छत्‍तीसगढ़ी विशेष: खबरीलाल के आँखी–आँखी म दिखिस सुख-दुख के बुलबुला

कभू कभू लगथे के ये खबरीलाल कहूं महाभारतकाल के संजय तो नोहे जेन घेरी बेरी  जनम लेवत-लेवत कोरोनाकाल के आवत-आवत सियनहा लगत हे, तभो ले जनता सेवा करत हे.

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  • Last Updated: October 20, 2020, 10:58 PM IST
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बरीलाल के आँखी महाभारत के संजय बरोबर नइ हे. न लोकतंत्र के राजा मन धृतराष्ट्र आंय. संजय ल महर्षि वेदव्यास दिव्य दृष्टि दे रिहिस. महाभारत-जुद्ध के आँखन देखी हाल संजय राजा धृतराष्ट्र ल सुनाइस. बिलकुल आज के टीवी बरोबर. सबे जानत हें धृतराष्ट्र अंधरा रिहिस फेर कान ले सुने. राजा धृतराष्ट्र जुद्ध के हाल-चाल पूछे त झट संजय के आँखी कैमरा बरोबर घुमें अउ बता दे के दुर्योधन समेत ओखर पक्ष के योद्धा मन कते पाँडव योद्धा संग लड़त हे. कोन-कोन रथी, महारथी मन कोन –कोन अस्त्र–शस्त्र के परयोग करत हे. ओखर परिणाम का होवत हे? संजय, धृतराष्ट्र के आँखी बनके दिन–रात आँन लाईन राहे. जुद्ध के समे जुद्ध के लाइव टेलीकास्ट करे. कोनो तकनीकी गडबडी के प्रश्ने नइ रिहिस.कभू कभू लगथे के ये खबरीलाल कहूं महाभारतकाल के संजय तो नोहे जेन घेरी बेरी  जनम लेवत-लेवत कोरोनाकाल के आवत-आवत सियनहा लगत हे, तभो ले जनता सेवा करत हे.जेन भ्रष्ट हें , अहसान फरामोस हें, ते मन ल छरे बर नइ छोड़े. खबरीलाल जनता–जनार्दन के मन ल तउलत हे.हमर देश-प्रदेश म लोगन के मन के उतार चढाव के ऑन लाइन ग्राफ बनात हे.

खबरीलाल के दिमाग बरोबर आँन लाइन चलत रहिथे.जानो-मानो लाइव टेलीकास्ट के तियारी होय. जइसे देखतथे व्इसने गोठियाथे. लालबुझक्कड़ ल खबरीलाल किहिस-‘पहिली लोग बाग़ एक हाथ म लड्डू पा के खुश हो जांय. कहे जाथे के समे बदलगे , समे नहीं आदमी बदलगे. अब दुनों हाथ म लड्डू होना. पर भरोसा, तीन परोसा, खव्इया मन चाहथें के एमा फायदा अउ, ओमा फायदा, चारों खुट फायदा, होय हर हाल म फायदाच फायदा होना. छोटे ल लेके बड़े मनखेतक  के इही हाल हे. अउ सब रेस म हें.’ लालबुझक्कड़ किहिस- ‘पहिली लोग बाग़ हानि लाभ के फेर म नइ पड़ें. सिरफ़ करम करें. अब कमइया ल त छोड़ दे ठेलहा बसंत घलो दुनों हाथ म लड्डू चाहथें. ’गोबरदास किहिस–‘फ्री फंड के जमाना म इही ह सही सोच आय. ’खबरीलाल किहिस-‘अधिकतर मन चाहतें के बिन बुता पइसा मिलत राहय.चकाचक अंजोर होय फेर बिजली बिल फ्री हो, फ्री नहीं त हाफ हो. हाफ माफ़ हो. चाउर फ्री मिले, फ्री नहीं त रूपिया, दुरूपिया म मिले.किसान ल बोनस मिले. धान के समर्थन मूल्य म खरीदी होय ,फेर हमर से सरकार कुछ उम्मीद झन करे.’

