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छत्तीसगढ़ी लेख: मंच-संचालन के कला अउ कार्यक्रम

छत्तीसगढ़ी लेख

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अटपट-झटपट सरकारी तामझाम म उद्देश्य तोपा जथे. काम निपटाओ के चक्कर म कार्यक्रम कोती जनता के खिंचाव कमती होवत जात हे. मंच म नेता मन के भीड़ बाढ़े ले मंच ह बोझा बोहे कस हो जथे.

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आजकल जादातर सरकारी कार्यक्रम नेंग पूरा करे बर होथे. अटपट-झटपट सरकारी तामझाम म उद्देश्य तोपा जथे. काम निपटाओ के चक्कर म कार्यक्रम कोती जनता के खिंचाव कमती होवत जात हे. मंच म नेता मन के भीड़ बाढ़े ले मंच ह बोझा बोहे कस हो जथे. ओखर परभाव कार्यक्रम के सफलता/असफलता के रूप म सामने आथे. गैर सरकारी कार्यक्रम म घलो जब कोनो मंत्री या नेता/पदाधिकारी मुख्य अतिथि या विशेष अतिथि होथें तब अनामांकित मन ल झेलना आयोजक/मंच-संचालक के मजबूरी होथे. मंच के अपन मरियादा अउ अनुशासन होथे. कार्यक्रम के सुन्दरता अउ ओखर सफलता बर ये जरूरी होथे के मंच म स्थान पवइया मन के संख्या अउ पदनाम पहिली ले सुनिश्चित होना चाही. मंच म कोन-कोन बइठही ये पहिली ले तय करके मंच म ओतके कुरसी रखना चाही जतका सुनिश्चित हे. सुसज्जित मंच म मुख्य अतिथि, विशेष-अतिथि, अतिथि मंच-संचालक बर स्थान तय होथे.

कार्यक्रम के गुणवत्ता अउ ओखर गरिमा के अनुसार मंच सज्जा होना चाहिए. आजकल मच घलो संतुष्ट करे करे के साधन होगे हे. स्वागत-सत्कार के कराय के इच्छा बहुत बलवती होथे. संतुष्ट करे बर मंच म भीड़ बढ़ा देना उचित नइ कहे जा सके. कई बखत देखे बर मिलथे के मंच भगदड़ मच जथे. गरवा ढीलाय कस होके मनखे भीड़ बन जथे. अइसनो हालत होथे के भीड़ ह न कार्यक्रम आयोजक के कोनो सुने न मंच-संचालक के परवाह करें. एखर ले मंच के अनुशासन भंग होथे.

तुरत-बुद्धि(तात्कालिक-बुद्धि)

पूरा मंचीय कार्यकम पहिली ले तय होय ले सब ल सहूलियत होथे. विशेष परिस्थिति बर गुंजाइश बना केरखे बर परथे. एमा कार्यक्रम घट-बढ शामिल हे. कार्यक्रम के प्रारंभ से लेके अंत तक मंच-संचालक के भूमिका महत्वपूर्ण होथे. मंच संचालन बहुत बड़े कला आय. जइसे बस के ड्रायवर के भूमिका बस संचालन बर होथे वुही भूमिका मंच-संचालक के कार्यक्रम संचालन बर होथे. विशेषज्ञ अउ कुशल वक्ता ल मंच-संचालन के दायित्व संउपना चाही. हुशियार मंच-संचालक फेल होवत कार्यक्रम ल सफल करे के क्षमता रखथे. पूरा कार्यक्रम सुव्यवस्थित, सुगठित अउ आवश्यकतानुसार क्रमश: होना चाही. बिगड़त कार्यक्रम ल मंच-संचालक के तुरत अपन (तात्कालिक) -बुद्धि से सुधारे के क्षमता रखथे.

जादातर मंचीय कार्यक्रम म कार्यक्रम पूर्व म तय होथे. सब बर समय सीमा पहिली ले तय होथे. बड़े-बड़े अकादमिक मंच के कार्यक्रम के गरिमा अनुशासित अउ समय सीमा म बंधाय होथे. जनता से सीधा जुड़े कार्यक्रम म फूल-माला अउ प्रमुख नेता के संबोधन ह मंच के शोभा होथे. कार्यक्रम चलत हुए फिलिम के रील बरोबर अविराम चले से दर्शक, श्रोता मन उपर अच्छा परभाव छोड़थे. कार्यक्रम सफलता-विफलता के अपन-अपन मानदंड होथे.

मंच-संचालक के परभाव
मंच संचालक कोन मंच के संचालन करत हे, कोन परकार के जनता के बीच कोन जगा म कार्यक्रम होवत हे, ओखर उद्देश्य का हे, उनकर बोल-चाल के भाषा का हे येखर उपर धियान देना जरूरी होथे. कार्यक्रम के माध्यम से जो संदेश जनता ल देना चाहत हें वो वुहाँ तक पहुँचत हे के नहीं ? भाषा/बोली से जनता के बीच विचार पहुंचना (संप्रेषण) चाही. हर मंच के अपन विशेषता होथे. हर मंच संचालक के अपन विशेषता होथे. मंच संचालक के भाषा, बोली, बोले के शैली, आवाज में आकर्षण, बानी म संयम, उतार-चढाव, माइक से मंच संचालक के दूरी, माइक व्यवस्था आदि से कार्यक्रम के कुल परभाव रेखांकित होथे. कला-मंच के संचालक ल विषयगत ज्ञान, विनयशीलता और आवश्यकता के अनुसार मंचीय अनुशासन के लिए कठोरता जरूरी है. ये गुन सोना म सुहागा बरोबर होथे. मंच ल कार्यक्रम से बांध के रखे के कौशल, जनता के अभिरूचि के मूल्यांकन करते रहना मंच संचालक बर जरूरी हे.

श्रेष्ठता-चयन

मंच संचालक जनता अउ कार्यक्रम के बीच म मंच ल जोरे बर सेतु बरोबर काम करथे. जब जब मंच श्रोता से अलग होथे कार्यक्रम बिगड़ जथे. मंच संचालक तुरंत एक कड़ी म फेर श्रोता से मंच ल जोरथे. कभू-कभू मंच अलग भागथे. श्रोता के धीरज के बाँध टूट जथे. अव्यवस्था बाढ़ जथे तब मंच संचालक के भूमिका काम करथे. ओखर बानी म अतका आकर्षण होथे के फेर जनता ल जोरे जा सकथे. दस हजार मनखे म कोई एक वक्ता होथे. अउ अनेक वक्ता ल कंट्रोल करे बर एक मंच संचालक होथे. मंच के मजबूती श्रेष्ठता-चयन म होथे. श्रेष्ठता के अभाव म कार्यक्रम खानापूरती बरोबर होथे.

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