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छत्‍तीसगढ़ के सपूत: संत पवन दीवान

छत्‍तीसगढ़ के सपूत: संत पवन दीवान

ये भजन ला हजारों सुनने वाला भगत मन के हाथ के तारी के संग सातो दिन दीवान जी हा गावय.

ये भजन ला हजारों सुनने वाला भगत मन के हाथ के तारी के संग सातो दिन दीवान जी हा गावय.

संत पवन दीवान हा जौन काम ला हाथ म लीस ओमा तिलिंग ला छू के मानिस. राजनीति म गीस त मंत्री बनिस, कविता सुनइस ते लाल किला म, भागवत बाचिस त छत्‍तीसगढ़ के सुखदेव महराज कहइस.

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संत पवन दीवान छत्‍तीसगढ़ के अइसे सूपत ये जौन ला जन जन के मया, दुलार, मान-सम्मान मिलिस. जिहां दीवान जी हा पहुंचना चाहिस ऊहां जा लीस तभे थिरइस. ब्रहमलीन स्वामी भजनानंद महराज जी के शिष्य पवन दीवान जी ला स्वामी अमृतानंद के रूप म धर्म अऊ अध्यात्म क्षेत्र म जाने अऊ माने जाय. कविता, राजनीति, छत्‍तीसगढ़ के जनमन म पवन दीवान नाव चलिस. भागवत प्रवचन ला छत्‍तीसगढ़ म नवा रूप अऊ ऊंचई देके भाषा के बहुत बड़े सेवा दीवान जी करिन. छत्‍तीसगढ़ भाषा म भागवत प्रवचन करने सुनने वाला मन ला भाषा के नवा संस्कार दीवान जी दीस. नवा नवा मुहवरा अऊँ नवा नवा कथा. हाय रे मोर बोरे बरा किंजर फिर के मोरे करा ये मुहावरा ला गंवइंहा मन दीवान जी के मुँह से सुन के रोजमर्रा के बातचीत म करे लगिन.

दीवान जी ला लोकजीवन अऊ लोकमंच के गहरा ज्ञान रिहिस. लोक ल साधे के ताकत के कारण राजनीति क्षेत्र के दिग्गज मन दीवान जी के चरण-धरिन. दीवान जी जिहां गीस ऊहां अपन छाप छोड़िस. हिन्दी अऊ छत्‍तीसगढ़ म समान ऊंचाई के लेखन दीवान जी करिन. हिन्दी में लिखे ऊंकर कविता लाल किला से गूंजिस मर मर कर जीता है मेरा देस, अंधियारा पीता है मेरा देश. चंदैनी गोंदा जैसन बड़े लोकमंच के गीत माला म दीवान जी के गीत तोर धरती तोर माटी गुंथाय रिहिस. अंगरेजी, संस्कृत के प्रकांड पंडित संत पवन दीवान हा मराठी, उड़िया गुजराती भाषा जानय अऊ मौका देख के बोलय. उर्दू भाषा में उनला अधिकार रिहिस.

ज्ञान के ऊंचई ला पाय के बाद दीवान जी अनपढ़ अऊ गरीब जनता के समझ में आने वाला भाषा के साधना करिस. तभे पहली बार छत्‍तीसगढ़ म दीवान जी ला वो सफलता मिलिस जौन ला असंभो केहे जा सकते हे. एक तरफ विवेकानंद आश्रम के सालाना जलसा म बड़े बड़े ज्ञानी साधू मन के बीच पवन दीवान के प्रवचन होवय तो दुसर तरफ जंगल भीतर के गांव म हजारों हजार भगत मन दिन भर बइठे बइठे दीवान जी संग भजन भाव करत मगन राहंय. दीवान जी हमेशा अपन बर नवा नवा चुनौती खड़ा कर लय. अइसन काम ऊही साधक हा कर पाथे जौन ला डर, मोह, फिकर अऊ पाय के जोड़-तोड़ से कोनो लेना देना नइ रहिजाय.

”चाह गई, चिंता मिटी मनुवा बेपरवाह जिसको कछु न चाहिए सो ही सहंसाह“ दीवान जी ये कथन के मरम ला जान के शहंसाही करिस. छत्‍तीसगढ़ के मान-सनमान अऊ डॉ. खूबचंद बघेल के सपना ला आगू बढ़ाय बर दीवान जी कविता के औजार ला पजइस. पूरा एक पीढ़ी ला लेखन के नवा दिसा दीस. कविता लेखन के क्षेत्र म कतको झन टिकटाक रेंगत रिहिन तेन मन लाअंगरी धरा के बने रेंगे बर सिखइस. बने डौल के रेगने वाला मन ला दौड़े बर सिखइन और दौड़इया मन ला सबले आगू जायके मंतर दीन.

कोनो आसरम, संगठन, पाल्टी, घर, गांव, जगा के महिमा ला बड़े काम करइया नामी मनखे के संग मिल जथे त ओकर बढ़वार देखते बनथे. राजिम आसरम के संस्कृत स्कूल अऊ ओमा पढ़इया लइका मन ला पवन दीवान हा गजब मया कर के आगू बढ़इस. वो स्कूल म पढ़ के निकले लइका मन आज बड़े बड़े पद म हे. पवन दीवान ला बहुत भोला भाला लइका असन सुभाव मिले रिहिस. छल कपट ला जानतिस त अतेक ऊपर जाय के बाद जीवन के संझौती म राजनीति म अकेल्ला काबर होतिस.

