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छत्तीसगढ़ी म व्यंग्य पढ़व- बइगा घर लइका नइ हे...

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भंडारी बईगा के तीरतखार म बड़ सोर हवय. दूरिहा-दूरिहा ले फंूकवाए बर ओकर करा आथे. वोइसे भंडारी ह सबो किसम के दुख दरद ल हरे के ढोंग रचथे. जइसे जऊन ह लइका नइ होवय वोकर कोरा ह भंडारी बईगा के भभूत ले भर जथे.

मुड़ ले गोड़ पीरा तक वोकर भभूत ह काम करथे. जर बुखार ह घलो बईगा के फूंके ले लघिंयात माड़ जथे. बईगा ह हप्ता म दू दिन मंगल अऊ शनिचर के फूंके झारे बर बइठथे. जउन ल फूंकवाय झरवाय के होही वो हा बिहनिया ले सराजाम धर के जाथे. छोटे-मोटे केस होगे जइसे जुड़-सर्दी, नही ते बुखार, त सात ठक लिमऊ, बंदन, अगरबत्ती, एक ठोक नरिहर के संग सवा पांच रूपिया, हो सकय ते राख ल धर के मंगाथे. बड़े मामला हो जथे त तो बईगा के भाग खुल जथे. बईगा के पांचो अंगूरी घीव म रहीथे. जइसे काकरो पेट म लइका नइ नांदत हे तब तो फेर देवी-देवता बर बईगा के मुताबिक जादा खरचा करे ल लागथे. शक्ति के मुताबिक कुकरा, नरिहर अऊ कम से कम इनकावन रूपिया. फूंके-झारे के बाद अद्धी दारू घलो लागथे. घर ले मसान भगवाय बर नही ते कोनो ल भूत धर लेहे तेला भगाए बर तो परिस्थिति देख-देख के सराजाम लागथे. पता नही भभूत ले भूत भगाय के परंपरा कब ले आवत हे ते. अहा महंगई म खाए बर भले जुगाड़ झन होवय, फेर बईगा ल खवा के मोटाए बर खेत खार ल घलो बेचे के नौबत आ जथे.

वइसे भभूत म एको कनी खरचा नइहे काबर कि वोहर चूल्हा के छेना के राख ले बनथे. फेर भंडारी बईगा ह कइसे बड़ जनिक बिल्डिंग बना डरिस. बइगा महाराज ह बड़ चालू रीहिसे, एकाद कनिक रसायनिक क्रिया ल जानत रीहिसे तेकर ले गांव वाले भोला भाला मनखे मन ल बुद्धु बना के लूट सकय. जिहां अशिक्षा जतने हे उहां भंडारी बईगा मन राज करत हे. जऊन ह गांव-गांव म देखे बर मिलथे. एक दिन महूं ह फोकटे-फोकट भंडारी बईगा करा फूंकवाए बर वोकर बताए मुताबिक सामान ल धर के गेंव. मंय ह नवा-नवा रेहेंव त बईगा ह मोला मोहे खातिर अपने-अपन मंत्र ले दू-तीन ठोक करतब ल देखइस. जइसे मंत्र के ताकत ले आगी पइदा करके हवन करीस, मंय ह तो सुकुड़दुम रही गेंव. अऊ अइसे कइसे हो सकत हे ? मने मन गुनेंव. जब बईगा ह अपन झाड़-फूंक ल पूरा करके घर अंदर गीस तब मंय ह कटोरी ल देखेंव, तब मंय ह पायेंव, ओमा घींव के बदला ग्लीसरीन ल राखे रीहिसे, अऊ लकड़ी के खाल्हे म पोटेशियम परमेगनेट. जब पोटेशियम परमेग्नेट के ऊपर ग्लीसरीन परिस ताहन आगी लग गे. अइसने किसम ले पता नही कब ले वो ह अपन गोरख धंधा ले गांव वाले मन ल बुद्धु बना-बना के लूटत रीहिसे. एक दिन सरपंच के बहू ल चक्कर आ जथे. तब बईगा ल घर वाले मन भूत धरे होही कहिके बलाथे. बईगा ह आथे अऊ चप्पले-चप्पल मारथे. थोरिक पानी पियाथे ताहने वोकर हऊस आ जथे. तब बईगा ह आथे अऊ फेर चप्पले-चप्पल नंगत मारथे अऊ पूछथे-कहां हस? तब मार ले बांचे बर घर म. जाबे ते नइ जावस? उत्तर मिलथे जावत हवं! कते मेर गेय हवस? उत्तर-बोईर पेड़ मा. अइसने किसम ले गांव के काकरो भी नाव धर के जाथे. जऊन वोकर नाव के बकरे ले टोनही के रूप म बदनाम हो जथे. बईगा मन अपन परताप ले माईलोगिन मन के जादा सोसन करथे. जेकर ले सावधान रहना हे. बईगा के एको झोक लईका नइ हे. त भंडारी ह अपन घरवाली ल भभूत खवा के काबर ओकर कोरा ल नइ भरत हवय. तेकरे सेेती तो सियानन मन केहे हावे-

