छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: कौआ परसाद के राजनीति- सरग ले गिरे मोंगरा के घांव

लालबुझक्कड़ आघू किहिस- ‘कौआ परसाद के कद अपने अपन बाढ़ीस. खूब उंच होगे. अतेक उंच के जनता के आँखी म दिखबे नइ करिस. जब दिल्ली ले लहूटिस तब ‘सरग ले गिरे मोगरा के घांव ‘कस हालत होगे. राजनीति उठाथे, त कचारथे घलो शेखचिल्ली किहिस-‘मनखे के भाग नाम के चीज होथे जरूर. बाकी कर्म वोला हरू-गरू करथे.

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  • Last Updated: October 12, 2020, 10:45 AM IST
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कौआ परसाद ल कोन नइ जानय. ओखर बड़े नाम हे. बड़े बुता हे. ओला अपन नाम उपर बड़ गरब हे. काबर नइ होही? एक दिन लालबुझक्कड़ संग भेंट होगे. लालबुझक्कड़ ओखर खूब बड़ई करिस. अपन बड़इ कोन ल नइ सुहाय. सो कौआ परसाद घलो खुश होईस. लालबुझक्कड़ किहिस- ‘का बात हे कका लोग बाग़ तोर नाम के बड़ महिमा गाथे. कौआ परसाद किहिस- ‘मोर नाम सरिख कोनो मनुख के नाम मिलना असंभव हे. होय का रिहिस बेटा- ‘जब हमर घर के खपरइल के छत उपर कागराज मन के पंचइती होवत रिहिस तब कोनो कोनो कागराज मन चिरक दिन (बिट कर दिन) ओतके बेरा म मोर जनम होइस. पंचइती म चर्चा–परिचरचा के बखत विरोधी कागराज मन कांव–कांव करत नारेबाजी करिन. उन कोनो विपक्षी नेता कस लगिन.

जइसे उन खिसियाके वाक्-आउट कर दिन हवें. ओखर संगे–संग डेढ़ दरजन कौआ मन घलो गुस्सा के मारे अपन नेता संग पंचइती के बहिष्कार कर दिन. कतको कौआ चिरकत-चुरकात काँव–कांव करत उड़ागें. ’लालबुझक्कड़ फेर पूछिस- ‘तहां ले का होइस?’ कौआ परसाद किहिस- ‘ए डहर ददा बखरी ले आवत राहय. ओ डहर मोर जनम के किलकारी ददा सुनिस.  झट ओखर मुड़ उपर कौआ के बिट गिरगे. ददा सोचिस कागराज मन के किरपा होईस. सो मोर नाम कौआप्रसाद रख दिस. ददा भगवान भगत आदमी रिहिस ओला कौआ म भगवान दिखिस. मने मन कौआ भगवान ल झट परनाम करिस. मानस के लाइन बुदबुदाइस ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी. अउ मोर ददा खुशी के मारे नाच परिस.’

धीरे-धीरे कौआ  परसाद बड़े होइस त ओखर गोठ के गठरी भारी हॉत गिस. ओहा आघू किहिस- ‘लोगन मोर लोहा मानथें. लालबुझक्कड़ ओखर गोठ ल सुनके किहिस जय कौआ-तंत्र. अउ चलते बनिस. लालबुझक्कड़ मने–मन कौआ परसाद के तारीफ़ करिस.  लालबुझक्कड़ ह कौआ परसाद ले बड प्रभावित होगे. ईश्वर के किरपा देखो कौआ परसाद के बानी ह मीठ होगे. अपन मीठ बानी के परताप ले कौआ परसाद ल अपन उपर बड़ गुमान होइस. कौआ परसाद के चाल-ढाल बदलत गिस. ओहा समे के नाड़ी टमड़े बर जान डरिस. देखते देखत म कौआ परसाद राजनीति के खेलाडी होगे. ओमा बड़े–बड़े राजनीतिक गुन आगे. चलाकी, चतुरई, भ्रष्टाचारी, मक्कारी, सुवारथ, धोखाबाजी ये सबो आधुनिक नेता मन के गुन ओखर खोपड़ी म आ बसिस.



