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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- अपन-अपन भाग

छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- अपन-अपन भाग

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'देख दुकलहीन मैं मरहूं ना, तहां ले मोर लइका मन ल दुख झन देबे, बाढ़ जहीं तहां ले ओकर मन के बने सुग्घर घर मं बिहाव करबे, बने पुतरी असन बहू लाबे अउ मोर ओ बेटी मन ल बने खाता-पीता घर मं देबे, नंगरा के हाथ झन धरा देबे नइ ते बिन मारे के मारे मर जाही बपूरी मन.

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अइसन मरे जीये के नांव ल काबर लेथस बुधारू के ददा. अभी तो तोर सरी उमर पहाय बर बाचे हे. अतके मं उकतागेस का?
अरे नहीं ओ जकली, तैं तो जानबे करथस मोर पेट के पीरा ल? न बेरा लागय न कुबेरा, न संझा देखय न बिहनिया, न दिन देखय न रात न जाड़ देखय न गरमी, बस जतके बेर ओकर मन आइस मोर उपर झपा जाथे. अउ हां- तुमन खिसियाथव तो घला न मोर उपर कतेक टिरटिरहा होगे हे कहिके? बहू, बेटा, बेटी सब झन खिसियाथव, रात दिन येकर पेटे पीरा ये कहिके? दवई दारू घला अब्बड़ लागथे. हमन गरीब मनखे, अतेक दवा दारू ल कहां ले खरीदे सकबों, कहूं उधार-बाढ़ी करके खरीद ले तब ये दे घर मं चुलहा हर कइसे जलही? इही सब बात ल गुनथव रे मोर लेड़गी, बने मर जतेंव ना तहां ले दुनिया के हर-हर कट-कट ले महूं बाहिर हो जातेंव अउ तहूं मन मोर ले मुक्ति पा जातेव.

पांच साल पहिली जब रामदास ला पेट पीरा उठे रिहिसे तब अपन गोसइन ला ओहर झुंझला के ये बात ल कहि दे रिहिसे. आज ओकर पेट के पीरा फेर उठगे तब दुकलहीन हर ओकर उपर खिसियाय ले धरलिस. ओहर कहिथे-थोरको एकर पेटा पीरा उठिस तहां ले आयबांय बइहा मन असन गोठियावत रहिथे. दस घौं होगे मोला समझावत, झन पी दारू अउ झन खा तमाखू ल कहिके फेर कभू माने के नांव लेथस? कइसे पेट पिराथे तहां दउड़े-दउड़े घर आथस अउ लइका मन असन सुल्हार के कथस-ये बुधारू के दाई आना थोकन पेट ला लगर दे वो. गउकिन अब्बड़ पीरा करथे, अइसे लागथे जाना-माना परान हर अभीच्चे निकल जाही? का करबे, ये चोला के मन मानय नहीं अउ पेट ला लगरत-लगरत बिहानी के रात कतका बेर हो जथे गम नइ मिलय.
रामदास कहिथे-अब आज ले कभू नइ पियौं दारू वो, न तमाखू खांव. अउ दारू मैं पिथौंच कहां, महीना मं एकाध घौं उहू हर मोर पइसा के नहीं संगवारी मन पिया देथे तब पी लेथौं. हां, भई तमाखू खवई हर नइ छूटते. अब्बड़ कोशिश करेंव बुधारू के दाई, फेर निसा तो निसा आय अपन कोती कइसनोच करके खींच लेथे.

