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छत्तीसगढ़ी व्यंग्य: अफ़वाह के गरमा-गरम हवा

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य

जे डाहर जाबे ते डाहर लोगन कान ल देखे बिना कऊँआ के पाछू भागत दिखथें. न कऊँआ पकडाय, न कान जनाय. कतको मनखे फोकट चिंता म दुबरावत हें. दूसर कऊँआ ल देख करूवावत हें.

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आजकल अफ़वाह के बड़े बजार हे. कऊँआ(कागराज) कान ल ले गे कहि के गोहार परइया कमती नइ हे! जे डाहर जाबे ते डाहर लोगन कान ल देखे बिना कऊँआ के पाछू भागत दिखथें. न कऊँआ पकडाय, न कान जनाय. कतको मनखे फोकट चिंता म दुबरावत हें. दूसर कऊँआ ल देख करूवावत हें. कऊँआ कांव-कांव करके सफाई देवत हें के भइया तोर कान सही सलामत हे. चिंता बड़ आफ़त हे. उन कहाँ मानथें. अकल के कच्चा. अफ़वाह चारों दिशा म बरोबर घूम जथें. अफ़वाह के धुंगिया हर जगह उड़थे. अफ़वाह उड़इया मन धुंगिया ले आगी निकाले बर जानथें. आगी म कोनों कतको जरें-भूंजाय उन ल तो मजा आना चाही बस. कोहराम मचा देथें.

झूठ के बाण
गाँव-सहर के गली मोहल्ला तक झूठ के तरकश ले झूठ के बाण छूटथे. कतको झन अफ़वाह के मिसाइल उपर मिसाइल छोड़े म मजा लेथें. कोनो-कोनो झूठ के बारूद बिछा के घर के घर बर्बाद कर देथें. राई कस झूठ पहाड़ कस घलो हो जथे. अफ़वाह के खोदाई करके जब सत्य के खोज करे जथे तब वुहाँ ले मुसवा निकलथे. झूठ के खेती होथे. झूठ के फसल लुवइया मन बड़ चतुरा होथें. झूठ के बोलबाला सब जगा देख लेव. झूठ कोनो झूठ म कुशियार कस रस होथे. कोनो झूठ बांस कस नीरस होथे. फेर झूठ बोलइया दिनों दिन बाढ़त हे. ठेलहा मनखे मन ल झूठ सुने अउ झूठ फइलाय म खूब रस मिलथे. ये मन झूठ के रसिया होथें.

कऊँआ कस मनखे
राष्ट्रीय स्तर म झूठ के बड़ सम्मान हे. झूठ बोले ले कऊँआ नइ काटे. कऊँआ कस मनखे मन झूठ के ठेकादार होथें. झूठ बोलो अपन काम बनाव. सच के चक्कर म उठक-बइठक जादा होथे. कस के मिहनत करे के बाद म घलो परिणाम म तराजू के पल्ला झूठ डाहर जा के ओरम जथे. झूठ बोले के घलो कला होथे. ये कला ल दुनिया के कोनो विश्वविद्यालय म नइ पढ़ाय जा. बिना पढ़ई के लोग झूठ बोले के कला म एकदम टंच(होशियार) हो जथें. महाभारत के युद्ध म युधिष्ठिर अपन गुरू पुत्र अश्वस्थामा के बारे म आधा-सच, आधा-झूठ बोल के महारथी गुरू द्रोणाचार्य के मनोबल गिरा देथे. पुत्र अश्वस्थामा ल युद्ध म मरे के खबर सुन के अउ ओखर पुष्टि के बाद हाथ-गोड़ शिथिल हो जथे. बुध (बुद्धि) सुन्न हो जथे. सत्यवादी युधिष्ठिर ल गुरू द्रोण पूछथे त वो ह कथे‘अश्वस्थामा हतो हत: नरो वा कुंजरो’ नरो ल जोर से अउ कुंजरो ल एकदम धीरे से बोलथे. दुखी गुरू द्रोणाचार्य युद्ध के मैदान म गिर परथे. उचित अवसर पा के द्रोण-शिष्य महान धनुर्धर अर्जुन अपन निहत्था गुरू उपर बाण चलाके ओला मार डरथे. सदा सत्य बोलइय्या धर्मराज युधिष्ठिर ल समय झूठ बोलवा दिस. कुरूक्षेत्र के युद्ध म अफ़वाह फ़ैल गे गुरू द्रोण पुत्र अश्वस्थामा युद्ध म मारे गे. जबकि अश्वस्थामा जियत रिहिस. युद्ध के मैदान म डटे रिहिस. फेर अफ़वाह काम करगे.

अफ़वाह के धुंगिया
अफ़वाह के धुंगिया म नेता मन अपन रोटी सेंक लेथें. सुवारथ अफ़वाह के सगे रिश्तेदार होथे. ओखर रिश्तेदारी झूठ से घलो होथे. सुवारथ सिद्धि बर झूठ के बड़ सहयोग होथे. कतको झन मन मजा ले बर, कखरो काम बिगाड़े बर या अपन मनोरंजन करे बर अफ़वाह उड़ावत रहिथें. अउ बिचारा कऊँआ फोकट म बदनाम होथे. आजकल सबो जगा लबारी (झूठ) के बोलबाला हे.

नवनीत (लेवना) लेपन
झूठ बोलइया मन नवनीत लेपन बहुत सुंदर ढंग ले करथें. राजा महाराजा मन के काल म स्तुति करइया मन के खूब मान रहय. आजकल सत्ताधारी नेता मन के चरन चटइया कमती नइ हे. सच के आगू म झूठ के रंगीन परदा होथे जेला खींचे म उन हुशियार होथें. उनकर आगू म झूठ ल अतेक सुंदर सजा-संवार के बोलें जथे के झूठ पूरा-पूरा सच लगथे. सच अपने-अपन झूठ समझ ले जथे. झूठ ह मीठ-मीठ बने लागथे. सच ह करेला कस करू होथे. बनत काम बिगड़ जथे. झूठ उगलइया मन अफ़वाह के परभाव ल जानथें. कतको झन के रोजी रोटी अइसने चलथे. अफ़वाह म राजनीति के अस्त्र-शस्त्र होथे, एला लुका के रखे के परम्परा हे. मौक़ा देख के अफ़वाह के पुड़िया खोले जथे. राजनीति म नाटक-नौटंकी जादा होगे हे. सत्ता सुख बर सबराजनीतिक अस्त्र-शस्त्र जायज होथे. पहिली आँखन देखी म जादा भरोसा होय. अब आंखन अन-देखी म सच जादा होथे. राजनेता के घड़ियाली आंसू म सच देखे ले धोखा हो जथे. उन हानि-लाभ के दरसन ले हर घटना म देखथें, सुनथें. नाटकीय प्रदर्शन करथें. गाँव-शहर म हर ढंग, हर रंग के अफ़वाह होथे. अफ़वाह कभू-कभू भारी अलहन खड़े कर देथे.

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