छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: जुगाड़, बिन पेंदी के लोटा, तेमा अंगरा ला भरके अस्तरी चला

जुगाड़ मा कतको सौखीन मन ला शिक्षा घलोक मिल जथे. वो जान डारथे जुगाड़ के घलोक अपन दुनिया हे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2020, 12:20 PM IST
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पन-अपन जगा देख के सब्बो झन जुगाड़ मा लगे रइथें. अस्तरी चलाए के सौखीन आदमी अपनो जुगाड़ कर डारथे. अंगरा ला मार रब - रब ले धर के लोटा मा डार अउ संगसी मा धर के रेंगावत रा. थोरको जुड़ाइस तहां समस्या हे, वोला उलद, राख ला झर्रा तलघस ले आगी सिता गे गय. कोखरो घर संगसी के जुगाड़ नइ होइस ते फरिया ला का होय के मुहड़ा मा बाहिर डाहर चमचम ले भंवाके के बांध अउ रेंगा. इही जुगाड़ मा कतको सौखीन मन ला शिक्षा घलोक मिल जथे. वो जान डारथे जुगाड़ के घलोक अपन दुनिया हे.

बारी-बखरी मा कहूं ढेखरा के जुगाड़ होगे तहांले नार-विचार तुरते झोंक लेथे अउ छान्ही कोती चढ़े ला धर लेथे. समय पाके फूले-फरे के बेरा मा ओखर सुघराई के का कहना हे. कुंवर - कुंवर देह अउ केंवची - केंवची काया. फेर ए जुगाड़ हा सब्बो दिन बर नोहे, समय आइस तहां अपने अपन ओसक जाथे. ओसके के पहिली जतन करइया आने पईत बर जतन कर डारथे घर-परिवार अउ समाज सब्बो जगा कहूं न कहूं जुगाड़ करइया मनखे के अलग पहिचान होथे. जानसुन के कतको झन लपरवाही तको कर डारथें. लपरवाह मन ला घलोक सुधारने वाला के पाले पड़ना परथे.

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एकठन किस्सा हे - दोहा असन लागथे
"करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान
रसरी आत जात ते, सिल पर परत निशान"

नवा जमाना के लइकामन ला कुंवा के तीर मा लेगना परही. इहां कुंवा के पथरा अउ डोलची मा बंधाए रस्सी के किस्सा हरय. पनिहारिन मन ला बारो महिना पानी कांजी बर जाना परथे. घेरी पईत के रस्सी संग घंसर-घंसर के पथरा घलोक नरम पर जथे अउ निशान छोड़ देथे. फेर अब डोलची के बंधना कहूं टूटगे अउ  जझरंग ले कुंवा मा डोलची गिरगे तहां ले का पूछना हे. हेरे बर कांटा के जुगाड़. जुगाड़ तो हो जथे फेर कोनो-कोनो घर मा मांगे, जांचे चीज ला लहुटाए मा लपरवाही होथे. तेखरे सेती कांटा वाला घलोक जुगाड़ निकालिस किहिस भइया कांटा ला लेगबेच करबे फेर एकर सेती तोर घर के लोटा ला लान अउ दे पठेरा मा मड़ा अपन काम होगे होगे तहां कांटा ला लान अउ लोटा ला लेग. ए हरय जुगाड़ ऊपर जुगाड़. एमा जमानत परिस लोटा. अइसने कतको बुता हे तेमा आपसी समझदारी हा बने काम करथे.

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गांव-गंवई मा बारो महिना खेती किसानी के बुता रइथे. कांही न कांही मांगे बर परिच जाथे. अब धान मिंजना हे पेर डरागे घरो-घर बईला मांगे बर जा. गाड़ी बइला, नांगर, बक्खर बारी-बियारा सब्बो जगा के अपन महत्तम हे. फेर जांच-मांज के अपन काम ला निपटा ए हरय जिनगी के सार. जांगर ओथिया आदमी कांही न कांही रद्दा निकाल के जब देखबे तब जुगाड़ मा लगे रइथे. अलाल मेरन कांही बुता नइ राहय. अइसे बहाना मारके तोला बिलोरही के मत पूछ. अच्छा जगा मा तोर नरई ला धरे असन गोठियाही तें चिट पोट नइ करे सकस ओकर जुगाड़ तुरतेच होगे. का पूछना हे फेर. अइसनहा के दिन ले चलही, कतका झन ला ठग-फुसारी करके जी पाबे. एक दिन तोर आंखी जरूर उघरही अउ तें जान डारबे के अतका दिन ले अपन आप ऊपर कतका अतियाचार करे हस.

बिन पेंदा के लोटा हर उदाहरण हरय. ओखर उपयोगिता हे. वोला बउरना हे त ओखरे आदत बेवहार ला देखके बउरना परही. छपछप ले पानी भरके ओखरे लाइक जगा मा मड़ाबे ता कइसे उलंडही. समाज मा अलाल मन ला सुधारे घलोक मा सियानी रद्दा के चिन्हारी आजो जरूरी हे.
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