छत्तीसगढ़ी विशेष: तरिया के उलट पइठू मा समाय, कुदारी ठोनक दिस केसरवा कांदा ताय

प्रकृति घलोक अपन रूप के चिंता करथे. सुख - दुःख ला टपरथे. टपरत - टपरत बने बढ़वार करे हे, तेकरे सेती संसार चलतहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 19, 2020, 9:23 AM IST
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ब्बो दिन के सेती सार्वजनिक काम मा हाथ डारना चाही. भुइयाँ हमर , पानी हमर अउ जतन करइया घलोक हमर. जतन करना अउ सब्बो सच ला जान के अपन बिचार रखना तइहा जमाना ले आवत हे. अपन तीर - तार मा होवत हे अउ का होना चाही एखर चिंता आजो होथे. पानी के सेती जिनगी ला बचाए राखना हे कहिके मानव सभ्यता के विकास होवत चलत गिस अउ नंदिया के तीरे तीर घर द्वार अउ बयपार चलत गिस. चलन बाढ़िस ज्ञान - विज्ञान के नान - नान अवजार बनाए गिस. ज्ञान, कला - संस्कृति संगे - संग चले लागिस. आज ला आजे जीना हे अइसे बिचार मा विस्तार आना शुरु होइस त काली के चिंता सताए लागिस. एही काली के चिंता हा बउरई अउ धरवंट बर जोरे जंगारे के जिनिस बनाए गिस. सृष्टि काल ले लेके आज तक जतका हमन भोगत हन , चाहे सुख होवय के दुख होवय सब्बो के सेती , सब्बो जीव के सेती हरय. प्रकृति घलोक अपन रूप के चिंता करथे. सुख - दुःख ला टपरथे. टपरत - टपरत बने बढ़वार करे हे, तेकरे सेती संसार चलतहे.

आजकाल धरती अउ अकास मा आदमी जात अपन बड़ई करके मगन होवत हे. कतको जगा फऊ हो गेहे, तभो ले डरवाए असन बुता ला करतेच हे. उप्पर मा चइघे ले तरी डाहर देखे मा कतको झन देखइया थरथरा जाथें. सब्बो झन नइ थरथरावंय. नइ थरथराइन तभे कतको नवा - नवा जानकारी मिलना शुरु होगे. कोन काय करत हावय देखव चारों मुड़ा इही एक ठन नवा बुता होगे हे. कमई धमई कोनो मेरन रहय अपन सेती जीने वाला मन मानव मस्तिष्क ला घलोक अपन पूंजी बनाए के उदिम मा लगे हें. जेनला देखबे तेन काहत हे चार पइसा बाचना नइ हे छोड़ ना ए काम ला. अब चार पईसा बाचना चाही वाला संस्कृति पनप गेहे. पनपत हे कहिबे त लबारी बात हो जही. कई सदी बीतगे अपरिद्धा मन के सेती मानवता तार - तार होवत हे. अब अइसने अउ कतका दिन चलही. उद्धार करइया कोने. धरम ध्वजा धरइया मन कतका दिन ले हमर मन ला टमर के अपन सान ला बोहाहीं. धरम के पाठ पठइया अपन करतब ला दिखाए के मौका खोजत रइथे. बिलई घलोक सोना के बनवा डारथे. चढ़ोतरी मा धियान राखना अउ ओखरे हिसाब ला लगावत - लगावत मन्तर मरइया सब्बो धरम मा पनपगे हे.

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करम के प्रति जागरण के काल बहुत जल्दी अवइया हे. ठठा - ठठा के सब्बो डहर ला देख डरिन फेर. चक्कर पूरा होइस तहां उही मेरन फेर आना हे. मरनी - जपनी चलतेच रही। जपइया अपन माला जपतेच रही अउ मरइया मरतेच रिही। जेन जीथे तेन अपन बना लेथे अइसे कहिके बिचार बगरना चाही. चारो धाम करले. जतका किसम के धरम हे अउ जतका उनकर करम हे सब्बो ला एक जगा सकेल के लानना परही. छितरे - छितरे हावय कहिके सार काए समझ मा नइ आवत हे. सब्बो दिन एक बरोबर नइ होवय बने बात ए. फेर सब्बो दिन तें रहिबे का. पहिली के हिसाब हजारों साल के राहय अब तो, सैकड़ा पुरना मुस्कुल हे. सैकड़ा पुरगे त तें जान ले बने खटाइस काबर के वोहा जिनगी ला जिनगी असन जिये हावय. आवश्यकता कम मिहनत जादा. निस्फिकर होके सुतई. ससन भर खइस अंटियाके रिगिस. इही जिनगी मा होना चाही फेर होही कइसे निनानबे के फेर ला कोन भोगही. कोनो मेरन ला टमर के दिखले पोनडा मिलहिच. अपन जान हे तभे पोनडा राखे हे. दइसे करबो तभे दइसे होही. कोनो नइ जानत होही अइसे बात नोहे. जानत सब्बो हे, फेर का करना कहि के चुपेचाप संग ला देवथे. संग देवइया घलोक कमती नइ राहय वोहू ला मौका के तलाश रइथे.


पाछू के सियान मन करा मौका ला तलासे के सोंच नइ पनपे पाइस तेकरे सेती आजो जेन बुता ला ओमन करके गेहें तेन आजो तारिफ के काबिल हे. तपासे रहंय कखरो बिगाड़ झन होवय. आज हमरो मन होथे चलव ओही सोंच ऊपर बिचार करीन. (यह लेखक के न‍िजी विचार हैं)
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