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छत्तीसगढ़ी में पढ़िए- अड़बड़ सुग्‍घर लागथे छत्तीसगढ़ी भाखा के मुहावरा, कहावत अऊ लोकोक्ति

छत्तीसगढ़ी में मुआवरे.
छत्तीसगढ़ी में मुआवरे.

छत्तीसगढ़ी के व्याकरण हिन्दी के व्याकरण ले पहिलीच प्रकाशित हो गए रहिस. एखर बाद सन् 1969 म डॉ.दयाशंकर शुक्ल के शोध ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य के अध्ययन’प्रकाशित होइस जेमां करीबन 357 कहावत मन के संग्रह प्रकाशित हे.

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लोक भाषा मन म मुहावरा अऊ कहावत सुने म अड़बड़ सुग्‍घर लागथे. एखर से भाखा म रोचकता बने रहिथे अऊ गोठ-बात म मधुरता के आभास होत रथे. एमां जउन संदेश होथे वो ह लोक शिक्षण के होथे अऊ एकर उद्देश्य एक सभ्य समाज के स्थापना करना होथे. लोक के ये उक्ति मन ये प्रकार के होथे के एक गवंई अनपढ़ मनखे ह पढ़ेलिखे विद्वान ल घलोक तर्क ले हतप्रभ कर देथे. ये मन छोटिक, गहिर अऊ प्रमाण रहित होथे. छत्तीसगढ़ी म घलोक अइसनहे कई रोचक मुहावरा, कहावत अऊ लोकोक्ति हावय जऊन अब विलुप्ति के कगार म हे. अब गांव म अइसे कमती सियान बांचे हें जऊन एकर उपयोग बेरा-कुबेरा करत रथें.

इंटरनेट के ये युग म अपन भाखा, संस्कृति अऊ परंपरा मन ले मया करइया मन, खासकर सोशल मीडिया म अक्सर ये कहत रहिथें के छत्तीसगढ़ी मुहावरा, कहावत अऊ लोकोक्ति मन ल सकेले जाना चाही. उंखर चिंता जायज हे, भाखा ले विलुप्त होत ए महत्वपूर्ण अवयव मन के संकलन जरूरी हे. हम आप मन ल बता देवन के अपन अस्मिता के चिंता करत कुछ अइसनहे मनखे मन ह ये काम ल बेरा-बेरा म करे हें. छत्तीसगढ़ी के मुहावरा, कहावत अऊ लोकोक्ति मन ल सकेल के प्रकाशित करे के सुरूवाती काम हीरालाल काव्योपाध्याय ह अपन किताब ‘छत्तीसगढ़ी बोली के व्याकरण’ म करे हें.

हिन्दी के व्याकरण ले पहिलीच प्रकाशित हो गए
इहां हम ये बता देवन के छत्तीसगढ़ी के ये व्याकरण हिन्दी के व्याकरण ले पहिलीच प्रकाशित हो गए रहिस. एखर बाद सन् 1969 म डॉ.दयाशंकर शुक्ल के शोध ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य के अध्ययन’प्रकाशित होइस जेमां करीबन 357 कहावत मन के संग्रह प्रकाशित हे. सन् 1976 म डॉ. चंद्रबली मिश्रा के शोध ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी मुहावरे और कहावतों का सांस्कृतिक अनुशीलन’म इंकर विवेचनात्मक विश्लेषण करे गए हे. ये विसय म सबले महत्वपूर्ण शोध ग्रंथ 'छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन' सन् 1979 म पुस्तकाकार रूप म प्रकाशित होए रहिस. ये ग्रंथ म 940 लोकोक्ति मन के संग्रह अऊ शोध डॉ. मन्नूलाल यदु ह प्रस्तुत करे रहिन.
छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन


बाद म आन विद्वान मन एकर संग्रहण के काम करिन अऊ शोध घलोक करिन जेमां  डॉ.अनसूया अग्रवाल के नाम प्रमुख हे, इमन सन् 1990 म अपन  शोध ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन’ म न केवल मुहावरा, कहावत अऊ लोकोक्ति मन के संग्रहण करे हें. भलुक ए मन ल इंकर प्रचलित भौगोलिक क्षेत्र के मुताबिक विश्लेषित करे हें. बाद म डॉ.अनसूया अग्रवाल ह इही विसय म डीलिट घलोक करिन जेखर शोध ग्रंथ घलोक प्रकाशित हे. ये बीच अड़बड़ अकन छोटे-बड़े संग्रह प्रकाशित होइस जेमां मंगल रवीन्‍द के छत्‍तीसगढ़ी व्‍याकरण तको हे, एमा ले  सन् 2008 म प्रकाशित चंद्रकुमार चंद्राकर के किताब ‘छत्तीसगढ़ी मुहावरा कोश’जादा उल्लेखनीय हे जऊन ल वृहद कोश माने जा सकत हे, जेमां छत्तीसगढ़ी म प्रचलित करीबन सबो मुहावरा, कहावत अऊ लोकोक्ति संग्रहित हे.

