छत्तीसगढ़ी व्‍यंग्‍य: मदारी के बाजा अउ बेंदरा के नाचा- यस-सर, यस-सर

सुने म आथे के अधिकारी (ब्यूरेकेट्स) मन ‘घलो अब आत्म-चिंतन करथें. अपन अंतर-आत्मा ल मथथें. मथत-मथत अपन सुवारथ के नवा सूत्र खोज लेथे.शासन से दुखी जनता के झरत आंसू उन देखथें. आंसू के आर–पार देखथें. पावर कुरसी के गियान दरसन उंच होथें.’   

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  • Last Updated: October 20, 2020, 10:44 AM IST
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बरीललाल के दूरबीन कस आँखी हर वस्तु के आर-पार देखथे. हमर देश म पारदरसी सरकार/राजनीति के कथा–कहनी, नाटक-नौटंकी, हाना-गाना, गम्मत, नाचा, आसन, भासन, कसरत, अउ लीला खूब चलत आवत हे. लालबुझक्कड़ किहिस- ‘आजकल खाय के दांत अलग अउ देखाय–बताय के दांत अलग होथे. कतको बात सात तारा म बंद रखे जथे. राजनीति के गियानी मन सरकार/राजनीति के काम के पारदर्शिता के खोज करे हें. अइसे कहे जथे के पहिली कुची बनाय जथे बाद म तारा बनथे. कतको खोजी जीव मन सरकार ल आर–पार देखे बर सूचना के अधिकार लगाथें. कतको सरकारी बुता के परदा के आड़ ल चिरत–चुरात थक जथें.फेर हार नइ मानें अउ कोई–कोई सफल घलो होथें.’

खबरीलाल किहिस-‘नौकरशाह मन के चक्रव्यूह ल भेदे बर अभिमन्यू चाही. वुही अकेल्ला अभिमन्यू जेला महाभारत के जुद्ध म बड़े बड़े महारथी अउ रथी मन चारों खुंट घेर के मार डरिन. आम अउ मध्यम दरजा के मनखे ल कई बखत मरे अउ जिए बर लागथे.अब के अभिमन्यू घेरी-बेरी मरथें, अउ जीथें तब जा के सरकारी जानकारी के कोनो खिड़की खुलथे. जादातर अधिकारी मन सुंदर टरकाऊ नीति के अनुसार बाहना बना के देहें ल डार देथें.  सूचना के अधिकार’’ के बैनर-पोस्टर सम्मानपूर्वक टांग के चैन के नींद लेथें. लालबुझक्कड़ किहिस-‘खोजी चतुरा मन मउका देख के खोदाई करथें. खाल्हे डाहर ले सीढिया चढ़त-चढ़त आर-पार देखे बर खिड़की खोल लेथें. कतको झन खनत-खनत कोइला अउ हीरा पा जथें.

कतको झन चुचवा जथें. न माया मिले न राम. अधिकारी सरकार के बाप हो जथे. जानकारी लेवइया आख़री डाड़ ल पार कर लेथें तब सरकारी पारदरसिता के गियानिक बन पाथें. सरकारी बुता करइया मन पहिली नौ दिन म अढइ कोस चल लेवत रिहिन.अब नव दिन/नौ महीना लटपट एक कोस चले कस बात होथे.’ खबरीलाल किहिस-‘सरकारी बुता के आर-पार देखे के चक्कर म उन सरकारी चकरी के भंवरी म सालों–साल गोल–गोल घुमत रहिं जथें. अधिकारी मन के कान तात नइ होय. कतको झन ल चक्कर आ जथे फेर जानकारी नइ मिले. कोनो रद्दा भटक जथे. सरकारी बुता के न आर देखे जा सके न पार. ओर-छोर के फांसा समझ नइ आय. तभो ले पारदर्शिता के सरकारी गजल अउ भजन चलते रहिथे.

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पारदरसी सरकार अपारदरसी सिद्ध होथें. ’खबरीलाल अपन लय म गोठियाते गिस अउ आघू किहिस – ‘सुने म आथे के अधिकारी (ब्यूरेकेट्स) मन ‘घलो अब आत्म-चिंतन करथें. अपन अंतर-आत्मा ल मथथें. मथत-मथत अपन सुवारथ के नवा सूत्र खोज लेथे. शासन से दुखी जनता के झरत आंसू उन देखथें. आंसू के आर–पार देखथें. पावर कुरसी के गियान दरसन उंच होथें.’ गोबरदास किहिस-‘राज्य सरकार के कतको झन अधिकारी जिला के भगवान होथें. जनता के सुख-दुःख वुहू ल जनाथे. कभू नियाव होथे ,कहू अनियाव. कभू आशा कभू निराशा. पावर कुरसी के तिरे-तिर सज्जन किसम के मनखे कम दिखथें.’ शेखचिल्ली किहिस –‘पावर कुरसी म बइठे ले कतको झन के आँखी रतनार हो जथे.



