छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: हाथ, गोड़ करइया नइये, कइसे करबे रे जीव

पहली गांव मा सम्पन्नता देखे बर मिलय. गौंटिया दाऊ पारा अलगे ले चिन्हाऊ राहय. बड़े - बड़े गोर्रा परसार राहय. नौकर-चाकर चारों मुड़ा झूलत राहय. माल मवेशी के जतन करइया राहय. दूध - दही के कभू कमी नइ रिहिस.

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  • Last Updated: September 23, 2020, 12:17 AM IST
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मय घलोक कहिके नइ आवय. अपने अपन ओखर आना - जाना लगे रइथे. थोरको ऊंच - नीच होइस तहां ले का जमाना आगे केहे बर मनखे मन नइ छोड़ंय. फेर आज काल देखबे त आदमी मेरन समेच नइ राहय. सब अपन - अपन मा मनमाड़े भिड़े हावन कहिके देखाथें. दिखावा के जमाना आगे हे. पास - परोस के देखा सिखी एक दूसर ला अपन ले जादा बड़का नइ बनना चाही सोचथे. आजकल परिवार छोटे होवत जावत हे. समिलहा मिलजुल के रेहे मा बात नइ बनत हे. खेती - बाड़ी बांटा के चक्कर मा परिवार के पुरती नइ होवय , एकरे सेती अपन - अपन ले कांही कुछु करे बर अलगियावत जात हें.

पहली गांव मा सम्पन्नता देखे बर मिलय. गौंटिया दाऊ पारा अलगे ले चिन्हाऊ राहय. बड़े - बड़े गोर्रा परसार राहय. नौकर - चाकर चारों मुड़ा झूलत राहय. माल मवेशी के जतन करइया राहय. दूध - दही के कभू कमी नइ रिहिस. अब बंटत - बंटत पूँजी पसरा उसलत जावत हे. दाऊ मन के सेवा जतन - करइया , तेल फूल लगइया , मालिश करइया लगे राहय. गउटनिन घलोक सुख - सुविधा मा राहय. पौनी , पसारी के सब्बो बुता अपन -  अपन जगा मा मान सम्मान अउ नाम कमावय. बने कमिया कहूं होगे ते का पूछबे सब्बो बेवस्था मा ओला अगुवा बना के राखे जाय.

हाथ गोड़ करइया बड़हर मन  गांव बस्ती मा सालाना पहली ले लगा डारे राहय. खाता - पीता घर के मन घलोक रोजी - पानी के हिसाब मा सेवा जतन करइया राखे राहंय. सधारन परिवार मा सियान - सियनहिन के सेवा जतन करइया नाती नतुरा राहय. बहुरिया घलोक अपन सास के सेवा जतन मा लग जावय. अइसे रहिस संयुक्त परिवार के रहन - सहन. अबके लइका मन ला कहानी किस्सा असन लागथे. पहिली कहिनी के घलोक बहिनी राहय. एक से एक, रंग - रंग के कहानी किस्सा सुने बर मिलय. अब तो समे के साथ - साथ कहानी किस्सा कहइया अउ हुंकारू देवइया खोज - खोज के निकाले ल पर जाही तइसे लागथे.



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आजकल एकठन नवा फेसन आगे हे. सियान - सियनहिन दाई - बाबू मन घर ला गरु लागे लगिन उनखर बर शहर मा वृद्धा आश्रम खुल गेहे. समाज के कुरूप चेहरा ला उजागर करे बर अतके काफी लागथे.

एक आदमी अपन पूरा जिनगी ला परिवार बर समरपित कर देथे. जीयत भर ले खटाथे. सोंच सोंच के दुबरा जाथे फेर राम रमउवा नइ काहय. लांघन भूखन कइसनो रहिके आने वाला पीढ़ी बर सोंचय. रुपिया मा अउ नहीं त चरन्नी बचाए के उदिम मा राहय. बूढ़त काल के थेगहा बर लोक - लइका के सेवा  जतन ले  लेके पढ़ई लिखई के बेवस्था करय. पढ़े लिखे लइका घर के काम बुता मा लग जाथे त चिंता के कोई बात नइ राहय. समस्या तब आथे जब परिवार के कमई कम अउ खरचा जादा हो  जथे. इही चिंता मा घर चलइया दुबरावत रइथे.

अब तो गांव ला छोड़ के शहर डहर काम बुता बर अवइया के बाढ़ आगे हे. काम के राहत ले शहर फेर दिन बुड़ती अपन गांव. बड़का नौकरी अउ जादा पढ़े लिखे मन गांव के महत्व ला नइ जानय. कतको झन जानथे फेर जादा संख्या मा नइये. छोटे परिवार के सोच अउ दुःख दुनो हे. संस्कार बड़का परिवार कका , बड़ा , बबा , बूढ़ी दाई , ममादाई ले मिलथे फेर ये सब जुन्ना बात ए कहिके टाल देथें. एकरे सेती चिंता अउ उपराहा बाढ़ गेहे. अंगरेजी पढ़इया मन ला का पूछबे. गांव जाथें त रुआब मा रइथे. ओमन ला छोटे बड़े मा फरक समझ मा नइ आवय. गांव - गंवई मा गांवभर के आबादी संग रिसता के निरवाह दिखथे. कोनो जात के राहय मितान कहि दे अतके मा पारिवारिक हो जथे.

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दाई , दिदी , लइका , सियान तिहार बार मा सकलाथें त कतका उत्साह रहिथे का बताए जाए. एक - दूसर के सुख दुख मा आना - जाना सरलग लगे रइथे.

अभी चिंता के ए बात के करना हे के रोजी - रोजगार करइया मन अपन लइका ला दाई - बाबू के भरोसा छोड़ के चल देथें. जांगर के चलत ले बिचारा मन कलेचुप अपन कर्तव्य ए कहिके निबाह करथें. जांगर थकिस तहां ले उनखर हाथ गोड़ करइया तिरयाय ला धर ले थे. इही जीव हरय जेन जिनगी भर खटाइस अउ आज सोंच - सोंच के घुरत हे. हाथ गोड़ करइया नइये रे जीव कइसे करबे.
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