अरे मैं पूछौँ तोला भला, अपन पेट ला देखबे ते तोर निसा ला? अरे इही निसा मन तोर जीव के काल हे. हमर काम समझाय के बबा, मानना अउ नइ मानना तोर काम. तोर असन अप्पत ला तो समझावत-समझावत मोर माथा पीरा जथे. अरे आज तैं निसा करत हस काल तोला देख के तोर लइका मन करहीं. तब घर के भट्टा नइ बइठगे मोर?’ दुकलहीन थोकन फटकार के कहिथे.
गजब चिंता अउ फिकर करथस ओ बुधारू के दाई तैहर, अपन दाई ददा के एक झन भाई अउ एक झन बहिनी हन. एक एकलावत के हाल तो सबो जानथौं. गजब खायेंन अउ उड़ायेन अउ अब तो आधा दर्जन लइका मोर होगे. सब खाना-पीना सटकगे. कभू-कभार अब निसा करे ले मिल जाथे तौनों ला तैं उटक डरथस. रिहिस सवाल ये लइका मन के-इहां सब अपन-अपन भाग लेके आथें. जइसन जौन करम करत जाहीं वइसने ओला फल मिलत जाही. मेहनत करही दू रोटी खांही, नइ कमाही, अलाली करही लांघन मरही. दाई ददा लइका मन ला जनम देथे, पालन-पोषण करथे, फेर करम भर ला ओकर कभू नइ दे सकय.

दुकलहिन घात किसम-किसम के गोठियाय ले सिखे हस? अपन कुला इहां धोवावत नइहे अउ दूसर ल बड़ा उपदेश बघारथस. तैंहर कथस-लइका मन के बर-बिहाव मोर मरे के बाद बने घर में करबे, बने पुतरी असन बहू लाबे कहिके? तब तैं तो अपन बड़े बेटा के बिहाव बने करे हस, लाय हस बने घर ले बने चुन के बहू, अब काबर ओकर हाथ के रांधे ल नइ खांव कथस?
रामदास- टार भई ओ बात ल, जरे मं नून ल झन अउ डार?

हां, अब केहेंव तब कइसे लागिसे जरे असन? तीन साल घला नइ पहाय पाइस, बेटा ल घला अलगिया देस? मैं होतेंव तब पास- पड़ोस के मन कहितिन- सास बहू अब्बड़ दिन-रात किटिर-किटिर होवत रिहिन हे, पड़ोसिन मन का एक दू घौं कुछ बात बर तोर बहू ल कहि देंव तब तहीं रोक दस बहू उपर खिसियाते रहिथस कहिके. कुकुर मांस तो नइ खा लेवत रहेंव जेमा तोर पुतरी असन बहू ल चाबे बर दउड़ावौं? तोला किहिस तब कइसे तोर आंखी जग-जग ले उघरिस. अपन मरे बिगन सरग नइ दिखय कहिथे तौंन सही बात हे. दुकलहीन फेर ओकर ऊपर बिफर जाथे. फेर का करबे पेट पिरहा के संगत मं होके सरी उमर ला पहावत आवथे, चार आंसू ढारत आवथे.

अधरतिहा बुधारू हर गुड़ी तीर ले बइठ-बुठा के आथे. रामदास इहां घर में पेट के पीरा मं मरत राहय, तड़फत राहय मछरी असन. दाई चंडालिन हर सेवा जतन में लगे राहय फेर ओ बेटा हर अतका नइ पूछिस- ददा हर का अभी ले नइ सुते हे वो, का फेर पेट हर ओकर पिरावत हे? सकरी ल देके सुतगे बाबू राहय तौंन हर .

दुकलहीन मने मन मं रोथे, गुन के अपन शरीर ल चुरोवत जाथे. एक मन मं अपन बेटा ल गारी देथे, बखानथे- ‘का तोला नानपन मं इकरे सेती पाल पोस के बड़े करेंव के अपन हाथ गोड़ में खड़ा हो जाबे तहां ले अइसने लात मारबे कहिके? का तोला इकरे सेती नौ महीना ले अपन ओदर मं राखेंव, अपन छाती ल चीर के तोला दूध पियायेंव के बड़े होबे तहां ले हमन ल लाल लाल आंखी देखाबे अउ अलग बिलग हो जाबे कहिके? तोला अइसन जानतेव ते नानपन मं चिरई के घेंघा ला मुरकेट के मारे असन मार दे तेंव- कोन गम पातिस? फेर का करबे महतारी के अपन मया होथे. आज विही माया हर घर ला कोन घाट मं उतार दिस.

