छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: खैरागढ़ रियासत के संगीत परेमी बेटी राजकुमारी इंदिरा

ये इंदिरा हा खैरागढ़ रियासत के नरेश राजा वीरेंद्र सिह अउ रानी पदमावती देवी के बेटी हे. जब ओखर इंतकाल होइस तब उही सुरता मं नावं ला अजर अमर रखे खातिर अपन राज महल ‘‘कमल विलास महल‘‘ ला दान कर दीस.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 8, 2020, 6:13 PM IST
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खैरागढ़ ला बस मं कहॅु जात रहेंव, छोटे उमर मं तभे के एके घौं देखे हौं, ओकर बाद उहां जाय के मौका अभी तक नइ लगे हे, एला मैं अपन दुरभाग मानथौं. अइसे नौकरी मं नथागे रेहेंव धानी के बइला कस ते देश दुनिया ला कोन काहय अपने परांत ला नइ गिंजर पायेंव, देखे परखे नइ पायेंव के मोर छत्तीसगढ़ कइसना हे? संगवारी मन बहुत नवे ता देवय, बलावयं. काहयं-रहे-बसे, खाये-पीये अउ खरचा के चिंता झन कर, सब के व्यवस्था कर देबो. जइसना सुख सुविधा चाही सब मिल जाही, फेर भाग मं लिखे राहय तब ना. बस टेटका के पहिचान बारी तक से मोर गिया, समझ अउ जानकारी, सीमित रहिगे, कोनो ला दोस देना ठीक नइ हे. मैं तो रहिगेंव ‘घरखुसरा‘ चिरईकस, फेर मोर बेटा सात समुंदर पार करके देशों देश ला गिंजर आय हे, ओतके मं मैं खुश हौं, कुलकत रहिथौ ये राजा बेटा के भाग ला सहरावत रहिथौं.

बात ला देख, खैरागढ़ ले निकलिस तब कहां लोर मियावत कोन डाहर बुलकगे. बात अइसन हे, आज मोर हाथ मं एक ठन गुजर मं लग गे. ओमा खैरागढ़ के इतिहास, राजपरिवार, संगीत विश्‍वविद्यालय के जानकारी के छोटे अउ बहुत अमन बात रिहिसे. पढे़व, त समा लगा के बने नक मं चढ़ा के एक-एक असर ला पढ़ेंव. मोर परांत के एक ठन शहर के सुग्घर जाने के लाइक बात रिहिसे. इतिहास भले मोर विशय नइ रिहिसे हे,फेर ओमा रूचि रिहिसे, अइसन गियान के बात जिहां मिलय या आजो जौन मेर मिल जाथे ओला पढ़थौं, बिसा (खरीद) के घला ले आथौं कंजूसी नइ करौं. एती-ओती के बात, बताया के पहिली इही बात शुरू करथौं के खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के ओ शान-ओ-शाकै त वाले शहर के नांव ले आज तक जाने जाथे देश-विदेश मं, जिहां गीत-संगीत के बड़े-बड़े महारथी, धुरंधर अउ संगीतज्ञ पहुंचथे अउ गीत संगीत, नृत्य के सुरताल के महारास रचावथे.

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खैरागढ़, भगवान श्री कृष्‍ण के वृंदावन बनगे हे इहां छोकरी अउ छोकरा संतीत सीखत हे, पढ़त हे, गावत, बजावत अउ नाचत हे, है ना वृंदावन-मथुरा ले बढ़के खैरागढ़ के पावन भूमि. तभे तो सब कहिथे-छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया. का जिनिस नइ हे इहां. सोना, चांदी हीरा पन्ना लोहा, तांबा, मैगनीज सबो के खदान भरे परे हे, एकर छोड़े नदी, नरवा, पहाड़, बड़े बड़े जलाशय, झील पर्यटक स्थल अइसन प्राकृतिक संपदा ले भरपूर हमार छत्तीसगढ़ लाखो मं एक हे. ये वो खैरागढ़ हे जिहां एशिया महाद्विप के पहिली अइसन इकलौता कला अउ संगीत ला समरपित इंदिरा कला अउ संगीत विश्‍वविद्यालय हे. इहां प्रमुख रूप से कई पारपंरिक संगीत, अउ नृत्य कला के संगे-संग शोध कार्य के सुविधा घला दे जाथे.
वो विशय हे-संगीत, शास्त्रीय वाघ संगीत सितार वायलिन, सरादे, तबला, कर्नाटक वीणा, भारतीय लोक नृत्य कला अउ लोक संगीत कला, पारपंरिक मूर्तिकला, चित्रकला, आधुनिक मूर्तिकला अउ चित्रकला के इतिहास पर अध्ययन अउ शोध कार्य करके सुविधा हे. एकर छोड़े अउ दूसर विशय मं तबला, पखावच मृदंग, हिंदुस्तानी ख्याल, द्रुपद ठुमरी अउ दादरा के  शिक्षा दे जाथे. लोक वाद्य यंत्रो से सुसज्ज्ति गैलरी ये विश्‍वविद्यालय के आकर्षण के केंद्र हे. कतेक महिम के बखान करौं ये विश्‍वविद्यालय के, जेन ला आज तक देख नइ पाये हौं. ये विश्‍वविद्यालय के संग इंदिरा के नांव कइसे जुड़िस एकरो एक अलग अउ अजब कहानी हे. देश आजाद हौइस, एकर पहिली खैरागढ़ एक रियासत रिहिसे. जिहां राजा वीरेंद्र सिंह अउ रानी पदमावती रियासत के नरेश रहिसे. ओकर बेटी रिहिसे राजकुमारी इंदिरा. ओकर संगीत से लगाव रिहिसे.

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जब ओहर गुजरगे तब ओकर सुरता सदा बने राहय इही सोच के राजा वीरेंद्र सिंह अपन राजमहल कमल  विलास महल संगीत विश्‍वविद्यालय बनाय खातिर दान मं दे दीस. इंदिरा कला अउ संगीत विश्‍वविद्यालय बनाय खातिर दान मं दे दीस. इंदिरा कला व गीत विश्‍वविद्यालय 1944 मं गीत महाविद्यालय के रूप मं बनिस! एला विश्‍वविद्यालय के दरजा 1956 मं मिलिस. धन्य भाग छत्तीसगढ़ के, जिहां अइसन जग परसिद्ध इंदिरा कला अउ संगीत विश्‍वविद्यालय हे. अउ ओकर ले जादा खुषी ये बात के हे के इंहे ले नृत्य, कला व संगीत के डिगरी ले के निकले पदमश्री से सम्मानित डॉ. श्रीमती ममता चंद्राकर, जौंन छत्तीसगढ़ के गौरव हे, ओहर इही साल ये विश्‍वविद्यालय के कुलपति नियुक्त होइसे. ओकर कुलपति बने ल खैरागढ़ ला कोन काहय पूरा छत्तीगसढ़ महर-महर ममहावत हे, चारो मुड़ा सुर ताल अउ नृत्य के ओ गीत तोर मन कइसे लागे राजा महल भीतरी मं तोर मन कइसे लागे.
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