छत्तीसगढ़ी मुहावरा, कहावत अऊ लोकोक्ति           
छत्तीसगढ़ी म एक मुहावरा हे ‘मन मसकई’ मने मने मन म अकारण गुस्‍सा करना. एखर से मिलता जुलता एक कहावत हे ‘हपटे बन के पथरा, फोरे घर के सील’ मने आन कारण ले आन उपर गुस्‍सा उतारना. जादा बोले या अपनेच झाड़ते रहे उपर छत्तीसगढ़ी मुहावरा हे ‘पवारा ढि़लई’, इही म विस्तारवादी कहावत हे ‘बईठन दे त पीसन दे’ जऊन हिन्दी के अंगुली पकड़ कर गर्दन पकड़ना के समानार्थी हे. लालच ल प्रदर्शित करे बर मुहावरा हे ‘लार टपकई’ अऊ ‘जीभ लपलपई’, एकरे से मिलता जुलता एक कहावत हे ‘बांध लीस झोरी, त के बाम्हन के कोरी’ मने यात्रा म बाहिर निकले म भोजन करे के संबंध म हे फेर ये लालच बर घलोक उपयोग होथे. निर्लज्जता ल प्रदर्शित करे बर मुहावरा हे ‘मुड़ उघरई’, एखर से संबंधित कहावत हे ‘रंडी के कुला मं रूख जागे, कहै भला छंइहा होही’ मने वेश्या कब काकर भला करथे, काला छांव देथे. आदत ले संबंधित मुहावरा हे ‘आदत ले लाचार होवई’, इही ले संबंधित कहावत हे ‘जात सुभाव छूटे नइ, टांग उठा के मूते’ अऊ ‘रानी के बानी अउ चेरिया के सुभाव नई छूटे’अऊ ‘बेंदरा जब गिरही डारा चघ के’.

मन के बात मने मं रहई
अइसनहे अव्यक्त मजबूरी बर मुहावरा हे ‘मन के बात मने मं रहई’, एकरे ले संबंधित कहावत हे ‘चोर के डउकी रो नइ सकय’. बेइमानी उपर मुहावरा हे ‘नमक हरामी करई’ अऊ ‘दोगलई करई’, ये कर उपर  कहावत हे ‘जेन पतरी मं खाए उही मं छेदा करय’. संदिग्ध आचरण ले संबंधित मुहावरा हे ‘पेट मं दांत होवई’, एखर ले संबंधित कहावत हे ‘उप्पर मं राम राम भितरी मं कसई’. ये मुह म राम बगल म छूरी के समानार्थी हे. जऊन मिल ना पाए ओखर आलोचना करे संबंधी हिन्दी के जइसे छत्तीसगढ़ी म घलोक मुहावरा हे ‘अंगूर खट्टा होवई’, एखर ले संबंधित कहावत हे‘जरय वो सोन जेमा कान टूटय’ मने मोला वो सोन के बाली नइ चाही जेखर से कान टूठ जाथे.

आगी खाही ते अंगहरा हागही
अत्याचार करे के संबंध म मुहावरा हे ‘आगी मुतई’,एखर ले संबंधित कहावत मन म ‘डहर मं हागे अउ आंखी गुरेड़े’, ‘आगी खाही ते अंगहरा हागही’, ‘पानी मं हगही त ऊलबे करही’ हे। अनुवांशिकता ले संबंधित मुहावरा हे ‘बांस के जरी, बांसेच होही’ अऊ ‘तिली ले तेल निकलई’, एखर से संबंधित कहावत हे, ‘गाय गुन बछरू, पिता गुन घोड़ा, अड़बड़ नइ तो थोड़ा थोड़ा’, ‘जेन बांस के बांस बंसुरी उही बांस के चरिहा टुकनी’, ‘जइसे दाई वइसे चिरा, जइसे ककरी वइसे खीरा’ तको एकर बर उपयोग होथे.

(लेखक छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यकार व वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)
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