छत्तीसगढ़ी में पढ़ें: छत्तीसगढ़ के चटनी जोंन खाय तोंन हाथ चांटत रही जांय 

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  • Last Updated: October 30, 2020, 1:00 AM IST
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त्तीसगढ़ म खान-पान म विविधता हे. इहाँ चटनी संग भात-बासी खाय के परम्परा हे. किसम-किसम के चटनी पिसे अउ खाय जथे. आमा,अमली, लिमउ ,आंवरा, आदा(अदरक), चिरपोटी पताल, जिमींकांदा, लसून, बोइर-भूरका, अमारी-फूल, करोंदा, पदींना पान, कैथ, गाजर, कच्चा हरदी, केंवटकांदा, करेला, मुनगा फूल, केउ-कांदा, ढूलेना-कांदा, नांगर-कांदा, हरियर मिरचा अउ बंगाला  ,हरियर धनिया–लसून के चटनी बनाय जथे.एमा मुख्य रूप से आमा, लिमउ, आंवरा, जिमींकांदा, पताल , हरियर मिरचा, सुक्खा मिरचा, अमारी फूल, करोंदा के चटनी जादा बनथे.

छत्तीसगढ़ के मनखे मन जेवन संग चटनी खाय के बड़ शौक़ीन हें. चटनी जेवन के सुवाद ल बढा देथे. भोजन करे म मजा आथे. आमा फल के राजा आय. आमा के पेड़ म जब बउर(बौर) लगथे तब ओखर खुशबू चारों खुंट बगरथे. महर महर करथे. ये डाहर आमा म बउर लगिस ओ डाहर ओला देख के ओखर महमहाई ल सूघ के मन गदगद हो जथे. आमा छोटे–छोटे हे ओमा चेर नइ बंधाय हे त नूनचरा डार के ओखर संग रोटी ,दार-भात,बासी खाथें. जब आमा म चेर बंधागे, आमा अम्मठ होगे त जानो चटनी /अथान के लइक होगे.

ओखर गोही ल निकाल के कच्चा आमा के फांकी करके, जीरा, नून, मिरचा, डार के सिलबट्टा म पिस के चटनी बनाय-खाय जथे. सइघो आमा ल चार फांकी कर के अथान डारे जथे. हरदी, मिरचा, करायत, राई, संउफ़ के मसाला अउ बाद म सरसों के तेल डारे जथे जरूरत के अनुसार एक आमा के छह–आठ फांकी करके अचार मसाला डार के आमा के अचार बनाय जथे. आमा के रस निकाल के अमरस बनाय जथे. आमा ले अमचूर बनथे जेन अम्मठ बर साग म डारे के काम आथे. आमा ल उसन के ओखर रस निकाले जथे. ए रस म नून, जीरा धनिया मिला के पना बना के पिए जथे जेखर ले लू नइ लगे. इहाँ आमा के गुराम संग सोंहारी खाय के चलन हे.



आंवरा के आयुर्वेद म बड़ महत्ता बताय गे हे. आंवरा त्रिफला बनाय बर काम आथे. आंवरा ल उसन के ओखर गुठली ल निकाल के अचार बनाय जथे. कच्चा आंवरा के गुठली निकाल के नून ,मिर्चा ,हरियर धनिया डार के ओला सिलबट्टा म पिस देव, सुवाद वाले चटनी बन के तियार हो जथे. लिमउ(नीबू) के अचार बड़ सुवाद वाले होथे. एखर रस म जीवन-तत्व होथे. अम्मठ होय के सेती ये ह अम्लीय होथे. कच्चा अउ पक्का अमली के चटनी अलग अलग बनथे. कच्चा अमली म मिरचा,अदरक हरियर धनिया मिलाके सिलबट्टा में पिसे जथे.
पक्का अमली के छिल्टा अउ ओखर बीजा ल निकाल लेथें फेर ओखर गुदा वाले भाग ल पानी भिगो देथें. बाद म ओला निकाल के नून ,गुड़ ,मिरचा ,हरियर धनिया मिला देथे, पिसे ले बढिया चटनी तियार हो जथे. करोंदा के चटनी बनाय बर करोंदा ल कुचर के ओखर बीजा निकाल ले जथे. नून (नमक)मिर्चा, धनिया मिला के पिस दे जथे. चिरपोटी पताल के चटनी खाय के मजा अलगेच होथे. मेंहा लिखे हववं ’’हाय रे मोर चिरपोटी पताल के चटनी /जेंन खांय तेंन खाते रही जांय /जेन नइ खांय तेंन पछताँय/ चिरपोटी पताल तें ह खूब सुहाय.” चिरपोटी पताल के संग अदरक,धनिया मिरचा सिल लोड़हा म पिस के तियार करे जथे.

ये पताल नान नान अउ बहुत सुवाद वाले होथें. जिमींकांदा के चटनी बनाय के पहिली जिमींकांदा ल उसने जथे. घाम देखाय जथे तहां ले अदरक, प्याज, लहसून, हरा धनिया मिला के पिसे जथे. उसने अउ घाम देखाय के बाद जिमींकांदा के साग रांधे जथे. जिमींकांदा के साग ख़ास मौक़ा म अवश्य रांधे जथे.अब कोनो –कोनो जगा इहाँ जिमीकांदा के खेती घला शुरू होगे हे. कच्चा अदरक के घलो चटनी बनथे. येखर चटनी पाचन बर बने होथे. ताजा मूनगा फूल के चटनी बनाय बर ओमा अदरक ,प्याज ,लसून ,मिरचा ,पताल मिला के ओला सिलबट्टा म पिसे जथे अउ चटनी तियार हो जथे.

ये चटनी सुवाद वाले, पाचक, अउ वात हरइया होथे. एखर अलावा करेला, ढूलेना कांदा, डांग-कांदा, केऊ-कांदा, गाजर, केंवट कांदा, अमारी भाजी, बोइर, करौंदा, बंगाला पताल आलू कांदा, अमली के कुरमा, जीरा फूल आदि के चटनी घलो खाय के परम्परा हे. आजकल मिक्सी के जमाना हे त चटनी बर मिक्सी म पिसई हो जथे. माई लोगन मन बर मिक्सी म चटनी पिसई सरल होगे हे फेर सिलबट्टा से चटनी पिसे के मजा अलग होथे
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