छत्तीसगढ़ी विशेष: चिकचिकावत हे तेन सितावय झन कहिथें सिरतोन बात हरे

बिसवास के सेती चौरासी लाख योनी मा सबले सबल मानुष योनी ला जाने गेहे . कईसे करके अपन गुन अवगुन ला जानत जानत आज मानुष चोला अपन चमक ला बगरावत हे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 8, 2021, 2:45 PM IST
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मानय तेला सानय झन. माने गऊने के प्रथा सबो जनम ले आवत हे. कोन छोटे ए कोन बड़े ए अइसे घलो देखे जाथे. सुरूज नरायन सदा दिन ले अपन अंजोर बगरावत आवत हे अउ बगरावत रईही अइसे हमला बिसवास हे. बिसवास के सेती चौरासी लाख योनी मा सबले सबल मानुष योनी ला जाने गेहे . कईसे करके अपन गुन अवगुन ला जानत जानत आज मानुष चोला अपन चमक ला बगरावत हे. थके मांदे शरीर मा नवा जीवन देने वाला कोन हरय. वोही हरय जेन र सदादिन ले चिकचिकावत हे.



 साल महिना दिन बादर काखर बर हरे

जीव के ठऊर मिरतू लोक मा. जनम मरन सबो जानत हे तभो ले भरम मा परना मानव सुभाव मा हाबे. मरम ला जानने वाला तरगे अउ नइ जानने वाला सरलग जागत सुतत हे. दिन बादर के सेती हरे जेन सरी जतन होवत जावत हे. होनी के जानकार बने मा कतको सदी बीतगे. बीते दिन हा इतिहास होगे अउ हम होगेन विद्यार्थी. विद्या घलो धन हरय अउ विद्या धन के पूजा सबो जनम ले होवत आवत हे. बांट बिराज के राखे धरे बात बने होथे. सबो के सेती ताय ए संसार के रचना. रचे बचे संसार मा चलना अउ चलाना सबले बड़े समस्या रिहिस. समस्या हे ते निदान घलो होही तभे सुरूज नारायन के गति ला नापे गिस अउ साल , महिना ,दिन बादर ला बांटे गिस अउ समझेगिस.



एके घांव मा सबो दिन बर नइ सिखोए सकस
जिनगी मा खटावत खटावत रहिबे तभे तें एक दिन मान पान पाए के हकदार बनबे. कई झन हबरस ले कोनो काम ला कर डारथें ततके मा थोकिन अलग ढंग ले रेंगे ला धर लेथें. हर आदमी इहां अपन हिस्सा के सांस ला लेवत हे. सांस लेवत लेवत घलो सुरताए के बेरा मिलथे. सुरताबे त सांस के रफ्तार कम हो जथे. रफ्तार कम होइस ततके मा हमन ला विचार करना चाही. कतको दिन बीत गिस तभो सांस अपन आना जाना ला नइ छोड़िस. तें छोड़त रा अउ लेवत रा सांस कभू सिरावय नहीं अतका जानले. जीव के आधार बनगे. हवा पानी अपन कभू बड़ई नइ जानिन काबर के कोनो ला पतेच नइ चलय कोनो जानिन नहीं फेर एदे परयावरन के सेती सबो जानिन हें. परयावरन के शिक्षा सबो दिन होतेच रहना चाही एके घांव के नोहे एला जिनगी मा संघारेच ला परही.



अपनेच सेती झन होवय कांही काम

आज के जमाना मा रद्दा बतइया के बहुत काम बाढ़ गेहे. जाति सभ्यता ला हिसाब मा लाने धरे के सेती जिम्मेदारी बाढ़ गेहे. जीना तो सबो ला हे फेर कइसे जीना हे एला चेताही कोन. सियान के सियानी हमर थाथी हरय. भल ला भल कहइया अउ अनभल ला अनभल कहइया हमरे तिरतार मा होना चाही. बनती अउ बिगड़ती मा समे नइ लागय तेकरे बर चिंता बाढ़ गेहे. हमन काहीं सोंचे नइ रहन तेनो हकरस ले आगू मा अपन सोंच बनाके सउंहत ठाढ़ हो जथे इही करा हिम्मत हारे ला धर लेथे तेला हमन ला हारना नइ देना हे. सरेखत रहिबे त कतको झन रिसाए असन करथें. तें जानत हावस तभो काबर सरेखत हावस. सरेखे मा ओला अपन हिनमान लागत होही. समाजिक होबे तभे सबो जगा तोला मान मिलही. लोगन अपन सुख ला दुख ला बांटही. ते मन लगाके सबो के सेवा जतन करइया बनजा. तो जय होही.





चेहरा मोहरा मा उतार चढ़ाव के लिखना

जानने वाला सबो जनम मा रिहिन. कतको बात ला पचोए रिहिन अउ कतको बात ला उजागर घलो करिन. पचोने बात अपन भावना ला कखरो डाहर नइ भंवावय कलेचुप रहिके देखत सुनत रईथे कइथे निही एके चेहरा आवत हे अउ एके चेहरा जावत हे. अइसे काबर केहे गे होही. सोंचे के बात हरय. लइकापन ले लेके सियानी उम्मर तक आवत आवत कतको झन के झेल ला सहइया हमर मुखिया के सेती ताय तेन जान डारिस के तोला का कहना पर ही. थोरको बात देथे के सच्चाई का हे. एकरे सेती केहे गेहे के चिकचिकावत हमर सियान के माथा हमर गर्व अउ सम्मान के प्रतीक हरय अइसे होना चाही सियानी जेमा सबो के हित समाए राहय. (यह लेखक के न‍िजी विचार हैं)


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