छत्तीसगढ़ी व्यंग्य- कऊंआ बर मोती अउ हंस बर गोटी

छत्तीसगढ़ी विशेष

कवि लटपटिया कुछ महीना म नगर के परमुख रसवर्षक कवि होगे. छोटे-बड़े सब कवि लेखक मन ल साधे के आधुनिक लेवना(मक्खन)विधि के परयोग करिस. नगर स्तरीय कवि सम्मेलन ले प्रदेश स्तरीय कवि सम्मेलन म ओखर दखल बाढगे. प्रदेश के संस्कृति विभाग के आंखी म माड़े चश्मा ल जब हटइस त संस्कृति विभाग के आँखी म सिर्फ कवि लटपटिया दिखिस.

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खबरीलाल, लालबुझक्कड़, गोबरदास अउ मिट्ठूलाल चारों संगवारी साहित्यिकं मूड म कवि लटपटिया के रचना संसार म ताक-झाँक करना शुरू करिन. एला ओमन नाव दिन ‘कवि लटपटिया अउ कविता दरसन’ फेर का हे घूमना फिरना शुरू करिन. सुंदर बगीचा जेकर भीतरी म कई परकार के फूल खिले हे. अउ ओखर बाहिर डाहर मोहल्ला के शेर, चीता,लकड़बग्घा कस कुकुर मन भूंकत हें. उनकर पहरेदारी आवाज म वीर रस के धार अउ सिंगार रस म पियार के बयार चलिस. नवनीत-लेपन अउ अन्य साहित्य परगट होइस.

मन वीणा के तार झनझनागे

खबरीलाल अपन गंभीर आवाज म बोलना शुरू करिस. किहिस-हमर नगर के कवि लटपटिया ल आजकल कोन नइ जाने. कवि लटपटिया खटिया के पटिया चिक्कन करत-करत अचानक कवि होगे. कविता जगत ले ओखर साक्षात्कार होइस. बढ़ईगिरी करत-करत ओखर आत्मा म जागरण-काल परवेश करिस. खटिया, पलंग के पाया ल चिकनात-चिकनात ओ गुनगुनाय लगिस. बस अतके म अमर साहित्य परगट होय बर छटपटइस. कवि लटपटिया के मन वीणा के तार झनझनागे.

लालबुझक्कड़ किहिस ये डाहर खटिया, पलंग कुंदे के मशीन चले ओ डाहर कवि लटपटिया कविता पेले. एक बखत कविता के धुन म मशीन ले हाथ छेदागे. घर म हल्ला-गुल्ला माचगे. हाथ के माई अंगरी ले खून के धार फूटिस तभो ले कवि लटपटिया सब झेलगे. अउ कविता के धार म बोहावत रिहिस. घर के मन सब डर्रागें. ये लटपटिया कहूं पगला त नइ गे हे? कवि लटपटिया गुनगुनात-गुनगुनात पट्टी बंधवइस. ए घटना ले ओला नवा विचार मिलिस. कवि के मन अउ देह के पीरा एक होगे.

चिक्कन कविता

मिट्ठूलाल किहिस-कवि लटपटिया के रूझान बढ़ईगिरी म कम कविता म जादा बाढ़ते गिस. कविता के भूत धरे ले ओखर घर वाले मन ओखर चुलहा ल अलग कर भाई बंटवारा होगें. कवि लटपटिया जानत रहिस के वाह ..वाह ..ले पेट नइ भरय अउ साग-भाजी बेचना शुरू करिस. गरीबी रेखा के कारड जिंदाबाद रिहिस सो दार-रोटी के समस्या हल होगे. साग-भाजी बेचत-बेचत गिराहिकी कम राहय या नइ राहय त वुहें भजिया, चना खा-खा के वुही कागज म कविता लिख मारे. भाटा,पताल (बंगाला) मिरचा, धनिया ‘फूल गोभी,गाँठ-गोभी,बरबट्टी,मुरई,मुनगा(सहजन)आदि के उपर अपन कलम खूब चलइस. ओखर कलम न अटकिस न भटकिस. फूल स्पीड म चलिस. ओला देख के कई कली खिलिस.

दरी बिछावत,लपेटत

गोबरदास किहिस-धीरे–धीरे गिराहिक मन ल कविता सुना-सुना के साग-भाजी बेचे. जेन तारीफ़ करे तेन मन ल फ्री म घलो साग-भाजी दे देय. अइसना नेक दरियादिली म कवि लटपटिया के पहिचान बनगे. चार-छे महीना बाद ये धंधा म घलो घाटा होगे. फेर टू-व्हीलर मैकेनिक बनगे. चार दिन बाद फेर हताशा आ गे. ए दौरान ओखर मन म कविता के धार खूब फूटिस. ओखर एकमात्र धरम पत्नी चमेली बाई ल कुछ समझ न आय के आखिर पति-देव दिन-रात का लिखत–पढ्त रहिथे. फेर कुछु कहि न पाय. कवि- गोष्ठी म दरी-बिछावत,उरसावत नवा-नवा प्रेरना ओखर भीतरी आंधी-तूफ़ान बन उमडत रिहिस.

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कविता के मसाल

मिट्ठूलाल किहिस-साहित्य के क्षेत्र म कवि लटपटिया के पूछ अचानक बाढ़गे. ‘धीर म खीर हे’ बात सही होगे. नगर के अखबार म ओखर फोटू अउ कविता छपना शुरू होगे. ओला गिरे, परे, हपटे मन के कवि के रूप म पहिचान मिलिस. कवि लटपटिया समाज के आख़िरी लाइन के कवि होना बड़े भाग के फल होथे न. वोला पूरा विश्वास रिहिस के कविता लिखे ले क्रान्ति हो जही. कविता ले क्रांति त नइ होइस फेर ओखर जिनगानी म क्रान्ति जरूर होगे.
गोबरदास किहिस-कवि लटपटिया के कविता ल जागरूक समीक्षक मन ‘मशाल-कविता’ सिद्ध करे के कोशिश करिन. ओखर साग-भाजी कविता संग्रह ल आकाशवाणी तक पहुंचा दीन.

नवनीत-लेपन म रस-वर्षक कवि

खबरीलाल किहिस-कवि लटपटिया कुछ महीना म नगर के परमुख रसवर्षक कवि होगे. छोटे-बड़े सब कवि लेखक मन ल साधे के आधुनिक लेवना(मक्खन)विधि के परयोग करिस. नगर स्तरीय कवि सम्मेलन ले प्रदेश स्तरीय कवि सम्मेलन म ओखर दखल बाढगे. प्रदेश के संस्कृति विभाग के आंखी म माड़े चश्मा ल जब हटइस त संस्कृति विभाग के आँखी म सिर्फ कवि लटपटिया दिखिस. कवि लटपटिया ओखर वंदना करिस अउ आशीर्वाद पइस. दिगर कवि-लेखक मन लटपटियाजी के लोहा मान लिन. उन किहिन के साहित्य म नवनीत-लेपन(मक्खन पालिस) विदया कवि लटपटिया से सीखना चाही. संस्कृति विभाग के हर कार्यक्रम के न्योता म सब ले पहिली ओखरे नाम राहय. साहित्य वाचस्पति मन सोचत रहिगे के आखिर ओखर तिर अइसे कोन सा चारा हे के सब ओखरे तीर जा-जा के गोल-गोल घूमथें !! दूरदर्शन अउ टी.वी.चैनल तक ओखर पहुंच होगे. कवि लटपटिया ल मीडिया आधुनिक मंचीय कवि मन के हीरो बना दिस. मंच के जोड़,घटाना, गुना, भाग अउ चालू सबे समीकरण म ओहा ठसलगहा होगे. सरकारी कार्यक्रम अउ गैरसरकारी मंच के कवि लटपटिया अब सुविख्यात कवि होगे. कतको झन ओला अखिल भारतीय कवि सिद्ध करे बर भिड़गें. केहे गेहे के-खुदा मेहरबान त गधा पहलवान. आखिर कवि लटपटिया दु-चार कविता ल लेके अखिल भारतीय होगे.

नवनीत म तऊंरत कविता

साहित्य परेमी मिट्ठूलाल किहिस-कवि लटपटियाजी अब बड़े नाम होगे हे. सरकार के किरपा–पात्र हे. सरकारी चिमटा बजाय म ओला महारत हासिल हे. जिला प्रशासन के ओला कोतवाल जान लेव. हर सरकारी कार्यक्रम म ओखर भूमिका कोनो न कोनो डाहर ले तय हो जथे. अपन प्रशंसा कराय के ओखर तिर नवा-नवा सूत्र हे. कवि लटपटियाजी के कविता संसार म जगा–जगा बोइर कांटा हे. जगा–जगा बंबरी रूख(बबूल वृक्ष) के कांटा अउ ओखर फूल के किस्सा म बड़ ख़ूबसूरती हे. सुंदर छंद-विधान हे. शब्द के मखमली बुनावट हे. मुक्त छंद म ओखर कविता सीढ़िया चढ़त हे. संगत के जगा असंगत मुहावरा हे.फेर सब चलता है वाले अंदाज म कई पंक्तियाँ हे. पूरा सरकारी कविता हे. हर लाइन नवनीत म तऊँरत हे.

कोरोना-महाकाव्य’ डाहर मार्च-पास्ट

खबरीलाल किहिस-आजकल कवि लटपटिया ‘कोरोना-महाकाव्य’ लिखे म भिडे हे. ओमा लाकडाउन खंड –खंड हे. तरह तरह के वेक्सीन के चरचा हे. सुने म यहू आवत हे के कवि लटपटिया कोरोना प्रकरण ल लेके अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी जवइया हे. ए हवाई बात आय के नहीं कोन जनी. अइसे लागथे के कोरोना साक्षात ओखर महाकाव्य म खुसरे बर परगट होही.

किताब के सरकारी खरीद म सुंदर सेटिंग
लालबुझक्कड़ किहिस-कवि लटपटिया के जुगाडू प्रतिभा ले जलइया, सुलगइया मन अइसना आए दिन तरह-तरह के पुड़िया छोडत रहिथें. दरअसल कवि लटपटिया के हर छे महीना म एक किताब छपत हे. साल म एक कहानी किताब अइ जथे. अब तक पन्दरा-बीस किताब त छप गिस होही. किताब फ्री म बांटे जथे. प्रकाशक करा ले सरकार खरीद लेथे. आजकल किताब कतेक झन मन पढ़थे? असंख्य किताब सरकारी खरीद भरोसा छापे जथे. कवि लटपटिया सेटिंग कला म अब माहिर होगे हे. अब तो बटन दबाव सब तुरत सब हाजिर हो जथे. एक क्लिक म रामायण,महाभारत देख लेव. इंटरनेट के जुग आय न !!तभो ले किताब मैदान म दते हे न.

कान काटू विदया
मिट्ठूलाल किहिस-असल बात त ये हे के लटपटियाजी जमीन के आदमी आय. जीवन संघर्स करिस. जिनगानी म खूब झटका खइस. लेवना लगाय (नवनीत-लेपन) के बिदया ल सीखिस. जोन ह आज के सब ले बड़े बिदया आय. अउ बस अगास(आकाश)चढ़गे. हुशियार से हुशियार मनखे के कान काटे के कला ओला आगे.

चार-आठ आखर पढ़ई
मिट्ठूलाल किहिस- कवि लटपटिया चार-आठ आखर पढ़े होही. साग-भाजी साहित्य के ओहा अग्रणी साहित्यकार होगे हे. नेता भजन वोहा जतेक सुंदर ढंग ले गाथे वोतका सुंदर त मुंबई के कोनो गायक नइ गा पांय. नेताजी मन वोला सुन-सुन के धन्य-धन्य हो जथें. पाप पुन्न सब बरोबर अउ रात म सुख के नींद पक्का. नेताजी मन दिल्ली जा के हाईकमान ल वो केसेट भेंट कर देथें. अपन बड़ई कोन ल सुख नइ देय?

कउआ बर मोती ,हंस बर गोटी
लालबुझक्कड़ किहिस- मध्य-काल के बाद आज के जुग म घलो चारण कवि मन के का कमी हे !! सो कवि लटपटिया सही दिशा म जावत हे. ओखर बुरा दिन कइसे बितिस तेला वुही जानही. तभे बुरा दिन के सेती पलटा मारिस अउ अकास चढ़ीस. सही मनखे के इहाँ कोनो चिन्हारी हे? कउआ मन बर मोती हे अउ हंस बर गोटी. इही त हमर लोकतंत्री नियाव आय. खबरीलाल किहिस-हमू मन बहकगेंन तइसे लागथे गा. कवि लटपटिया के कविता के संग का हम नियाव कर पाएंन? एला त पाठक मन तय करहिं. अउ सबे मितान अपन–अपन रद्दा रेंग दिन.