छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: गरहन धर लिस, दिन दिवारी तिहार ला, घोर कलजुग आगे

सब्बो ग्रह, उपग्रह , पिंड अउ कतको तारामंडल के अपन गति अउ सत्गति घलोक विज्ञानी मन बताए ला धर लेहें. धार्मिक मान्यता अपन जगा अटल हे. मान्यता ला कोनो काही कर लंय चले आवत हे तेन चलहिच.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 30, 2020, 8:49 AM IST
  • Share this:
ब्बो दिन के सेती नोहय तभो ले विज्ञान हा हला के धर दिस दुनिया ला. महामारी घलोक विज्ञान के चमत्कार होगे. बीमारी बोवइया मिटकाए - मिटकाए हांसत हे. बोटर्रा मन के मुंह कान घलोक चुकचुक ले हावय. रावण वध के किस्सा ला सब्बो जानथन. कुंवार के महीना मा नवरात आथे, अउ आखिरी दिन रावण सिरा जावय कहिके वोखर वध करे जाथे. रावण वध करे के दिन सालों साल ले आवत हे. आसों सब्बो डाहर जुगुर जागर हावय फेर मनखे हा मनखे ले थोकुन दुरिहा रेंगत हे. कनचप्पी वाले मन अपन कनचप्पी ला मुंह , नाक कोती लान डारे हें. आज के रावण रोजी - पानी मा घलोक घरो - घर खुसरे के कोसिस मा हावय. डर्राए तहां सपड़ाए मा डर समागेहे अनदेखना बरोबर अकेल्ला झपाए ऊपर झपाए ला धर ले हे. चाल मा कीरा बरोबर रेंगत - रेंगत ढीलत हे. गरहन काल के सेती कतको अंधविश्वास समाज मा आजो अपन जड़ ला बचाके राखे हे. मौसम पाके उबक जाथे. देह पांव मा कांही कमी होगे ततके मा मुंह ले निकल जथे गरहन तीर देहे. अब कोन बतावय राहू - केतु वाला गरहन ला आजकाल मान्यता नइ मिलय. विज्ञानी मन खगोलीय घटना ए कहिके परिक्षण करके बता डरे हें. ग्रह लोक मा अपन अलग चलन जाने गेहे. सब्बो ग्रह, उपग्रह , पिंड अउ कतको तारामंडल के अपन गति अउ सत्गति घलोक विज्ञानी मन बताए ला धर लेहें. धार्मिक मान्यता अपन जगा अटल हे. मान्यता ला कोनो काही कर लंय चले आवत हे तेन चलहिच.

अपन चारो कोती , ऊपर - नीचे झांके - तांके बर कोनो जीव मन नइ छोड़ंय. कई जुग बीत गे , कहां रेहेन , कहां आगेहन अउ कहां जाबो तेखर ठिकाना नइये. फेर एक बात मा सच्चाई हे के ए मिरतु लोक मा कोनो मालिक बनके जनम नइ धरंय. सब्बो जनम लेवइया. मिरतु ला पाथे अउ ए दरी नई ते ओ दरी आने वाला जनम मा जेन ला भोगना हे  तेन भोगहिच. सातो जनम बर अइसे कहिके मान्यता हे. कोनो जगा पुनरजनम ला मान्यता नइये. दुनिया चलथे , चलाने वाला जानथे के ओला चलाना हे. बुद्धि ला सकेले धरे परही. लिखा पढ़ी करके राखे ला परही। पहली तप - जप करत - करत हजारों साल के जिनगी जीयंय अइसन मान्यता सब्बो धरम मा हावय. अभी तें हावस थोकिन देर मा का हो जाही नइ जान सकस. जेला जाने नइ सकस तेला जनवाही कोन इही हरे भगवान के उपस्थिति के आभास. तें अभाव मा जियत हावंव कइथस अभाव ह अभाव नोहय प्रभाव हरय. तोर आए जाए के प्रभाव ला समाज जानथे. देखथे , सुनथे , अनुभो करथे. लौकिक अउ अलौकिक संसार हा कोने साखी गवाही के रद्दा नइ देखय. सब पहिली ले सचे बसे हे. रचे बसे संसार मा संसारी अपन ठऊर खोजय. ठऊर खोज डारे तहांले अउ काय करना कहि के तोला खुदे प्रेरणा मिलही.

नाक अउ मुंह ए दूनो इंद्री आज अपन आगू एक ठन पहरेदार बइठारे बर जोंगत हे. जोंगत - जोंगत महिना बीतत जाथे फेर कोनो - कोनो घेपत नइयें नइ घेपइया के ते का कर लेबे. ललचहा , अपरिद्धा मन सब्बो जनम मा अपनेच चलाइन. हमला नइ होवय हमला का करना हे अइसे कहिके पेले ला धर लेथें. दू चार रुपया के जिनिस कोनो मेरन परे मिलगे तहां टपले बीने के आदत आजो कतको झन मा हाबे.कतको झन तिरिया के रेंग दिही फेर बीनय नहीं काबर के वायरस के डर हावय. जेन पेट भर डर्रागे तेन ला देखले बपुरा चौबीसों घंटा सवचतेत रहिथे. सावचेत रहिबे तभे आजकल बने ढंग ले जिये पाबे. केहे के मतलब साफ हे बचाव के उपाय बिना आज एको दिन चलना मुसकुल हे. मुसकुल दिन मा अपनेच सेती आवय कहिके नियम कानून ला मानना चाही. भइगे आज ले जोहत - जोहत अउ कतका दिन जोहे ला परही ताकि बिन बलाए सगा हा घर भितरी खुसर के अपन राजघराना मा सामिल होए के नेवता दे के झन रेंगा देवय. रेंगतिच होगे हे मानुस चोला ठाढ़े - ठाढ़ सुखावत हे | सब्बो जीव के चित्त भंग होगे हे. केहे के होतिस ते कहि डारतिन. अब ते जान. ओ डाहर देख ले सब्बो अपन - अपन जगा मा कइसे भाव जगावत हें | जल , थल अउ अकास अपन जीयत जागत संदेसा ला आजो देतेच्च हांवय. लहुट के आवव चलव अपन हिसाब ला बने बनावव. घटना बढ़ाना ऊपर वाला के हाथ मा हावय.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज