छत्तीसगढ़ी विशेष: बाँस के जिनिस संग बनाय नत्ता ला छोड़त छत्तीसगढ़िया मनखे

बाँस ला घर मा घलो नइ बोंवय-जगावय. एमा फूल घलो अस तस नइ फूलय. फेर जे बाँस मा फूल फूलथे ता ओखर आखरी दिन होथय अउ ओहा मर जाथे.

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  • Last Updated: October 20, 2020, 9:29 AM IST
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नखे के जिनगी ले प्रकृति के नंगत अकन जिनिस हा जुड़े रहिथे. प्रकृति के जिनिस ला बिन बउरे ओखर जिनगी नइ कटय चाहे वोहा शास्त्र मा बरजे बाँस असन लकड़ी हा घलो होवय. शास्त्र मा कहे हवय कि  बाँस के लकड़ी ला आगी झन बारव, चाहे मरे मनखे के चिता बर घलो होवय. एकरे सेती कतको मनखे मन अगरबती नइ जलावय काबर कि एहा बाँस के काड़ी मा बने रहिथे भलुक दिया बार लेथे. बाँस ला घर मा घलो नइ बोंवय-जगावय. एमा फूल घलो अस तस नइ फूलय. फेर जे बाँस मा फूल फूलथे ता ओखर आखरी दिन होथय अउ ओहा मर जाथे.

बाँस हा अपने पीका फूटथे अउ नवा बाँस बनथे. केंवरी बाँस जेला करील घलो कहिथे एला साग राँध के खाय जाथे. आमा अथान सही एखरो अथान डारे जाथे. बाँस के अइसे तो वैज्ञानिक मन कतको किसम के बताय होहीं फेर छत्तीसगढ़िया मन दूए किसम के मानथे. एक निन्धा दूसरा पोन्डा. पोन्डा बाँस हा बीच ले  फोंगला रहिथे, नल मा पानी आय बरोबर रीता रहिथे. छत्तीसगढ़ मा बाँस अइसे पेड़ आवय जेला मनखे हा अपन जिनगी मा आदिकाल ले बउरत आवत हे. एला घरोधी जिनिस बना के बउरे बर बना लिस.

पूजा पाठ, बर बिहाव मा, घर कुरिया बनाय बर, पटाव पाटेबर बिछाय मा, उपर चघे बर निसेनी बनाय बर चलो बउरथे. फेर नान्हे बड़का जिनिस बनाके अपन काम बूता मा बउरथे. एमा बाहरी, सुपा, सुपली, झउँहा, पउली, बूटी, डोपली, चुरकी, टुकना, टुकनी, डलिया, चंगोरा, पर्रा, पर्री, झाँपी, टट्टा, चोरिया, खुमरी, मोरा, धुकना, चटाई अइसने कतको किसम के जिनिस घर मा बउरथे. बाँस के जिनिस ला आदिवासी वनवासी कंडरा, बँसोर,कमार, भुंजिया अउ जंगल मा रहइया जनजाति के मनखे मन परिवार संग मिलके बनाथे. आजादी के पाछू एला कुटीर उद्योग मा मिंझारे रहिस.



1. बाहरी-बांस के बाहरी जेला कोठार बियारा, अंगना ला बाहरे बर अउ गोबर मा लिपे बर बउरथे. एहा पतली पतली बाँस ला गुँथ के बनाय रथे अउ गोलियाय रथे.
2. सुपा सुपली- सुपा बाँस के एक आँगूर चाकर पतली पतली पट्टी बनाके आड़ी खड़ी गुँथे रथे. एखर चार छोर रथे. तीन छोर मा उँच करके ओखरे छेंका बनाय रथे. एमा चाउँर दार ला फूने अउ निमारे जाथे. धान मिंजे के पाछू ओसाय बर सुपा ला बउरथे. साग पान धरे बर बउरथे. दान पुन करे बर सुपा ला शुभ माने जाथे. सुपली हा एकर नान्हे रूप होथे. रूप रंग सुपा बरोबर होथे. एला पोरा तिहार मा जादा बउरे जाथे.

3. टुकनी टुकना झेंझरी चुरकी -झेंझरी, टुकनी-टुकना, चरिहा हा घलो बाँस मा बने होथे. झेंझरी हा थोकिन नान्हे, ओखर ले बड़े टुकनी अउ ओखर ले बड़े टुकना, चरिहा होथे. एला बाँस के पतली तार बनाके गुथे जाथे. एहा पाँचो डहर ले गोल घेराय होथे अउ उपर हा खुल्ला रहिथे. बीच हा खोधरा होथे. जेमा चाउँर-दार, साग-भाजी, धान-गहूँ धरे जाथे. बेटी के बिहाव होथे तब चरिहा मा धान भरके बोहाय जाथे, जेला चरिहा बोहाना कहे जाथे. एहा काठा के नाप मा बनाय जाथे.  एक कठिया, दू कठिया, पंचकठिया.

