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    छत्तीसगढ़ी में पढ़ें: चिंतन-पहाड़ असन जिनगी परे हे, कइसे होही किथों

    होनी ला काय होगे, अइसे कहिके दुरिहाय के नोहय. कतको परछो लेवइया इहां आके अपने आप मा मगन होवत होंही, काबर के तें बइठे ठाल्हे कतका दिन ले चालबे.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 27, 2020, 12:39 AM IST
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    हाथ गोड़ ला सकेल के बइठे रहिबो त कइसे निभाव होही. दू चार दिन के लरे परे मा देख घलोक डरे होहू कइसे किलिर कहया करे ला धर लेथे परिवारिक मन. आंसो , पऊर , परिहार अइसे कहिके तिखारत - तिखारत चलना परही तब कहूं थोकन सांस चल पाही. सब्बो दिन के सेती एके दिन के कमाई कखरो नइ राहय. पेट बिकाली ताय रोजे कुंवा कोड़ रोजे पानी पी दिन भर ला जोहत रहिबे , घाम ला मुड़ ऊपर चढ़ जथे. फेर ढरकती घाम कइसे जियानत रिहिस कहिके सुरता ला ओदिन लमावत रेहे. सुरता लमाए मा कांही नइ होवय. उवत - बुड़त के सेती ताय ए जिनगी के फेरा हा जान डार. जानबा होए के सेती कतको दुःख ला आदमीमन ताप डारथें. होनी ला काय होगे , अइसे कहिके दुरिहाय के नोहय. कतको परछो लेवइया इहां आके अपने आप मा मगन होवत होंही , काबर के तें बइठे ठाल्हे कतका दिन ले चालबे. तोर चाल ला एक दिन जम्मो झन जान डारहीं, तेन दिन के का सोंच ले.


     आज काल, आज काल काहत - काहत ओ काल कभू आबेच नइ करय. आजेच के भरोसा हे. आजे जतका झेल ला सेहे बर हे सहि ले. काली जुवार फेर ओइसनेहे कर. कतको परानी इहां हांवय सब्बो के अपन - अपन संसो हे, पीरा हे, सुख हे, दुःख हे. सब्बो के पालनहार एकेच्च होही तेला तहूं जान डारबे अउ महू जान डारहूँ. पइसा कउड़ी काए व्यवहार करेके साधन, व्यवहार ला बनाके राखना हे त जांगर चलाए ला परही. जांगर के भरोसा आज देखले कहां ले कहां हमन आवत - जावत रइथन अउ खटावत रइथन. कमाई - धमाई नइ चलथे कहिके कभू रिस नइ करना चाही. रिसहा मनखे ला कोनो नइ भावंय. रिस करके तें काएच कर लेबे , दू कंवरा उपरहा खाले अइसे कहिथें जान थस के नाहीं. मन ला देख चौबीस घंटा भागत रहिथे. भागतेच हे , भागतेच हे फेर कतका भाग डारही कोन जानी.


    रचना रचइया अइसे रचना रचे हे के तिल भर ओखर बिना कांही डोले नइ सकय. सब्बो कोती , चारों मुड़ा हरियर डारा ला डोलावत पवन घलोक डोलत होही फेर आज ले कोनो देखे नइ पाइस. पियास ला घलोक देख ले जीव तालाबेली करेबर धर लेथे. अउ भूख काहत हे काला खांव , काला बचांव. ए लंग ले ओ लंग कइसनो करके दिन ला पहाने वाला मन ला आज के दिन गुनना चाही. चटक चांदनी काखर सेती हावय। सुख के छांव मा कइसे बासी - पेज हा सुहाथे। प्रकृति के सब्बो जिनिस ला बने कटार - कटार के भेजे हे, तभे तो आस अउ सांस दुनो के मितानी हे. जेखर चलती हे तेखरे पुछारी होथे. जात, पात के सेती कोनो मेरन नियाव करइया मा भेद हमन कभू नइ जानेन न सुनेन. भगवान जेला नेंग के भेजे तेन अपन गुण के कारण पहिचाने जा सकत हे.


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    कतका दिन ले जीबो ए बात ला छोड़ कइसे जीबो एला अपन आगू मा राख. चलन जेन कोती लेगही चलेच ला परही. आज कतको अइसे जोखा मड़ाने वाला उपजे हें के तें थोरको ऊंखर चाल में फंसे के नकसान तुरते गिना जाही. एकरे सेती जानसुन के दुनियादारी ला समझके अपन आदत व्यवहार मा सुधार करबो तभे जिनगी चलही. जिनगी ला गढ़ाए बर सब्बो परानी अउ परयावरन के रक्षक बनके, आने वाला समय मा हमर समाज ला सकेलत ओसनेच चलना पड़ही. पहाती सुकवा के अंजोर नवा सुरूज के संदेसा लानथे तभे दिन - रात पहाथे. पहाती के बेरा दुनिया भर के जीव - जंतु मन मा नवा उत्साह घलोक जागथे. सब्बो जगा नवा साफ चरई , पेरई चलत ले कतको बुता ला सकेलत बेरा चंद जथे बेरा हा के चढ़ती जीवन के अधार हे.

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