सही अउ गलत साफ़–साफ़ आर–पार दिखबे नइ करे. कतको झन के अंतरात्मा जागे –जागे होथे.आँखी अपने-अपन खुल जथे. कोनो अपन आँखी ल मुंद के अंधियार म निरनय लेथें. खबरीलाल किहिस-‘कोनो गियान के चकाचक अंजोर म जोरदार निरनय लेथें.निडर होथें. एकांत म अपन आप ल देख लेथें. वोला सबे संग निपटना –अउ सब ल निपटाना हे. दिमाग म विचार के कुटाई ,धुनाई चलते रहिथे. लालबुझक्कड किहिस – ‘हाँ भई, सरकार ल बने चलत फिरत चंगा देखाना जरूरी होथे.’शेखचिल्ली अखबार पढ्त–पढ्त किहिस-‘ छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर के एक झन बड़े अधिकारी(ब्यूरेकेट्स) के कहना हे -मेंहा ब्यूरेकेट्स आंव जरूर फेर यस मैंन नोहंव.’ शेखचिल्ली किहिस-‘एखर मतलब हे के साहबजी ल नो सर केहे बर आथे.’

खबरीलाल किहिस-‘ जादातर अधिकारी मन रिटायर हो जथें तभो ले उन ल नो सर केहे बर नइ आय. उन कोसीस करथें त बोले के बखत नो सर नरी म अटक जथे. वइसने जइसे मछरी के मुख म गरी फंस जथे.यस सर/यस सर काहत उनकर पूरा उमर पहा जथे. उन नो सर केहे के कोसीस म यस सर,यस सर बोल पारथें. नो सर केहे बर हिम्मत चाही. शेखचिल्ली किहिस – दूसर दिन अधिकारी महाशय अपन बात ल पलट दिस.‘खबरीलाल किहिस-‘एहा कुरसी के माया आय. नेता मन गुनिक राहंय चाहे झन राहंय उन ल झेलना परथे. पढ़े-लिखे अनपढ़/ईमानदार भ्रष्ट सबो बरोबर. लेड़गा मन घलो टेड़गा-बेड़गा गोठिया लेथें. नेताजी मन अधिकारीजी मन ल हलात-डोलात रहिथें. कतको झन त अधिकारी मन ल कभू मतलब से त कभू बेमतलब फटकार घलो देथें’.

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लालबुझक्कड किहिस-अंगरेज हमर देश म अंगरेजी के यस सर/नो सर छोड़ के बिदा होइन. यस सर/नो सर हमर व्यवस्था म अमर हे. जइसे ‘साहेब’ शब्द हर आफिस म जिंदाबाद हे. साहेब होय बर कतको झन ल खूब पापर बेले बर परथे. अउ कतको झन अपन भाग के रोटी खाथे. येहा शोध के विषय आय. गोबरदास किहि- ‘पढ़-लिख के खूब टंच मनखे बड़े अधिकारी हो जथें. कतको झन के भाग बड़े होथे. बड़े भाग के बड़े किस्सा. पावर बिन आजकल देश सेवा कहाँ होथे.’ शेखचिल्ली किहिस-‘ नेता अउ अधिकारी मन के सरकारी गठबंधन होथे. अब त अपन-सेवा म देश-सेवा देखइया मन के भीड़ हे. ’खबरीलाल किहिस-‘सत्ता के ट्रंप कारड कइसे फेंटना, छांटना, बांटना उन बनें जानथें. नेताजी मन मउसम के अनुसार रंग बदलथें.अधिकारी मन घलोक उनकर देखा-सीखी रंग बदलथें.

चमचागिरी करे म बड़ सुख होथे. जइसे मदारी के बाजा व्इसे बेंदरा के नाचा. इही त लोकतंत्र आय. बेंदरा के नाचा कस मदारी के बाजा घलो होथे. हवा जे डाहर चले वुही डाहर चलो. ’लालबुझक्कड किहिस- यस सर/यस सर म शासन के सुन्दरता देखो. सहीं/गलत दुनों म यस सर. शेखचिल्ली किहिस- ‘बुता बने होगे त सरकार के वाह वाह. नेताजी बहुत अच्छा हे. बुता बिगड़गे त बड़े अधिकारी के खिसियानी झेलो,डांट-डपट सुनो. अधिकारी होथें भारी/प्रभारी.’ खबरीलाल किहिस-‘नेताजी मन के हुशियारी सरकार के पूरा बुता के सब भार अधिकारी मन ल संउप देव. अउ हो जाव फ्री. फ्री राहाव ! सत्ता के मजा म मस्त राहव. कोरोना काल म घलो फ्री.जनता –जनार्दन के आवाज कोन सुने ? व्यवस्था के जबानी जमा-खरचा चलन देव.’

गोबरदास किहिस-‘नेताजी मन मीडिया म परगट होथें.मीडिया चर्चा करे बर पंचइती दरी बिछाथें. टी.वी.म नेता मन के प्रवक्ता मन अपने फूनथें, अपने ओसाथें. सवाल –जवाब होथे लपर झपर. आधा तितर–आधा बटेर. अपने मन कथें ,अपने मन सुनथें.फोकट के कटर कटर देखो – सुनो, जनता के इही त बुता हे.’
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