छत्‍तीसगढ़ के जस गवइया संत पवन दीवान के गुन अऊ जोग्यता बहुत रिहिस.

संत पवन दीवान हा जौन काम ला हाथ म लीस ओमा तिलिंग ला छू के मानिस. राजनीति म गीस त मंत्री बनिस, कविता सुनइस ते लाल किला म, भागवत बाचिस त छत्‍तीसगढ़ के सुखदेव महराज कहइस.

छत्‍तीसगढ़ बर उमड़िस त नारा बनगे -
पवन नहीं है आंधी है
छत्‍तीसगढ़ का गांधी है.

संत पवन दीवान हा छत्‍तीसगढ़ के मान सनमान बर जियत रिहिस. अपन आखिरी समे म छत्‍तीसगढ़ के बेटी माता कौशल्या के गुनानबाद ल अइसे ढंग से सुरू करिस के देस के राष्ट्रपति हा छत्‍तीसगढ़ म आके किहिस के छत्‍तीसगढ़ हा भगवान सिरी राम के माता कौशल्या जी के मइके ये.

दीवान जी हा का जान के अपन कविता मन के चुनाव करय तौन बात हा सोचनी होंगे हे. एक जमाना म चंदा कविता चलय. बाद म मर मर कर जीता है मेरा देश गजब चलिस.

येती सियानी उम्भर म दीवान जी लिखिन राख कविता.

राखबे त राख
नइ राखे सकस त झन राख

ये हा कविता के सुरूवाती लइन ये. छत्‍तीसगढ़ के मन तो उन ला गजब राखे के कोसिस करिन फेर राखे नई सकिन. कोन हा कोन ल कतेक दिन ले राखे पाथे. जौन रद्दा दीवान जी बता के गे हे तौन रद्दा म चलके हमन अपन छत्‍तीसगढ़ के जस अऊ मान ला राखे के परयास करन इही हा उन ला सही म सरधांजली होही.

अपन तीर-तखार ला कविता या कहानी के विषय बनाना बड़े लिखइया मन के विशेषता केहे जाते. लहर लहर लहरावय हो मोर महानदी के पानी ये कविता ला सुन के कोन ला ब्रहमचर्य आश्रम ला छूते हुए बोहाने वाली महानदी के सुरता नइ अइस होही. राऊत नाच के दोहा हे-



”मोर लउड़ी रिंगी चीगी
सबके लकड़ी कुसुवारे.“

ये दोहा के अंदाज म कविता लिखके दीवान जी हा जीवन म राजनीति के दखलंदाजी अऊ अपराधीकरण ऊपर बियंग करे हे

सक्कर ला चांटा म खादिन
तेल ल पी दीन मुसुवा
जनता होगे रिंगीचीगी
नेता हागे कुसुवा.

इही दिसा म दू डांड़ अऊ हे ”देस जाय कुंडा म सिद्ध कर सुवारत ला, नेता मन टोपी बना के पहिर लव भारत ला.

दीवान जी हर रंग के कविता लिखे हे. जहां जंगल के जीवन उपर आय संकंट ल मर मर कर जीता है मेरा देस म याद करे हे उहें जंगल के संगीत अऊ सुंगधमय जीवन उपर महर महर महुआ महके जैसन कविता लिखे है.

अपन जीवन के अंतिम एक दसक ला संत पवन दीवान हा छत्‍तीसगढ़ के बेटी भगवान सिरी राम के माता कौशल्या जी के चरण म अरपित करिस.

राम का नाम लेकर जो मर जायेंगे
नाम दुनिया में अपना वो कर जायेंगे
आप मानो न मानो खुशी आपके
हम मुसाफिर है कल अपने घर जायेंगे.

ये भजन ला हजारों सुनने वाला भगत मन के हाथ के तारी के संग सातो दिन दीवान जी हा गावय. छिन भंगुर जीवन के असलियत ला जानने वाला महान संत पवन दीवान हा अपन संग जुड़े सबला ये बतावय के मरे के बाद भी आदमी कहूं नइ जाय, इहां रिथे. रूप भर बदल जथे. हम चिन्हे नइ सकन फेर जाय कोनो नहीं. ऊंकर विचार ला मानते हुए हमन ला मानना चाही के दीवान जी कहूँ नइ गं ेये तभे तो ओकर नगरी म अतेक बड़ कारज होवत हे.

उसके चरणों में अर्पित
सूरज का नम्र प्रणाम था.

चंदा कविता के ये डा़ंड याद आवत रे. दीवान जी के चरण म सब विनम्र प्रणाम अरपित करंय. संत पवन दीवान छत्‍तीसगढ़ के स्वाभिमान बर जीवन भर काम करिस अऊ स्वाभिमान अऊ सम्मान के मंत्र देके गीस. ऊँकर अमर पंक्ति हेउ

'छत्‍तीसगढ़ में सब कुछ है पर एक कमी है स्वाभिमान की, मुझसे सहीं नहीं जाती है ऐसी चुप्पी वर्तमान की'

Tags: Chhattisgarhi

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