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एक दिन लालबुझक्कड़ के भेंट कौआ परसाद से ओखरे हवेली तीर होगे. कौआ परसाद ह लालबुझक्कड़ ल आदर दे के ओला अपन घर देखइस. फेर किहिस ‘मोर बंगला तोला कइसे लागिस? लालबुझक्कड़ बड़ अद्प के संग किहिस ‘जोरदार हे.’ कौआ परसाद चाहा, पानी के इन्तिजाम के बाद किहिस ‘मेहा कोनो सरकारी नौकरी करतेंव त अपन घर के फूटे खपरा ल बदलवा नइ सकतेंव. नान कुन कुरिया म सरत रहितेंव. जिए बर एकक दिन भारी परतिस. घर म कांव कांव,हाँव हाँव हाँव म जिन्दगी पहा जतिस. ये बंगला नेतागिरी के पुन्न, प्रताप अउ चमक-दमक आय. ’लालबुझक्कड़ किहिस – ‘कका अब त आप चुनाव लड़ सकत हो चारों खुंट आपके नाम के जोर –शोर हे. एमपी/एमएलए के टिकिट घलो मिल जही.

’कौआ परसाद जोर से खलखला के हाँसीस फेर किहिस- ‘मोर अलावा कोनो ल गिधवा-पार्टी टिकिट नइ दे सके. मोर करे धरे अउ जुगाड़ ले गिधवा-पार्टी आज सत्ता म हे. ’अब ओखर अवाज ह सुनइस हि . . हि. . हि. . . . अतके म ओखर नौकर ह कलजुगी अमरित (दारू) लईस. सुंदर बिदेसी गिलास म बिदेशी कलजुगी-अमरित शोभायमान होवत रिहिस. कौआ परसाद अपन नरी म पूरा बोतल ढरका दिस. लालबुझक्कड़ सात्विक मनुख देखते रहिगे. कौआ परसाद किहिस- ‘तेहाँ नइ पचा नइ पाते बेटा बिदेशी शराब आय न. एखर बोतल ल देखे म घलो सुख मिलथे. एला पिए ले गियान के दुआर खुलथे.  लालबुझक्कड़ देखत-सुनत बस हाँ, हूँ करिस. सोचिस पहिली के कौआ परसाद दूसर रिहिस अब के अउ के कौआ परसाद दूसर हे. सोम रस बिन राज सुख कहाँ ? अउ लालबुझक्कड़ बहाना बना के चलते बनिस. मने मन सोचिस दौलत दुसर रद्दा ले आथे त अपन बर जाय के रद्दा पहिली ले बना डरथे.

लालबुझक्कड़ संग कौआ परसाद के समे-समे म भेंट होते राहय. उही आधार म ओखर आघू के किस्सा ओहा अपन मितान शेखचिल्ली ल बतइस लालबुझक्कड़ किहिस- “जब कौआ परसाद अपन राजनीतिक कैरियर के टाप म पहुँचत रिहिस तभे ओखर एक आँखी के हरकत तेज होगे.  दुसर आँखी पहिली ले पथरा के स्थिर होगे रिहिस.  कौआ परसाद ल कुदरत के चमत्कार उपर पूरा भरोसा रिहिस. अपन कूट चाल-चलन म ओखर व्यक्तित्व पाकगे. ओला चोंच लड़ाना,चोच भिड़ाना,टांग अड़ाना,टांग तिरना,टांग टोरना,टंगडी मारना ,देहें डारना ,दूसर के हक़ नगा लेना,छिना–झपटी करना आदि गुन बचपन ले मिलत गिस. शेखचिल्ली किहिस-‘मक्खन पालिस मारे म कौआ परसाद महागुरू होगे. अपन कूटनीति म ओहा प्रदेश म अव्वल होगे. बाल के खाल निकाले के कला म ओला महारथ हासिल होगे.  पढ़े रिहिस बस चार आखर.

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मारिस छक्का, देखइया होगे हक्का –बक्का

लालबुझक्कड़ किहिस- ’राजनीति समे के खेल होथे. ठीक समे म चाल चले त जीत निश्चित हे. किरकेट के खेल म बालर गुगली बाल म घलो सीधा छक्का ठोंक देथें. राजनीति के किरकेट म घलो समे के चिन्हारी करके स्टोक मारे बर लागथे. लालबुझक्कड़ किहिस-‘ शेखचिल्ली भइया ,कौआ परसाद के जब जनम होइस तब ओखर मुहूँ म न तो चांदी के चम्मच रिहिस न सोना के.  कतको झन राजनीति म कुरसी धरे-धरे अपन दाई के पेट ले पैदा होथें.  उनकर मुहूँ म तब सोंन के नहिं  त चांदी के चम्मच जरूर होथे.  उन पैदा हो के देश के उपर उपकार करथें. कौआ परसाद के भाग बुलंद रिहिस.’
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