छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: घुरवा संस्कृति  के चिंतन म बुद्विजिवी

हमर देश ह कचरा  के मामला म आत्मनिर्भर अभी अभी होए हे. ए बात अमेरीका के सर्वेक्षण कंपनी से सामने आए हे.

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  • Last Updated: October 6, 2020, 4:22 PM IST
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लेखक: गिरीश ठक्कर

लोक जीवन म नरवा गरवा घुरवा के चलन ओतराज प्रचलन म हे जतेक समाज म आजकल बुद्विजिवी होना चलन म हे. घुरवा जीवन म पम्परागत रूप से हर द्वारी के तीर म होथे. जेमा कचरा के कूढ़ेना उलेडऩा हमर मानव जीवन के जन्म सिध अधिकार हे. जेन परिवेश म आज मानव संस्कृति जियत हे ओला हम घुरवा संस्कृती ले सुसज्जित रखना हम बुद्विजिवी मन के काम आए. ओखर चिंतन म चित्त लगाना चिंतन करना हम बुद्विजिवी मन के काम आए.

मनखे मन ल वही करना हे जेन नइ करे के उल्लेख ओ ठीकाना म लिखेहे. मान लो देख के टोक देन त कही. का करों, पढ़े नइ हो. त फोटू ले घलो नइ समझ सकस का . त कही अंधरा काना हो गा. का करों. बस म, रेल म कतको ठीकाना म लिखे हे. ऐ मेर थूकना, मूतना मना हे. त कतको बुद्वि जिवी मन ह मना शब्द ल मेट देथे. अऊ वही मेंर पीच्च मारके रंगाली बनाही . अऊ अपन बुद्वि जिवी होए के अमीट छाप छोड़बेच करही. यहॉं पेशाब करना मना हे. वही मेर करना हे. काबर के सुलभ शौचालय हबे, तेन म अंजान मनखे जाइ नइ सके. काबर के वो मंदिर अशन सजे संवरे हे. अऊ ओतेक सोचे बर टाइ्रम तो होना. हाथ म घड़ी हे. देखे के टेम होना.



हमर देश ह कचरा  के मामला म आत्मनिर्भर अभी अभी होए हे. ए बात अमेरीका के सर्वेक्षण क म्पनी से सामने आए हे. अऊ कचरा संस्‍कृति के अचूक भंडार के प्रमाण घलो मिले हे. संस्कृति के कचरा विदेश ले आवत हे जेन ला हम बड़ श्रद्वा से आत्मसात करत हवन.

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एक बुद्वि जिवी के कहना हे . जेखर जतेक जूना इतिहास होथो ओतराज ओखर कचरा के इतिहास होथे. भूतकाल के कचरा ल बोहे बाहे आज तक जियत हे.अपन इतिहास के बखान करत करत अघात नइ हे.आज विज्ञान ले ज्यादा अपन पुरातन म भरोसा हे. देश म गरीबी घलो एक कचरा संस्कृति हे. फेर ओ संस्कृति के अगवानी करत हे. भूख ओखर सगा हे ओखरो आमंन्त्रण स्वीकार करत हे. ए संस्कृति ल देखत देखत देश बूढ़ा गे.

यही ल देख के हमर देश म स्वच्छ भारत मिशन के अभियान चलत हे. पूरा देश कचरा के नाव लेके हलाकान हे. बड़े बड़े अधिकारी नेता झाडू पकड़े पकड़े फोटू खिचावत हे. सेलफी लेवत हे. कचरा नइ हे त कचरा के कूढ़ेना रात के कूढ़ो के बिहनिया म बाहरत हे. गॉंधी जयतीं ल सफाई दिवस के रूप म मनावत हे. हमर देश के दिशा दशा बलत हे. देश म तिरगां के बदले झाडू उठाये म उत्साह दिखावत हे. सिरतोन म तिरगां उठाये रतीस त आज ए बोलेल नइ परतीस के झंडा ऊचॅंा रहे हमरा . हम बुल बुले हैं इस जहॉं के .

कचरा के सफाई बर बड़े बड़े सेलेब्रीटी नियुक्त हे. जेखर घर म हर कोनटा बर अलग अलग बनिहार  हे. शहर हे त स्टेशन के द्वारी म ,गॉंव हे त चौपाल म , कालोनी हे त पड़ोस म कचरा के पोस्टर लगे हे. द्वारी म हरा निला कचरा के डब्बा माड़े हे. पहली हमर पुरखा मन ह दरवाजा म गाय गरू मन बर पानी के कोटना राखे. सूर्य देव बर कलश राखे, अब नवा संस्कृती कचरा के हे. बड़े बड़े महा नगर म ई कचरा के कूढेना के संग म प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कचरा के अम्बार लगे हे . बस्ती म कचरा हे के कचरा म बस्ती हे खोजेल लागत हे.

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हमर कचरा के आत्मनिर्भरता ले पड़ोसी देश के ऑंखी ह मिचमिचावत हे के कचरा के मामला म हमर भारत घलो आत्मनिर्भर होगे. कतको देश मन तो हमला कचरा के संग म निवेश बर पूजीं दे बर तैयार बईठे हे. संग म कतको प्राजेक्ट हे जेखर ले रोजगार के अवशर के समभ्वना हे. आम के आम गुठली के दाम घलो मिले समभ्वाना हे.

लोक जीवन म घुरवा संस्कृति के अतेक प्रभावशाली असर हे के हमर संगीत के सुर म पाँय पाँय , राफ साफ, रेक शेक फेक टेक, रब्बा रब्बा आगे. सारे गा मा पा के सुर कहॉं गे, कहा गंवा गे पताच ननइ परीस. एखर नतीजा आइस के तू चीज बड़ी है मस्त मस्त. नान नान लइका पूछत हे चोली के पिछे क्या हे. मैने सईया जी से ब्रेकप कर लिया.  एक बुद्विजिवी कथे प्राणी मात्र से प्रेम करो. हम करत हवन. पर हम समझ नइ सकत हवन के ए समय म कोन ले प्रेम करन . मनखे ले ,के प्राणी ले.

बुद्वि जिवी के कहना हे अभी भी मनखे मन म प्रत्यक्ष रूप से जातीय सम्प्रदाय के कचरा गंजाय हे. जेन ए कचरा ले ज्यादा प्रदुषण कारी हे. आज हर बुद्वि जिवी यही चिंतन करत हे के . आखिर लोक जिवन म हमर महत्व हे कचरा के महत्व हे.  हर बुद्वि जिवी मुड़ी म हाथ रखे रखे घूमत हे. के हम कामा चिंतन करन. कचरा म के कचरा के संस्कृति म.
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