छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: छत्तीसगढ़ के मनखे खदर अउ खपरा छानही मा लेवय एसी के मजा

बीस बछर के छानही मा होय खरचा ला गनबे त लेंटर ले उपराहा खरचा हो जथे, तभो ले छानही वाला मन हा कमजोरहच कहाथे.  खदर के छानही बना के हमर पुरखामन जुग जुग ले एसी असन सुख पावत रीहिन.  बेरा बदलगे जेन चीज हा कभू संस्कृति बिग्यान के चिन्हारी रीहिस उही आज गरीब होय के चिन्हा होगे हे.

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  • Last Updated: September 18, 2020, 1:05 AM IST
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लेखक: ललित साहू 'जख्मी'

कलजुग म लकलक-लकलक तिपत भुईंया गरर-गरर झांझ म लहकत ऊंच-ऊंच काँच के बिल्डिंग हा हमर तरक्की के चिन्हा आय.  अइसन मा छानही खपरा के घर ल कोन पुछत हे, छानही खपरा के नंदावत घर म जतका बाँच गेहे तेमन ल असाढ़ लगे के पाख भर पहिलीच ले छानही छवाय के संसो धर लेथे, बड़ खोजे मा खपरा लहुटईया मिलथे त ओखर बनिहारी हा नंगत रइथे, काबर के खपरा लहुटाये बर घलो सबे ला नइ आवय, कते कर चिपा देना हे, कते करा के काड़ बदलना हे, कते खपरा सइही कते फूटही तेला जम्मों मनखे नइ जानय.  त जेन हा जानथे तेखर भाव बाढ़े रइथे.

तईहा गांव मा कतको झन खपरा नल्ली बनावय बऊरे अउ बेचे फेर अब बेरा आने होगे हे, अब साँचा ले हाथ के बनाय खपरा ल कोनहो पसंद नइ करय, जम्मों झन ल चिक्कन दिखत नल्ली म अपन छानही ल संवारे के मन होथे त कुम्हार के बनाये नाली ल जम्मों झन बिसा के बउरथे, कुम्हार मन बड़ दिन ले खपरा नाली बना के राखे रइथे, पहिली कई कीसम के खपरा नाली मिले, फेर अब एक नाप के नाली भर ज्यादा बनथे, येला छाय मा सरल होथे, अउ कुम्हार ल बनाय म घलो सरल होथे, फेर वहू मन ल अब माटी मंगउनी पकोय बर लकड़ी बनिहारी जम्मों चीज हा मंहगी परथे, अउ लेवाल घलो कम होगे हे, त वहू मन खपरा नल्ली के कीमत ल बढ़ा देथे.



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खपरा, बनिहार, काड़ कोरई कमचिल मियार, झन चुहे कइके झिल्ली, छानही के जोड़ अउ ओरछा में डोंगी अतका अकन हर बछर करत ले कतको पइसा सिरा जथे, फेर बेंदरा कुदई मा छानही एकमई हो जथे, कभू मुसवा मन झिल्ली ल भोंगरा कर देथे अतका हलाकानी ल सही के बीस बछर के छानही मा होय खरचा ल गनबे त लेंटर ले उपराहा खरचा हो जथे, फेर प्रकृति ल अइसन घर ले कोनहो नकसान घलो नइ होय, अब प्रकृति के संसो कोने ल हे, कतको खरचा होय फेर खपरा छानही के घर वाला मन कमजोरहच कहाथे.

अउ अब तो मनखे नवा जुगत निकाल डरे हावय, छानही मे खपरा के जगा टीना लगावत हे, येहा गरमी जड़काला काहीं मा आराम नइ देवय, फेर मनखे हा सस्ता सोजहे पाके टीना छवाय म परहेज नइ करत हे.  अउ बेरा बखत के गोठ आय, जेन चीज हा कभू संस्कृति विगियान के चिन्हारी रीहिस, उही आज गरीब होय के चिन्हा होगे हे.  तइहा सिरमिट पथरा के घर कमे देखे बर मिले, फेर अब लेंटर वाला घर हा सान देखाय के साधन आय, घर में चार झन मनखे रथे त बीस ठन कुरिया.  तइहा गरिबहा मनखे जुच्छा माटी के खदर छानही वाला घर, अऊ पोठ मन हा पटाव छानही वाला घर उचाय.

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माटी पेरऊसी अऊ कुधरी ल सना के कोठ ल बरंडे ले, अऊ छानही म डारा छिन ल डार के छाय ले घर हा वातानुकूलित हो जाये.  खदर के छानही बना के हमर पुरखामन जुग- जुग ले एसी असन सुख पावत रीहिन, अइसन घर कुरिया म रेहे मनखे येखर सुख ल जानथे.  ना जड़कल्ला मा जाड़ लागे ना गरमी मा घाम जनाये, अइसन घर मन भुईंया के तापमान ल घलो नइ बिगाड़े.  तईहा जतका जरूरत राहय ओतकी घर दुवारी राखय, उपराहा के लालच कोनहो ल नइ रीहिस, अऊ फेर अबादी घलो तो कम राहय.  सुघ्घर गांव, गांव म नान्हे-नान्हे घर, घर मा गोबर लिपाय दुवार अऊ अंगना, अंगना मा सुघ्घर तुलसी चाँवरा, बखरी में लहकत रूख राई, कुंआ अऊ किंयारी मा फूल पान, मुड़ छुवऊल खपरा के छानही, ओरछा ये जम्मों अब  तईहा के गोठ होगे हे.
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