बईगा घर लइका नही अऊ बढ़ई घर खइरपा नहीं

जब अइसन बात पूछबे त बईगा मन कहिथे मंत्र ह घर बर काम नइ करय, कहिके बात ल टाल देथे. जब बईगा ल सर्दी-जुकाम होथे तब वो ह डॉक्टर करा जाथे. त वोकर मंतर ह कइसे काम नइ करय… का…? दूसरा के भूत उतारे बर वोकर मंतर ह काम करथे? मंतर म अतेक ताकत हे त पानी काबर नइ गिरावय. मरे मनखे ल काबर नइ जियावय. हमर देस ल सोन के चिरइया काबर नइ बनावय. गरीबी ल काबर नइ मिटावय. पर्यावरण ल काबर शुद्ध नइ करय. जब तोर मंतर म अतेक ताकत हवय त विश्व ल वैज्ञानिक नइ बईगा के जरवत हवय. तेकर ले एक्कीसवीं सदी के सपना ह पूरा हो जाही. यदि मान ले बईगा के मंतर म अतेक ताकत हवय तब तो सरकार साक्षरता अभियान के बदला मंतर अभियान चलाना चाही. लईका ले सियान तक अक्षर गियान के बदला म मंतर गियान के दीया ल जलाए ल लागही. काबर कि अभी तो मंतर गियान के दीया म गांव वाले मन बत्तर कीरा कस झपा-झपा के मरत हवय, तेकरे सेती हमर देश ह विकास म पाछू पांव देवत हवय.

जऊन ह जतके जादा बेवकूफ बनाए म माहिर होथे, वोला वोतके बड़े बईगा माने जाथे. आवव गांव म साक्षरता के जोत जले हे तेकर अंजोर म पढ़न-लिखन अऊ बेवकूफी ले बांचन. नही ते अंजोरी बईगा जइसे मनखे मन ह हमर देस ल बर्बाद कर देही. काबर देस ह गांव परधान देस हरय. जब तक गांव नइ बाढ़ही त समाज कइसे बाढ़ही अऊ समाज नइ बाढ़ही त देस कइसे बाढ़ही. जब हमन विकास नइ करबो त देस कइसे बाढ़ही. कोनो किसम के सरीर ल तकलीफ होय हवय त डॉक्टर करा जाना चाही. अंध विश्वास के चक्कर म बईगइ-गुनियई करना, तन-मन अऊ धन के बर्बादी आय. बईगा जइसे ठग के चक्कर म मत फंस के देश ल आगू तनी बढ़ाए म अपन भागीदारी निभावव अऊ बईगा जइसे भूत ल सब मिल के भगावव.

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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