छत्तीसगढ़ी विशेष: हिस्सा बांटा बर लाखा डरगे, होगे नियाव

छत्तीसगढ़ी विशेष.

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जानसुन के आगू ले चतवार के रेंगई घलो बने बात हरय घर-दुवार खेती खार संघरा रेहे सेहे मा बने संवरथे. समरथ होना हे त समिलहा परवार मा राहव. मनभर अउ ससन भर अइसे केहे गेहे. जानबा के मुताबिक जेन मेल जोल बनाके चलिस तेखर बेड़ा पार हो जथे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 16, 2021, 8:37 PM IST
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राजकाज मा हिस्सा बांटा के झगरा ला सबो जानत हावन. बने बने मा सब बने हे फेर गिनहा होगिस ते झन पूछ कोन काय कर डारही. छत्तीसगढ़ मा गांव सियानी करइया के भारी बोलबाला रइथे अउ सदा दिन ले राहय अइसे हमर ईश्वर से बिनती हे. घर परवार मा काहीं ऊंच नीच होइस त चार झन सकेल ले अउ हिस्सा बांटा के नियाव ला कर डार बसेरा बने राहय अउ काम घलो चलत राहय.

तइहा ले होवय आवत हे

लाखा डारे के परंपरा तइहा पहरो ले चलत आवत हे. आजो ए परंपरा ला बनाए राखे के काम गांव-गांव मा देखे जा सकत हे. एके परिवार कलेचुप अपन घर के नियाव करइया चारझन ला सकेल के फुरसत पा जाथे. जादा कलर किलिर ले अच्छा हावय के अपने अपन मा समझौता हो जावय. अपन-अपन कमावंय खांवय. चुलहा चाकी अलगियागे तहां सबो झंझट खतम. अइसनहे चलन जगा जगा होतिस त पुलिस कचेरी के काम घलो हलका हो जतिस. न्याय पंचईती मा कतको झन के पूंजी खरकत हमीमन देखत आवत हन. सबोझन जानत हावंय तभोले अड़ियाए मनखे के तंय काय कर सकत हस ओ हा रेंगही अपनेच मन के चार झन के झेल ला जेन नइ झेल सकिस तेला अब का केहे जाए. चल रे निसमुड़ काली पछताबे घलो.

सियनहा के जीयत जागत सबो होवय
अपन उम्मर भर जियइया अपन आंखी के आगू मा सबो के बनउकी बना डारथे. बनऊकी के बनावत ले जीना घलो पुण्य के जीवन होथे. उदुकले कहूं कुछु होगे त कइसे चलही अइसे सियानी करइया मन जानत हांवय. जानसुन के आगू ले चतवार के रेंगई घलो बने बात हरय घर-दुवार खेती खार संघरा रेहे सेहे मा बने संवरथे. समरथ होना हे त समिलहा परवार मा राहव. मनभर अउ ससन भर अइसे केहे गेहे. जानबा के मुताबिक जेन मेल जोल बनाके चलिस तेखर बेड़ा पार हो जथे. सुख दुख मा खड़ा होना परवार के असली पहचान हरय. चार झन रहिबे ते कोनो कोनो बेरा थोरिक फरक परे ला धर लेथे. काबर के नवा जगा ले आए बहुरिया के घलो चलना चाही अइसे केहे गेहे. चलना अउ चलाना दुनो पलवा अलगियागे तहां ले गय. एकरे सेती सियानी के चलइया ला निर्विवाद होना, रहना, बसना जरूरी हावय अपन राहत ले सबोझन ला नियाव देवय.

बड़े छोटे के घलो सुरताल रइथे

जेठासी के चलन आजो हावय. मां बाप बर घलो जीयत भर के जुगाड़ होना चाही ए सोचे ला बदलना परही. जुगाड़ के जिनगी मा मां छोटे बेटा के हिस्सा मा आथे काबर के पुचकट के लइका अपन माँ के मयारु होथे. बापू अपन राहत ले दूनो परानी एके जगा राहन कहिके सोचे रिहिस फेर बांटा हिस्सा मा का परगे. अलग-अलग घर बारी मा माँ बाप झन रखवार बनय ऐला आज चिंता करना जरूरी हे.



सब कुछ मा कुछ-कुछ जियानथे घलो

कोनो जिनिस के सेती कई पईत अलहन के आरो मिले ला धर लेथे. अलहन ला टारे जा सकत हे काबर के दू चार दिन मा कतको दुख हाकमतिया जाथे. ताता रोसी के बेरा धीरज राखना परथे तभे आने वाला समय हमर रद्दा ला देखत मिलही काबर के समय हा सब ले बड़े सेठ हरय. एती ओती मुंह करके कतका दिन ले रेंगबे. अपन लहू अपने डाहर तीरथे तभे तो विपत्ति के बेरा सबो झन सकलाए अपन डहर दौड़थे. कोनो बुता जियानतले होइस ओ बुता हा बुता नोहय. बोझा कतका दिन ले बोहे ठाढ़े रहिबे कोनो ला कहिके उतरवा लेना चाही. बोझा पटके नइ जाए. सुरताए रद्दा ला देख कतको रद्दा रेंगइया रेंगत-रेंगत चिन्हा मारत गिन अउ आने वाला ला कांटा खूंटी झन गड़य कहिके चलत गिन नवा गियान देवत गिन. बस अतके जिनगी के सार हरय. बांटा हिस्सा होवय फेर परवार सुख दुःख मा एक होवंय.

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