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छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: काखर गलती, कोन पावत हे सजा?

सरकार हा परभावित किसान, मजदूरअउ, गरीब मन ला राहत राशि दे के योजना बनाय हे फेर एमा पिचकाट अतेक हे ते ओकर नियम कानून ला समझ नइ पावय.

सरकार हा परभावित किसान, मजदूरअउ, गरीब मन ला राहत राशि दे के योजना बनाय हे फेर एमा पिचकाट अतेक हे ते ओकर नियम कानून ला समझ नइ पावय.

जी-परान ले ले के जंगली जानवर अपन जीव ला बचाए खातिर गाँव-गाँव मं धमकथे. किसान मन के फसल के बारा बजावत हे. हाथी, भालू, बेंदरा, तो कोनो गाँव अइसे नइ होही जिहां ओकर मन के डेरा नइ होय होही?

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ब ले जंगल, पहाड़, नदी, नरवा ला सरकार हा उद्योगपति. पूँजीपति अउ बैपारी मन के हाथ मं देके उदीम सुरु करे हे तब ले जंगली जानवर मन के तनानना होय ले धर ले हे. भटकत हे एती ओती चारा पानी के खोज मं. जंगल के रूख-राई कटत हे, पहाड़ मन ला बड़े-बड़े मशीन मन अइसे सत्यानास करत हे जइसे कोनो दारासिंह पहलवान मन मरहा खुरहा मनखे ला राहेर काड़ी बरोबर टोर देथे, मछ्रर या ते माछी असन हाथ मं रमंज के परान ला ले ले थे.

जी-परान ले ले के जंगली जानवर अपन जीव ला बचाए खातिर गाँव-गाँव मं धमकथे. किसान मन के फसल के बारा बजावत हे. हाथी, भालू, बेंदरा, तो कोनो गाँव अइसे नइ होही जिहां ओकर मन के डेरा नइ होय होही? रोवत हे किसान मन माथा धर के, मगन हे बैपारी, उद्योगपति, नेता अउ नौकरशाह मन. खड़े फसल ला रउंदत हे, खात हे, चगलत हे. आधा खात हे, तब आधा बर्बाद करत हे. किसान के कोनो सुनाइया नइ हे? एक घौं आथे चुनाव के बखत, भगवान कस दर्शन देथे, चुन के जाथे तहां ले कहाँ मुड़ मं राख डार के लुका जथे ते कभू देखउन नइ देवय.

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हाथी मन तो आतंकवादी मन कस बनगे हे. फसल ला खेत के बर्बाद करत हे तौंन तो अलग बात हे घर-दुआर ला घला चउपट कर देथे, झिम-झाम देखथे तब मनखे मन ला घला उठा के पटक देथे, पाँव तरी रउन्द के मार डरथे. सैंकड़ो गाँव के अइसने रिपोर्ट मिले हे, फेर ओकर कोनो सुनइया नइ हे.अधिकारी, कर्मचारी ला बताबे तब अनसुना कर देथे, धियान नइ देवय. अब अपन मरे बिगन तो सरग नइ दिखय. नेता मंत्री मन देखउन नइ देवय. हलाहल होगे हे किसान.

नदी, नरवा, पहाड़, जंगल, खदान, पानी सब ला उद्योगपति, पूंजीपति, धन्ना सेठ मन ला बेच दे हे, ओ मन लबालब हो जाही अउ एती मरही किसान गरीब गुरवा मनखे अउ जंगली जानवर. ए सरकार कोन से भला काम करत हे गरीब मन के. अरे गाँव-गाँव दौरा करके देख लय मंतरी संतरी मन के का हालत होगे हे? सब के छानही मं बेन्दरा मन अइसे नाचत कुदत घर दुआर के राही मचावत हे जइसे लंका मं हनुमान जी हा आगी लगा के हाहाकार मचा दे रिहिस हे. काकर गलती हे अउ सजा कोन भुगतत हे. घर ला देखबे ते घर के बारा हाल होवत हे, खेत खार ला देखबे तब ओला ए जानवर मन होरा असन भुंजत हे. अपन आंखी मं घर के बरबादी ला देखत किसान गरीब मजदूर बिन दाई ददा के लइका कस सिसकत हे. कोसत हे सरकार ला अउ अपन जनम ला अबिरथा मानत हे.

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खेत मं धान गहूं, चना, मसरी, राहेर, आरसी सबो जिनीस बोय हे किसान मन फेर ये जंगल के जानवर मन चोर चंडाल अउ डकैत मन कस धमकगे हे. फसल ला रउंदत हे, आधा खात हे तब आधा ला फेकत हे. पहली तो खबर आवत रिहिस हे के ए मन घास ला चरत रिहिन हे अब तो किसान के मूल फसल धान गंहू, चना ला मुहँ मारे ले धर ले हे, बरबाद करत हे. खबर मिले हे छत्तीसगढ़ के जसपुर छेत्र मं ये हाथी मन धान ला जादा बरबाद करत हे. रायगढ़, महासमुंद, रतनपूर, धमतरी कोती एकर मन फौज पहुचगे हे. एला देख के  जनता मन ला कोन काहय अधिकारी करमचारी मन के घला हाथ-पाँव फुले ले धर ले हे. ओमन ला देख के हाथ मं हाथ धर के बइठ जाथे. आखिर करय तो करय का? सब ले ज्यादा नुकसान फसल ला ए हाथी, बेन्दरा मन पहुँचावत हे, अउ अब तो भयानक रूप ले ले हे.

सरकार हा परभावित किसान, मजदूरअउ, गरीब मन ला राहत राशि दे के योजना बनाय हे फेर एमा पिचकाट अतेक हे ते ओकर नियम कानून ला समझ नइ पावय. राहत राशि मिलना नइ मिलना एक बरोबर हो जथे.  कुल मिला के किसान मन के मरे बिहान हे. (यह लेख लेखक के निजी विचार हैं)

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