छत्तीसगढ़ी में पढ़ें:  लाल बँगला भुँजिया परिवार के एकठन पबरित कुरिया होथय

एक जनजाति हमर छत्तीसगढ़ के उड़ीसा खार ले लगे गरियाबंद,  महासमुंद अउ धमतरी जिला मा बसथें अउ जिनगी बितावत हावे. ये जनजाति ला भुँजिया जनजाति कहिथें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 2, 2020, 1:13 PM IST
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मर देश के हर प्रांत मा अलग अलग जनजाति के रहना बसना होथे. जौन मन अपन अलग अलग रीति रिवाज, रहना बसना अउ जिनगी जीये के तरीका ले देश दुनिया या अपन अलगेच चिन्हार राखथे. एमन आज के दउड़त भागत जिनगी ले दुरिहाय रहिथे अउ अपनेच मा मस्त रहिथें. अइसनेच एक जनजाति हमर छत्तीसगढ़ के उड़ीसा खार ले लगे गरियाबंद,  महासमुंद अउ धमतरी जिला मा बसथें अउ जिनगी बितावत हावे. ये जनजाति ला भुँजिया जनजाति कहिथें. छत्तीसगढ़ सरकार हा एला विशेष पिछड़ी जनजाति के सूची मा राखे हवय.


भुँजिया जनजाति के तीन डार हावय. जेमा चिंडा भुँजिया जौन मन लड़वंता जनजाति हरय. पाछू पाहरो मा चिंडा भुँजिया नाव के  राजा के नवागढ़ मा राज घलो माने गे रहिस जेला प्रतापी राजा देव कचना धुरवा हा हराय रहिस. दूसर हवय चौखुटिया भुँजिया जेला चोकटिया भुँजिया घलो कहे जाथे. तीसर हे खोल्हार भुँजिया. एमन जँगल मा अपन रहे बसे के ठउर बनाथे. अइसे तो ए जनजाति के मनखे मन अपन रहे बसे के कुरिया ला प्रकृति  के जिनिस ला मिंझार के बनाथे. फेर एमा चोकटिया भुँजिया मन रहे के घर मा एक कुरिया बनाथे जेला लाल बंगला कहे जाथे. इही लाल बंगला के नियम धियम के सेती इँखर संस्कृति के चिन्हा अलग दिखथे.


लाल बंगला हा बड़हर मन के बंगला बरोबर बड़का अउ दू मंजिला, तीन मंजिला नइ होवय भलुक ए गरीब भुँजिया के घर के एक कुरिया होथय जौन पेड़ के डारा ला गड़ाके अउ माटी मा छाब के बनाय जाथे. भीतरी बहिरी दूनो पार ला माटी मा छाबे जाथे.खाल्हे भुँइया ला घलो माटी मा छाब के गोबर डार के पोतना मा लीपे जाथे. भीथिया ला छाबे मुँदे के पाछू लाल मुरुम ला घोर के लाल रंग मा पोते जाथे. लाल मुरुम नइ मिलय ता गेरु रंग या पोत के लाल बँगला बनाय जाथे. उपर के छानी हा डारा पाना, काँसी काँदी नइते छींद के डारा पाना मा छवाय रहिथे. एहा इन भुँजिया परिवार के रँधनी कुरिया होथे. इँखर रँधनी कुरिया हा सिरिफ रँधनीच कुरिया नइ होवय भलुक उँखर कुल देवी देवता के रहे के ठउर अउ पूजा कुरिया होथे.


लाल बँगला मा साग भात राँधे के चूल्हा, बरतन, चाँउर दार राखे अउ बइठ के खाय पीये के ठउर होथे. पहिली इहाँ मुसर, जाँता, ढेंकी घलो रहय फेर अब आधुनिक होय ले सब भठत जात हे. लाल बँगला के चूल्हा ला साग भात राँधे के पहिली गोबर पानी मा लीपे जाथे पाछू एमा आगी बार के साग भात राँधे जाथे. चुरे पके के पाछू सबो देवी देवता ला भोग लगाय बर एकठन पाना मा साग भात निकाल के चूल्हा मा डारथें.


लाल बँगला चोकटिया भुँजिया परिवार के पबरित कुरिया होथय. इहाँ चोकटिया भुँजिया परिवार के सदस्य ला छोड़ दूसर मनखे एला छू नइ सकय. फेर इहाँ खुसरना तो बड़ दुरिहा के बात आय. इहाँ चिंडा अउ खोल्हार भुँजिया ला घलो नइ जान देवय, जाय बर मनाही होथे. कोनों दूसर जाति के मनखे इहाँ गलती से नइते जान सुनके घुसर जाथे ता चोकटिया भुँजिया मन अपन लाल बंगला ला आगी लगा के जरा देथे अउ उझार के उहाँ ले बनेच दुरिहा मा दूसर ठउर मा नवा लाल बँगला बनाथे. नवा बनाय पाछू फेर रीति रिवाज ले देवी देवता के इस्थापना करथे.


इहाँ यहू बात जाने के लइक हावे जब चोकटिया भुँजिया परिवार मा नोनी के जनम होथे तब नान्हे पन मा ओखर काँड़ बिहाव कर दे जाथे तभे नोनी हा लाल बँगला मा खाय पीये अउ राँधे गढ़े के जगा पाथे. नोनी के बड़का होय पाछू जब ओखर बिहाव होथे तब ओखर बिदा घलो इही लाल बँगला ले करे जाथे. ओखर बिदा होय पाछू जब वो ससुरार चल देथे अउ पाछू अपन माय मइके के सुरता करके आथे तब ओला लाल बँगला या जाय बर नाइ देवय काबर कि ओहा परगोतरी हो गे रहिथे.


चोकटिया भुँजिया जनजाति आज घलो अपन ये लाल बँगला संस्कृति ला बचा के राखे हवय. नवा पढ़इहा लइका मन कतको शहर मा रहत हवय फेर अपन संस्कृति के संग जुड़े हवय. सरकार चोकटिया भुँजिया  परिवार ला मुख्य धारा मा संघेरेबर अउ  इँखर संस्कृति ला बचाय बर अबड़ेच उदीम करत हे.

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