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एखर ले बड़े ला डलिया अउ डाला कहे जाथे एहा सुपा बनाय के चाकर पट्टी मा चरिहा बरोबर गुँथाय रथे. एला कुकरी मनके घर बनाय अउ ढाँक के राखे बर घलो बउरे जाथे. डलिया के नान्हे रूप चांगोरा होथे एमा चाउँर, कनकी,दार, राखड़ी, उरीद, गहूँ  धोय जाथे. अइसने टुकनी के सबले नान्हे रुप चुरकी, बूटी, ढोपली कहे जाथे. एला पूजा पाठ मा बउरे जाथे. बिहाव मा साकोचार मा दुल्हिन हा भाँवर घुमे के बेरा लाई धर के नेंग करथे.

4. झँउहा(झौवा)- एहा बाँस के मोट्ठा तार के बने टुकनी असन होथे, फेर एखर उपर डहर हा चाकर अउ खाल्हे डहर हा सुल्लु होथे. एमा माटी, मुरुम, बोह के फेंके जाथे, गोबर, खातू -कचर उठा के फेंके जाथे. कुछु जिनिस ला धर के मुड़ी मा बोहे जाथे. एहा जादा गड्ढा नइ रहय. एला बाँस के चाकर पट्टी वाला घलो बनाय जाथे.

5. पर्रा पर्री- एहा टुकनी अउ झँउहा के मिंझरा रुप होथे. बाँस के पतली तार अउ चाकर पट्टी मिंझरा के गथना मा झँउहा ले जादा चाकर अउ छिछला होथे. एला छत्तीसगढ़ मा बर बिहाव के नेंग मा बउरे जाथे. पाछू बरी सुखाय बर अउ कतको कन बूता मा बउरे जाथे. पर्री ला तोपे ढाँके बर बउरथे.

6. झाँपी- झाँपी हा चंगोरा ले बड़का अउ डलिया ले नान्हे होथे. फेर चंगोरा, डलिया मा ढकना नइ रहय अउ झाँपी मा ढकना रहिथे. बेटी के बिहाव मा बिदा के बेरा एमा गृहस्थी के जिनिस राख के ओखर ससुरार भेजे जावय.

7. बिजना- बिजना घलो बाँस के बने होथे. एकठन बाँस के लकड़ी मा फंसा के घुमाय जाथे. एहा हावा देथे. एला सुपा बरोबर चाकर पट्टी मा गुँथे जाथे. चारो डहर हा डेढ़ बीता के चाकर रहिथे.

8. खुमरी, मोरा - खुमरी हा बाँस के बने चाकर पट्टी मा बने पर्रा बरोबर होथे जेला मुड़ी उपर पहिरे जाय. एहा गरमी अउ बरसात ले बचावय. एला चरवाहा मन जादा पहिरे. मोरा हा मुड़ी ले पीठ ले आघू कनिहा तक लम्बा नाप मा बने रहय. एमा मनखे हा ढँकाय रहय. बनिहार बनिहारिन मन खेत मा दरहा लगाय अउ नींदे के बेरा पहिरे. अब देखेबर नइ मिलय.

9. टट्टा, टटई, चटाई- एहा बाँस के डेढ़ अँगूर चाकर पट्टी ला आड़ी खड़ी गाँथे रथे. टटई ला दू किसम के बउरे जाथे. एक तो ओधा करेबर दूसर पानी के झिपार ला घर भीतर जाय ले छेंके बर. एला अपन घर के नापा देके बनाय जा सकत हे

10. चोरिया- चोरिया हा बाँस के पतला पतला काड़ी के दू हाथ ले आगर नाली असन होथे. एमा मछरी फंसाय जाथे. जेखर आगू मुहड़ा हा चाकर अउ पाछू हा सुल्लु होथे जेमा कपड़ा नइते पानी छंदनी ला जाली, फाँदा बरोबर बाँधे जाथे. चोरिया ला मछरी पकड़े बर बोहित पानी मा धरसा मा टेकाय जाथे. चाकर मुहड़ा ले पानी संग मछरी आथे. पानी हा कपड़ा नइते जाली मा रुक जाथे पानी हा निकलत रहिथे.

छत्तीसगढ़िया के घर मा अइसने किसम के नान्हे बड़े अउ कतको कन जिनिस रहिथे जेन ला तइहा जमाना ले आज घलो गाँव, शहर बउरत आत हे. फेर बाँस के अब नवा नवा जिनिस बनत जात हे. अब टेरा कोटा, हस्त सिल्प के संग मा सोफा, फूल दान, झुलना, कंडील ,फूलदान अउ सजावट के किसम किसम के जिनिस बनाके बेचे जात हे.
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