा खड़ा होके पूरा नाटक ला उतारना कतका अच्छा लागथे . संगी जहुंरिया तीर रेहे मा सबो दुख हा भगा जथे . थोरिक देर ही सही अपन आप संग जिये के मौका मिलथे . गांव के गुड़ी चंवरा. नियाव - पंचाइत के ठीहा . कोटवार के हांका परई. समाचार पत्र कहां राहय कांही जनवाना हे ते हांका परवा दे . कोटवारी काम तगड़ा राहय . चउक - चउक मा हांका परवा दे . हांका सुनत लइका मन के मजमा लाग जाय .
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मनोरंजन बर लीला मंडली मा रात - रात जागना . बोरा , सरकी धरे बिहिनिया अपन घर आना कतका सुघ्घर लागय .डांट - डपट राहय फेर मयारूक बोली मा . कलेचुप सुनले होगे .अउ एक बात अब तो बंधन होगे हे नइते हमर जमाना मा भालू , बेंदरा नचइया आवय हांस - हांस के पेट फूल जावय . डंगचगहा के डांग धरे - धरे खेल दिखाना . डोलक , डमरु के गमकत आवाज राहय . बसदेवा मन जय गंगान काहत झनकावत राहयं एही तो सुरता के आंखी हे.  सुरता ला अइसने लमा - लमा के कतको झन अपन दुख ला भुला जथें . अभी के समे मा दुख ला भुलाना ही सार हे , काबर के कोनो मनखे अइसे नइ मिलय जेला कांही दुख हा नइ सारत होही . सुख अउ दुख हा तराजू के पलवा ले . बीचो-बीच रेहे रा तोर मन जेन डाहर झुक जाए ओला निभाव करत रा बस अतके जिनगी के सार ए . नवा नव दिन चलय चाहे झन चलय सोंच नवा होना चाही .
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