रामदास अपन पेट के पारा ल नइ सहे सकिस तब फेर आज दारू पीके आगे रहिसे अउ जइसने पावत गिस तइसने सब ला गाली गुफ्तार लगवाता रिहिस हे. पेट के मलई मं ओकर एक पोहई घी सिरागे. जेकर किसमत मं दूध-भात लिखे हे ओला कोन होथन हम लगावत रहिसे. जब होस आथे तब कहिथे-बुधारू कहां हे वो, काम ले आय हे ते नइ आय हे?

दुकलहीन- नइ आये, मरगे तोर बेटा हर विही डाहर. जीयत रहितिस तब आतिस नहीं का तोला देखे बर? बहिनी परे हे खटिया मं कभू हीरक के निहारे हे एती? काबर निहारही अब का जरूरत हे ओला निहारे के, कोन होथन हमन ओकर?

रामदास- अइसे नइ काहय गोई मोर, अरे अतेक दिन ले मैं खिसियावत रेहेंव हौं आज तैं ओकर उपर खिसियावत हस?
दुकलहीन- खिसियाहूं नहीं तब का ओकर आरती उतारिहौं, उठन दे बिहनिया जब ओला अगतरिया-अगतारिया मार के ओकर होश ठिकाना मं नइ ला दे हौं ते महूं हर ओकर महतारी नहीं? जादा कहुं मुंह लड़ाही तब ओकर जबड़ा ला टोर दुहूं. करिस अतेक दिन ले मुहजोरी. जान दे लइका हुस हे, आज अक्कल आही काल अक्कल आही फेर ओहर तो हध कर दिस. अब छानही मं चढ़ के ओर भुजे ले धर ले हे. नान नान भाई बहिनी एक झन कमइया अउ दस झन खवइया कइसे घर चलही. कोरा कोरा बुलक जाहूं काहत होही ओ बाबू हर.

जान दे वो, कतको बड़े होगे ओहर तब का होगे, हमर बर अभी ले लइकेच बरोबर हे. कइसे करबे अब ओकर अक्कल नइ पूरत हे तौंन ल. अरे हमर घर गिरस्थी तो जइसन चलत आवत हे वइसने चलही. अपने बने खुश राहय भई, खाय-कमाय राज करय. हम पेरावत हन तब पेरावथन ओ काबर हमर संग गहूं म कीरा असन रमजाय. जेकर किसमत मं दूध-भात लिखे हे ओला कोन होथन हम टरइया, हमर सरी उमर तो नून-बासी खात-खात पहावत हे.

अपन गोसइयां के ये बात ल सुनके दुकलहीन गोहार पारके रो डारिस. अपन जिनगानी ल दोष देवत ओहर कहिथे- मैं भगवान करा ले का मांग के आय रेहेंव ते मोला काकर संग मिलिस? सब ल सुनत रहेंव तापत हाबौं मोर आगू अवइया समय हर सुग्घर होही फेर बिधिना के माया ल भला कोन टार सकथे.

अपन दाई के रोना ला सुनथे तब बुधारू गोसइन-फूलमती ल पूछथे दाई हर काबर रोवत हे वो? ओहर मुंह ल अइठत कथे-जेकर रोय के बदे हे तौंन रोबे करिही, हंसइया ल कोन रोक सकत हे. बुधारू अपन परानी के टेड़गा बात ल नइ समझ सकिस अउ न उठके अपन दाई करा का बात होगे तेला देखे ले अइस. महतारी जौंन ओला पालपोस के अतेक जाड़ करिस आज विही हर ओकर बर अतेक किरकिरी होगे? झांके बर ओला एक मिनट के फुरसत नइ मिलिस? बेटा घला बखत समय में बाम होगे.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Chhattisgarh news, Chhattisgarhi Articles

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