लालबुझक्कड़ किहिस- ‘जनता त जनता होथे, जइसे नेता, वइसे नेता होथे. जब तक सत्ता तब तक हाथ म ट्रंप के पत्ता. गोबर ले सोना बनवा ले, चाहे सोना ल गोबर कर दे. गद्दी म बइठे के बाद सदबुद्धि अपने–अपन आ जथे. चारों खुंट चांटी सकला के शक्कर खाना चालू कर देथें.’ गोबरदास किहिस– ‘मुरहा पोटरा मन घलो उंच सपना म बुडे रहिथें. घर के कचरा ल दुसर के दुआरी म फेंकइया मन साफ़–सफई के वकालत करथें. एक ठन पौधा लगाये बर गतर नइ चले. फेर पूरा दुनिया के पर्यावरण के चिंता म दुबरावत रहिथें. अइसन मन कथें परदूसन बहुत बाढ़गे. हम ल साफ़ हवा चाही सरकार जी. हवा, पानी, माटी, विचार आदि सब परकार के परदूसन’ बढ़व्इया’ मन समे कुसमे कांव–काव् करके आदर्श के ढोल पिटत रहिथें.’ खबरीलाल किहिस- ‘का बताबे भइया, चलनी ह सुपा ल छेदा देखावत हे. भ्रष्टाचार देश म नरी दबावत हे. सदाचारी ते सदाचारी भ्रष्टाचारी घलो भ्रष्टाचार के खिलाफ बोले म कमी नइ करें. भ्रष्टाचार ल आँखी म देख के घलो आँखी ल मुंद लेथें. ओखर शिकायत नइ करना हे. फेर देश ल भ्रष्टाचार मुक्त करना हे. ये बुता के पूरा ठेका सरकार के हवे. कार्रवाई तुरंत चाही.

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नागरिक इही सोचत – सोचत बूढा जथें. ’बुद्धजीवी किसम के मनखे मन त सब ल अपन बुध के खीर खवावत रहिथें. बात बात म अपन हथेली म दही जमाय के जादू देखावत रहिथें.’ लालबुझक्कड़ किहिस- ‘बुता करे बिन गियान  बघरैया मन के का कमी हे? बुता करे बिन सब सुविधा भोगी मन ल महिना ख़तम होते साठ पगार चाही. बुता करइया हर जगा घिसावत रहिथें. तभो ले फोकट चंद मन गपियाय के तनखा लेथें. बाते बात म जरत भून्जावत रहिथें.’ ’खबरीलाल किहिस-‘ धरम के रसगुल्ला खवइया मन के का कमी हे. धरम के दूकान चलते राहय. देश धरम निरपेक्षता के चोला धारण करे राहय. धरम के नाम ले के उलटा –सीधा सब जायज हे. जात-पांत के खेल वोट गेम आय. अपराध ल अपन गोदी म खेलाव.अउ अपराध मुक्त देश के गाना गाव. इहाँ सब चलही. देश के संग गद्दारी करइया मन फूलत–फरत हें. देश सब ल झेले !! छ्त्तीसगढी म कहावत हे –करनी दिखे मरनी के बेरा.’ ’गोबरदास किहिस–‘अइसन मन के संख्या घलो बढत हे, जेखर सरकार ल टैक्स देना बनथे अउ फूटी कउड़ी नइ देंय. इन फुटानी मारे बर आघू रहिथें. बात बात म हिसाब लेय के हल्ला जादा करथें.




हमर नेता मन के त हाल ‘बाप खाय घी रोटी, बेटा ल काहय सूंघ ले’ कस हे.’ लालबुझक्कड़ किहिस-‘जइसे देश,तइसे भेष ‘आजकल नेता मन बरदी कस लागथें. जे डाहर जाथें ते डाहर धुर्रा उड़ाथें. बात बात म अइसे हाँकथें के लागथे जानो –मानो सतजुग आगे.’ खबरीलाल किहिस- ‘विकास कठल के रोवत हे. कोरोना ओखर हाल बेहाल कर दिस.कोरोना ल पोसइया मन सरकार कतको चेताय ओला ठेंगा देखाय म सुख पावत हें. कोरोना ह कोरोना उछरत हे. सरकार चेताय उपर चेतावत हे के मास्क लगाव, सामाजिक दूरी के पालन करो, साबुन ले बार बार हाथ धोवव फेर अभी घलो एक बड़े आबादी ओखर परवाह नइ करत हे. ये जनता महान हे.’ लालबुझक्कड़ किहिस-‘कबीरदासजी के हे रिहिस-सूरा के मैदान में ,कायर का क्या काम /कायर भागे पीठ दे ,सूरा करे संग्राम.’ एक युद्ध ,कोरोना के विरूद्ध ‘कार्यक्रम जनता अउ प्रशासन शुरू करे हें.जोन जागत हें अउ सुते के नाटक करत हें उन ल जगाना सरल नइ हे.’ गोबरदास किहिस–‘कतको झन सरकारी लोंन के दीवाना हें.सरकारी लोन ले बिना सादा जेवन म मजा नइ आय. लोंन लेव मजा करो. पटाय के चिंता करे के जरूवत का हे? फेर चुनाव आही ,फेर लोन माफ़ होही. जेला सरकार चाही तेंन लोंन माफ़ करबे करही. देश म गरीबी नइ मर सके.गरीबी मारना घलो कोन चाहथे? गरीबी जिंदाबाद, कुरसी जिंदाबाद. तीनों मितान मउसम देख के घर लहुटिन.
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